Maharaja Chhatrasal : महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड के महान योद्धा थे जिन्होंने शिवाजी से प्रभावित होकर जीवन भर मुगलों से संघर्ष किया और औरंगजेब को हरा कर बुंदेलखंड में अपना स्वतंत्रत हिंदू राज्य स्थापित किया था। अपने इसी शौर्य और पराक्रम के कारण उन्होंने महाराजा की पदवी प्राप्त की थी। महाराजा छत्रसाल का जन्म 4 मई 1649 को ओरछा के बुंदेला परिवार के रुद्र प्रताप सिंह के घर हुआ था जो अपने समय के वीर एंव कुशल राजा थे। लेकिन अपने ही रिश्तेदारों की साजिश की वजह से 12- 13 साल की कम उम्र में ही महाराजा छत्रसाल अनाथ हो गए थे। लेकिन वह हालातो से लड़े और अपने बुंदेला शौर्य को जीवित रखा । महाराजा छत्रसाल का जीवन मुगलों की सत्ता के खिलाफ संघर्ष और बुंदेलखंड की स्वतन्त्रता स्थापित करने के लिए जूझते हुए बीता। वे अपने जीवन के अन्तिम समय तक आक्रमणों से जूझते रहे। बुन्देलखण्ड केसरी के नाम से प्रसिद्ध महाराजा छत्रसाल बुन्देला की वीरता के बारे में कहा जाता है :
इत यमुना, उत नर्मदा, इत चम्बल, उत टोंस। छत्रसाल सों लरन की, रही न काहू हौंस॥
छत्रसाल की पुत्री मस्तानी का विवाह पेशवा बाजीराव प्रथम के साथ हुआ था।मस्तानी’ नामक ग्रन्थ में इतिहासकार दत्तात्रेय गणेश गोडसे ने लिखा है कि छत्रसाल और बाजीराव प्रथम के बीच पिता-पुत्र जैसे रिश्ते थे। 20 दिसम्बर 1731 को मृत्यु के पहले ही छत्रसाल ने महोबा और उसके आस-पास का क्षेत्र बाजीराव प्रथम को सौंप दिया था।
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिला का नाम महाराजा छत्रसाल पर ही रखा गया है। महाराजा छत्रसाल संग्रहालय और दिल्ली का छत्रसाल स्टेडियम भी उन्हीं के नाम पर है । अपने शासनकाल में महाराजा छत्रसाल ने भी बहुत से अद्भुत किले और महल बनवाये थे जो आज भी पर्यटकों को इतिहास की उन्ही गलियों में ले जाते हैं। जो आज छतरपुर जिले के खास पर्यटन स्थल भी हैं
मऊसहानियां और धुबेला : ये है-छतरपुर से मात्र 20 किलो मीटर की दूरी पर नौगांव और छतरपुर के बीच में बसा वह गांव जो कभी महाराज छत्रपति छत्रसाल की पन्ना के बाद दूसरी राजधानी हुआ करता था। यह मुगलों से लड़ने के लिये बनाया गया वह सम-सामरिक स्थल था जो बुंदेलखंड के गौरव मय इतिहास को अपने आप में समेटे है । यत्र तत्र जिसके बिखरे खंडहर आज भी उनके शौर्य की गौरव गाथा गाते हैं। कभी भी किसी की दासता में नही रहने वाले इस क्षेत्र का नाम पहले जुझौति था। जुझौती अर्थात जूझ कर लड़ने वाले वह वीर जिनका कोई सानी नही ।आज भी इस क्षेत्र के कुछ ब्राम्हणों के साथ जुड़ा जुझौतिया नाम उस समय की यादें अपने आप में समेटे है । अपने आप को विश्व पटल के धरातल पर लाने के बाद भी बुंदेलखंड का यह क्षेत्र आज भी उपेक्षा के दंश को झेल रहा है। यहां के विशेष पर्यटन स्थल आज भी अपनी कहानी स्वयं कह रहे हैं । जैसे मऊसहनियां जगत सागर तालाब ।
जगत सागर :-अंग्रेजों के द्वारा छतरपुर के महाराज प्रताप सिंह के बाद विवादास्पद स्थिति में सन् १८५४ में अंग्रेजों ने इसे अपने अधिकार में लेने के समय कुछ शर्तों के साथ जगत सिंह को इस रियासत का राजा माना था । यह तालाब महाराज जगत सिंह के द्वारा बनवाये जाने से इसका नाम जगत सागर पड़ा जिसके किनारे मकर संक्रान्ति का बहुत बड़ा मेला लगता था। तालाब नौगांव में अंग्रेजों की एक रेजीमेंट रहती थी उसकी जलपूर्ति के लिये इसे बनाया गया था। अंग्रेजों की छावनी के कारण उस क्षेत्र को छावनी के नाम से ही जाना जाता था ।
धुबेला का तालाब :-इस तालाब का जल बहुत ही स्वच्छ और निर्मल था। सभी प्रकार के कमल पहले इसमें खिलते थे । इसके सौंदर्य को द्विगुणित करता महाराज छत्रसाल की महारानी कमलापति का सुंदर महल जिस की परछाईं इस तालाब पर पड़ती है । महाराज छत्रसाल के महल के पीछे बना यह तालाब ही उनका स्नानागार था ।
महाराज छत्रसाल का महल :- उनकी यादों को अपने आप में समेटे इस महल को 1955 में संग्रहालय का रूप दे दिया गया था। स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं.जवाहरलाल नेहरु जी ने इसका उद्घाटन किया था। इसके जादुई आदम कद के शीशे कमाल के हैं । जो व्यक्ति के अलग अलग रूपो को दिखाते हैं । उनमे एक दर्पण ऐसा भी था जो आप चाहे कितने भी वस्त्र पहने हों पर वह आपको आपके असली रूप के दर्शन करा निर्वस्त्र दिखाता था । इसीलिए जब नेहरू जी उसे देखने गये तो उसे हटा दिया गया था ।
मस्तानी महल :- महाराज छत्रसाल की पुत्री और बाजीराव पेशवा की पत्नी के नाम पर बाजीराव पेशवा द्वारा बनवाया गया यह महल अद्भुत वास्तु शिल्प कला का बेजोड़ नमूना है ।अपनी सुंदरता में ताजमहल को भी मात देता था यह महल।
छत्रसाल का मकबरा :-जिसे उनके दामाद बाजीराव पेशवा ने उनकी मृत्यु के पश्चात उनकी याद में बनवाया था जो अति सुंदर है ।
उषा सक्सेना।