Ayodhya in Bundelkhand : मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड की वह पावन भूमि जो अपनी भक्ति की रसधार में डुबोकर अयोध्या के रामलला को सरयू नदी के पावन जल से निकाल कर ओरछा ले आईं थी। ऐसी ही भक्त थीं ओरछा के महाराज मधुकर शाह की महारानी कुंवरि गणेश जिन्होंने ओरछा को ही अयोध्या के समान तीर्थ स्थल बना दिया। जहां के राजा मधुकर शाह को उनके ओरछा आगमन के बाद अपना राजपद का त्याग कर रामलला को ही राजा के पद पर प्रतिष्ठित कर राजा राम सरकार कह कर उन्हें बाकायदा तोपों की सलामी दी गई ।
वह प्रथा जो आज भी कायम है
राजाराम, ओरछा के राजा हैं। जहां पर किसी और की सरकार नहीं उनके नाम की ही सरकार चलती है। ओरछा वेदवती (बेतवा)नदी के तट पर बसा नगर है। कहते हैं कि बेतवा नदी यहां सात भागों में विभाजित होकर बहती है इसलिये इसे सतधारा भी कहते हैं ।
ओरछा राज्य की स्थापना:-
सन् 1531 में बुंदेलाराजा रुद्र प्रताप सिंह ने इसे बुंदेलखंड की राजधानी बनाया था। यहां का किला भी उन्होंने राज्य की सुरक्षा की दृष्टि से बनवाया था जो आज भी मौजूद है। इसके पहले गढ़कुंडार उनकी राजधानी थी । सामयिक दृष्टि से इस स्थान का विशेष महत्व था। जहां से मुगलों के बुंदेलखंड में प्रवेश को रोका जा सकता था। उनकी मृत्यु के पश्चात पहले उनके बड़े पुत्र भारती चंद शासक बने। वह कुछ ही समय शासन कर सके बाद में उनकी मृत्यु के पश्चात उनका कोई उत्तराधिकारी न होने से उनके छोटे भाई रुद्रप्रताप सिंह के द्वितीय पुत्र मधुकर शाह राजा बने । राजा मधुकर शाह श्रीकृष्ण की भक्ति में डूबे रहते थे। उनकी महारानी कुंवरि गणेश जी भगवान श्रीराम की अनन्य भक्त थी। इस तरह ओरछा में भक्तिकाल में राजा और रानी दोनों की अलग अलग राम और कृष्ण की भक्ति की धारा प्रवाहित हो रही थी। एक बार राजा मधुकर शाह ने तीर्थयात्रा पर जाने के लिये वृंदावन की यात्रा का मन बनाया किंतु महारानी कुंवरि ने कहा कि पहले रामलला के दर्शन करने अयोध्या चलो। इस पर मधुकर शाह ने क्रोधित होते हुये कहा कि यदि तुम्हारी भक्ति राम के प्रति इतनी अधिक है तो अपने रामलला को अयोध्या से ओरछा लेकर आओ । महारानी के लिये यह एक चुनौती थी और उनकी भक्ति और भगवान की परीक्षा भी ।
रानी अपनी तपस्या से राजाराम को लाई ओरछा !
वह अयोध्या चलीं गईं और वहां रामभक्त तुलसीदास जी से मिलने के बाद लक्ष्मण किला के पास सरयू तट पर एक कुटी बना कर श्रीराम की भक्ति नाम का जाप करते हुये तपस्या करने लगीं। बहुत समय व्यतीत होने पर उन्होंने 21 दिन का कठोर तप किया तब भी अपने भगवान के दर्शन न हो सकने से आत्मग्लानि वश अपने प्राणों का ही त्याग करने के लिये उन्होंने सरयू के गहरे जल में छलांग लगा दी । वहां पर सरयू के गहरे जल से रामलला की मूर्ति उनके हाथ में आ गई और भगवान राम ने साक्षात उन्हें दर्शन दिये । तब महारानी ने उनसे ओरछा चलने का आग्रह करते हुये कहा कि मैं आपके बिना ओरछा नहीं जा सकती यह मेरा प्रण और महाराज की आज्ञा है जिसका पालन मुझे करना ही होगा । तब भगवान श्रीराम ने ओरछा जाने के लिये तीन शर्तें उनके समक्ष रखते हुये कहा कि इन शर्तों के पालन करने पर ही मैं ओरछा जा सकता हूं ।
- पहली शर्त:-ओरछा में विराजित होने के बाद वहां केवल राजाराम की ही सरकार होगी किसी और की सत्ता नहीं ।
- दूसरी शर्त:-पहली यात्रा के बाद दूसरी यात्रा विशेष पुष्य नक्षत्र में ही पैदल साधुसंतों के साथ बालरूप में गोद में ही होगी ।
- तीसरी शर्त:-महल में पहुंचने पर एक बार जिस स्थान पर आसन देंगे वहीं मेरा स्थान होगा अन्यत्र नहीं ।
इतना कहते हुये उन्होंने महारानी को उस मूर्ति के विषय में बतलाते हूये कहा कि जब मैं वनवास को जा रहा था तो माता कौशल्या अति दुखी हो रही थी कि मैं किसे भोग लगा कर भोजन ग्रहण करूंगी। तब मैंनें उनकी प्रसन्नता के लिये उन्हें अपनी यह बालरूप की मूर्ति दी थी जिसे भोग लगाकर ही वह भोजन ग्रहण करती थीं । 14वर्ष वनवास के पूरे होने पर जब मैं वापिस आया तो माता ने इस मूर्ति को सरयू में प्रवाहित कर दिया था। आज में पुन:आपकी भक्ति से प्रेरित होकर बालरूप में ही रामलला के रूप में आपके पास आया हूं ।
भगवान के दर्शन और मूर्ति को पाकर महारानी ने महाराज मधुकर शाह को संदेश भेजा कि वह साधु संंतों के साथ विशेष पुष्य नक्षत्र में पैदल यात्रा करते हुये ओरछा के राजाराम को लेकर आ रही हैं। यह समाचार प्राप्त कर राजा मधुकर शाह ने अपनी हार को स्वीकार करते हुये भागवान के लिये अरबों रुपये खर्च कर विशेष रूप से चतुर्भुज मंदिर का निर्माण करवाया। उनके आगमन के स्वागत की ओरछा में विशेष रूप से तैयारियां होने लगी । राजा ने अपने पद का परित्याग कर राजसिंहासन राजाराम सरकार के नाम कर दिया ।
600 वर्ष पूर्व का वह स्वर्णिम इतिहास जब राजाराम अयोध्या छोड़कर ओरछा के राजा बने
1631में ओरछा आने पर महारानी कुंवरि का विशेष रूप से बालरूप रामलला के साथ स्वागत तोपों की सलामी के साथ हुआ। अपने महल में प्रवेश करने पर नये बने चतुर्भुज मंदिर में विशेष रूप से उनकी प्रतिष्ठा शुभ मुहूर्त में की जाने के कारण तब तक महारानी ने उन्हें अपने कक्ष में आसन दिया । बाद में जब उन्हें चतुर्भुज मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का समय आया तो वह मूर्ति अपने सिंहासन से हिली ही नही जिसके कारण भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप की मूर्ति उस मंदिर में स्थापित करनी पड़ी । वह तो माता कौशल्या के बाद महारानी गणेश कुंवरि का महल और गोद थी उसे छोड़कर वह नहीं गये बाद में वहीं पर ही उनका मंदिर बनाया गया जो आज भी है । राजाराम की सरकार जिसे आज भी सैनिकों द्वारा बंदूकों से दिन में चार बार सलामी दी जाती है । जै राजाराम की। जिन्हे अपने भक्त के प्रण को पूरा कर ओरछा आना पड़ा ।
उषा सक्सेना-