Bundelkhand : छतरपुर जिले की इस यात्रा में आईये हम आज एक ऐसे दुर्लभ स्थान की यात्रा करें, जिसे बुंदेलखंड का केदारनाथ धाम कहते हैं। विंध्यक्षेत्र के पर्वत श्रेणी की दुर्गम पहाड़ी और घने जंगलों के बीच स्थित इस जगह का पहले किसी को भी कोई पता नही था। वहां आस पास के गांव के लोग ही इस विषय में जानते थे। परन्तु जंगली जानवर और डाकुओं के भय से कोई वहां नही जाता था। पत्थर में भी भगवान होते हैं, और वह कब किसका हृदय परिवर्तन कर दें इसे कोई नही जानता।
डाकू मूरत सिंह के नाम से थर्राता था इलाका
शायद अब शिव जी के प्राकट्य का समय आगया था। आज से करीब १०० वर्ष पूर्व इस क्षेत्र में डाकू मूरत सिंह का दबदबा था । वह अपने क्षेत्र का कुख्यात डाकू था जिसके नाम से ही पूरा बुंदेलखंड थर्राता था। उस समय के डाकुओं में देवीसिंह पूजा बाबा भी इस क्षेत्र में प्रसिद्ध थे। सभी एक दूसरे से तारतम्य रखते थे। डाकुओं का निवास घने जंगल दुर्गम क्षेत्र में था, इन्हीं पहाड़ियों की गुफायें इनके आवास थे। पुलिस अपने लाख प्रयास के बाद भी इन तक नहीं पहुंच पाती थी। आम जनता को इनसे कोई कष्ट नहीं था ,पर मन में भय समाया हुआ था। इनके शिकार केवल बड़े बड़े व्यापारी और सेठ लोग ही होते थे। गरीबों और महिलाओं पर इन्होंने कभी कुदृष्टि नही डाली न उन्हें सताया, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर सदा उनकी सहायता ही की। मूरत सिंह जैसे नृशंस डाकू के हृदय परिवर्तन के पीछे यहां के रहस्यमयी कुंड की वह कथा है जिसने इसे बुंदेलखंड का केदारनाथ धाम तीर्थ जैसी संज्ञा प्रदान की ।
जब खूंखार डाकू बना संत
डाकू मूरत सिंह को कुष्ठ रोग था। एक बार जंगलों में पुलिस के भय से भटकते हुये कुख्यात डाकू मूरत सिंह को प्यास लगी पर कहीं पानी नही मिला। अचानक उसकी दृष्टि पहाड़ी पर बने जल से भरे तीन कुंडों पर पड़ी। इन जलकुंड में पहले कुंड का पानी ठंडा दूसरे का गुनगुना और तीसरे कुंड का पानी गर्म था। मूरतसिंह ने हाथ से पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई। आश्चर्य चकित हो कर देखा की जिन हाथों से पानी लेकर उसने पिया उनका कुष्ठ रोग ठीक होकर उसका रंग पहले जैसा सामान्य हो गया था । मूरत सिंह को पहले से ही कुष्ठ रोग था। यह देख कर की ऐसा कैसे हुआ वह आश्चर्य में पड़ गया। इधर उधर देखा तो एक पहाड़ी गुफा के नीचे मंदिर में शंकर-पार्वती जी के साथ उनकी गोद में गणेश जी बैठे हैं।
उनके ऊपर पहाड़ी के वृक्ष की जड़ों से रिसता हुआ पानी उनका अभिषेक करता बूंदबूंद कर टपक रहा है। प्रकृति का यह अद्भुत करिश्मा देख वह भौंचक्का रह गया। तत्पश्चात कुंड के पानी से पूर्ण स्नान कर कुष्ठ रोग मुक्त होकर उसने शिवजी की आराधना करते हुये उन्हें जटा शंकर नाम देकर उन्हीं के नाम से मंदिर बनवाने का संकल्प लिया । इस प्रकार मूरतसिंह जैसे कुख्यात डाकू का हृदय परिवर्तन करने वाले उस रहस्यमयी कुंड के जल का प्रभाव ऐसा था जिसने उसे डाकू से संत बना दिया।
पुलिस को छकाने वाले खूंखार डाकू ने कर दिया आत्मसमर्पण
अंत में जिसे पुलिस लाखों प्रयास करने के बाद भी नही पकड़ सकी थी उसने अपना संकल्प और उद्देश्य पूरा होने के पश्चात, स्वयं आत्म समर्पण किया। उनके अन्य साथी भी इस पुनीत कार्य में उनके साथ अंत तक संलग्न रहे,अंत मे उन्हीं के साथ उन सबने पुलिस के समक्ष आत्म समर्पण किया। उस समय मूरत सिंह के नाम का इतना दबदबा था की वह खैरात में जिससे जितनी भी रकम मांगता वह चुपचाप दे देता। इस तरह से जटाशंकर जैसे तीर्थ स्थल का निर्माण हुआ। बाद में इसकी ख्याति बढ़ती गई। मूरतसिंह यहां दर्शन करने आने वालों की हर तरह से मदद करते। यहां पर शिवरात्रि और मकर संक्रान्ति का मेला लगवाते।
एक बार काफी बड़ा धनुषयज्ञ मेला का बहुत बड़ा आयोजन किया। लोगों के मन से डाकुओं का भय समाप्त होने पर यहां श्रद्धालु भक्तों की भीड़ लगने लगी। यहां के कुंड के जल की विशेषता के कारण कुष्ठ रोगी अमावस्या के दिन यहां स्नान करने के पहले पास में बने पहाड़ी झरने पर स्नान करते हैं , बाद में तीनों कुंड के पानी से स्नान कर अध्यात्मिक आनंद की अनुभूति करते हैं। स्नान के बाद जटाशंकर मंदिर में स्थित शिव पार्वती एवं गणेश जी की पूजा कर अपनी इस तीर्थ यात्रा को सफल मानते हैं। लौटते समय इन जलकुंडों के जल को गंगाजल के समान पवित्र और औषधि युक्त मान कर घर ले जाते ।
ऊषा सक्सेना
Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी तथा तथ्य पूर्णत: लेखिका द्वारा ही प्रदान किए गए हैं।