Thursday, March 5, 2026
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महाभारत कालीन नगर के इस मंदिर में होती है भगवान विष्णु की विशेष पूजा, देखना है वर्जित

by KhabarDesk
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Mahabharat:  पुरातन काल से अपने गौरवमय इतिहास को समेटे सनातन हिंदू संस्कृति की सांस्कृतिक पहचान है बुंदेलखंड का अचल पुर गाँव। इस गांव का महाभारत काल से भी गहरा संबंध है। यहां पर चंदेल काल में निर्मित भव्य मंदिर में 10-11वीं सदी में स्थापित भगवान विष्णु की पाँच से छह फीट की ऊंची अद्भुत मूर्ति है। मूर्ति की अपनी एक अलग विशेषता और धार्मिक तथा पौराणिक महत्व है।

चट्टान की तरह आज भी अचल है

अचट्ट यानी अचलपुर (प्राचीन नाम ) महाभारत काल का नगर राज्य था। इसका एक नाम अक्षत है जो बाद में अचल हो गया। अपने नाम के पीछे ही इसका अर्थ छिपा है। वह गांव जो आज भी अचल है। विंध्यगिरी की चट्टान की तरह समय के बवंडरों को झेलता फिर भी अक्षत और अचल है। छतरपुर मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूरी पर नोगाँव थाने के अंतर्गत ग्राम अचट्ट बेहद प्राचीन स्थान है। पुराने बुजुर्ग लोगों का कहना है की अचट्टगाँव हज़ारो वर्ष पहले महाभारत काल में एक पूरा वैभवशाली नगर हुआ करता था और आज भी उस समय के पूर्वज देवता गाँव में भ्रमण करते हुये गाँव की हर आफत विपदा से सुरक्षा करते हैं। अचट्ट ग्राम का नाम मार्कण्डेय पुराण में आया है। आज भी गाँव में एक से बढ़कर एक पत्थर की कला कृतियाँ, देवी देवताओं की मूर्तियां अपनी गाथा कहती हैं।

मंदिर में भगवान विष्णु की पूजा देखना है वर्जित

हम बात कर रहे थे भगवान विष्णु के मंदिर की जहां आज भी भगवान विष्णु की विशेष पूजा होती है जिसे कोई नहीं देख सकता। केवल पुजारी ही एकमात्र उनकी पूजा करता है। उसके बाद पूजा का जल सभी के ऊपर छिड़का जाता है। भगवान विष्णु के अक्षत नाम पर पहले इसका नाम अक्षत रखा गया था जो बाद में अचट् फिर अचल हो गया।

तालाब के जल से दूर होती हैं बीमारियां

यहाँ स्थित अद्भुत 1008 मुखी शिवलिंग है। जो हज़ारो वर्ष प्राचीन शिवलिंग है। बैद्यनाथ धाम के नाम से प्रसिद्ध इस सिद्ध स्थान पर दूर दूर से लोग आते है और अपनी मन्नत मांगते है। यह एक सिद्ध स्थान है। कहते है की यंहा से कोई खाली हाथ नहीं गया। पास ही तालाब किनारे सिद्ध हनुमान मंदिर है। अक्षत जिसको कभी कोई क्षत नहीं कर सकता। वह अपने स्थान पर आज भी उसी रूप में स्थित है। इस मिट्टी के अपने विशेष गुण के कारण तालाब ‌का जल सभी प्रकार की गंभीर बीमारियों को दूर करता है। इसीलि इसे बैद्यनाथ धाम भी कहा जाता है।

छतरपुर ज़िला न जाने ऐसे कितने ही पुरातात्विक, ऐतिहासिक एवं धार्मिक कथायें समेटे रहस्यमयी स्थानों से भरा पड़ा है। यह हमारी सांस्कृतिक धरोहरें हैं, जिनकी सुरक्षा आवश्यक है अन्यथा हम बुंदेलखंड के गौरवमय इतिहास को खो देंगे। अतीत की नींव पर ही वर्तमान स्थिर होकर भविष्य के ताने बाने बुनता है। आज आवश्यकता है हम अपने गौरवमय अतीत की धरोहर संजो कर रखें।
उषा सक्सेना

डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें।

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