Mahavir Jayanti 2026: सभ्यता और संस्कृति के विकास में हिंसा किसी भी सभ्य समाज को शोभा नही देती। यह हमारे अंतस् मे छिपी बर्बरता हिंस्रक प्रवृत्ति और अमानवीय कृत्यों की द्योतक है। जो हमें पुन: जंगल राज में ले जाने की ओर उद्धत करती है ।
जियो और जीने दो
मानवीय जीवन मूल्यों का प्रथम सिद्धांत ही है जियो और जीने दो। इस सिद्धान्त पर आधारित हैं जैन तीर्थंकर भगवान महावीर के पंच मूलभूत सिद्धांत:-
(1) अहिंसा
(2) सत्य
(3) ब्रह्मचर्य
(4) अचौर्य
(5)अपरिग्रह।
जैन धर्म के प्रवर्तक और अंतिम 24वें तीर्थंकर के रूप में उनका जन्म 599 ई.पूर्व चैत्र माह के शक्ल पक्ष की त्रयोदशी को बिहार के कुंडलपुर मे हुआ था । पिता का नाम सिद्धार्थ और माता का नाम त्रिशला था। उनके पिता इक्ष्वाकु वंश के होने से सूर्यवंशी क्षत्रिय वैशाली गणतंत्र में कुंडलपुर के राजा थे ।
महावीर जी केबचपन का नाम वर्धमान,महावीर और अतिवीर था । वह एक साम्राज्य के युवराज थे जिन्होंने अपने विवाह और पुत्र जन्म के पश्चात ही मात्र तीस वर्ष की आयु में ही वैभवशाली राजपाट का परित्याग कर सन्यास लेकर 12 वर्ष की घोर तपस्या के पश्चात ज्ञान प्राप्त किया था। इस तपस्या के समय उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा । बाद में आत्म संयम के द्वारा उन्होंने संयत होकर अपने मन को जीतना सीखा।
जैन धर्म के सिद्धांतों को प्रतिपादित किया
42वर्ष की आयु में ज्ञान प्राप्त कर जियो और जीने दो के सिद्धांत को मूल आधार बना कर जैन धर्म के पंच मूलभूत सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। उस समय बलि के नाम पर यज्ञों में हो रही जीव हत्या को रोकने के लिये ही जियो और जीने दो की बात कही। हर जीव में जब परमात्मा का अंश है तो अपने सुख के लिये किसी और के जीवन की बलि क्यों ? प्रश्न सोचने पर विवश करता है मनुष्य की हिंस्रक प्रवृत्ति पर संयम का अंकुश न होने के कारण वह दूसरों की नृशंस हत्या करते हुये केवल अपना ही अधिकार चाहता है ।
सबसे शक्तिशाली बनकर सभी पर शासन करने की लालसा उसे लोभी बना कर सत्य के पथ से विचलित कर अधर्म और अन्याय के पथ पर ले जाकर वह अचौर्यकर्म के स्थान पर ऐनकेन प्रकारेण दूसरे की सम्पत्ति हरण करना और अपरिग्रह के स्थान पर सबसे अधिक सबकी धन सम्पत्ति लूटकर केवल परिग्रह करना ही इस समय मानव की संस्कृति हो गया है। वह शक्ति के मद में सम्पूर्ण मानव जाति को ही विनाश के कगार पर ले जाकर विश्व युद्ध की संरचना रच रहा है । आज की समसामयिक प्रथम आवश्यकता भगवान महावीर जी के मूलभूत सिद्धांत जियो और जीने दो की है । तभी हम वसुधैव कुटुम्बकम् की कल्पना साकार कर पायेंगे । चिंतनीय विषय है कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं । युद्ध के बाद शेष रहती है मानव की रक्तरंजित धरा जिस पर विनाश की लीला रची जाती है। इस लिये सदैव ही विनाशकारी दुष्प्रवृत्तियों से बचना चाहिये
उषा सक्सेना