Bihar Champaran Khadi : देश ही नही विदेश में भी हाथ से की जाने वाली बुनाई की कला आज भी लोगों की पहली पसंद है । भारत के कुछ राज्यों में आज भी इस कला को सहेज कर रखा गया है। इन्हीं राज्यों में एक बिहार का पश्चिमी चंपारण जिला भी है । जहां पर कई प्रखंडों में थारू जनजाति का बसेरा है। इस जनजाति में बगहा, मैनाटांड़ , गानाहा ,रामनगर इत्यादि प्रमुख हैं। यहां पर आज भी लकड़ी के फ्रेम पर हाथ से कपड़ा बनाने की कला मशहूर है। यहां की महिलाएं चरखे पर धागा बनाकर लकड़ी के फ्रेम पर कपड़े बनाने का काम करती है। लकड़ी के फ्रेम पर बने कपड़ों की कीमत आज भी बहुत ज्यादा है। आईए जानते हैं, पश्चिमी चंपारण की ये महिलाएं किस प्रकार से लकड़ी के फ्रेम पर अपने हाथों की कला का प्रदर्शन करती हैं।
लकड़ी के फ्रेम पर बुने जाते हैं कपड़े :
बिहार में पश्चिमी चंपारण में कपड़े की बुनाई की कला में लकड़ी के फ्रेम का उपयोग करके विशेष प्रकार के कपड़े बनाए जाते हैं । कपड़े बनाने की ये तकनीक आम तौर पर सूती, टसर और रेशम के अन्य प्रकारों के लिए उपयोग की जाती है । बिहार की थारू जाति के लोग आज भी बिना किसी आधुनिक मशीन का उपयोग किए, चरखे की मदद से कपड़ों की बुनाई करते हैं। हाथ से बुने हुए यह कपड़े आज भी लोगों के बीच इतने प्रचलित हैं कि यह बिहार के अलावा दिल्ली और नॉर्थ ईस्ट के कई राज्यों में लोगों द्वारा पसंद किए जाते हैं। थारू जाति को विरासत में मिली यह कला और इसकी खूबसूरती लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। बुनाई की इस कला में माहिर महिला कारीगर द्वारा बनाए गए डिजाइन और बारीकियां कमाल की होती है। ऐसा माना जाता है कि मशीन से बनाए गए कपड़ों की अपेक्षा हाथ द्वारा हथकरघा पर बनाये गये कपड़ों की कीमत और इस्तेमाल की अवधि लंबी होती है।
बिहार की खास जनजाती इस कला में माहिर :
बिहार के कई जिलों में थारू जनजाति का बसेरा है। थारू जनजाति के समुदाय में मैनाटांड़, बगहा, गानाहा, रामनगर इत्यादि प्रमुख हैं। यहां की महिलाएं आज भी लकड़ी के फ्रेम पर कपड़ा बनाने की कला में माहिर हैं। इसी कारीगरी द्वारा वह अपने परिवार का भरण पोषण करती है। आज भी थारू जनजाति समुदाय की महिलाओं की यह कला देश के कोने-कोने में एक ब्रांड के रूप से भी जानी जाने लगी है । इसकी वजह से इन महिलाओं की कला को पूरे देश में एक बड़ी पहचान मिलने लगी है। विशेष कर दिल्ली, झारखंड, मध्य प्रदेश, यूपी और नॉट ईस्ट जैसे कई राज्यों में यहां तक की आर्थिक राजधानी मुंबई में भी इन कपड़ों के डिमांड काफी बढ़ गई है। इस जनजाति द्वारा बनाये जाने वाले कुछ खास प्रकार के कपड़े और सजावट का समान पूरे देश में मशहूर है ।
हाथ से बनते हैं शॉल गमछा और चादर
बिहार के मिश्रौली गांव में रहने वाली कृष्णा देवी बताती है कि उनके हथकरघा केंद्र में कई प्रकार की चीजें बनती हैं। कृष्णा देवी के अनुसार उनके हथकरघा केंद्र में थारू जाति की कुल 12 महिलाएं कार्य करती हैं । जो प्रतिदिन चरखे की मदद से धागों को सुलझाती हैं और उन्हें एक लकड़ी के फ्रेम पर अपने हाथों की कला से बुनकर तैयार करती हैं। उनके हाथों की यह कला लकड़ी के फ्रेम पर शॉल, गमछा , तकिया के खोल, चादर, टेबल क्लॉथ का रूप लेती है। कृष्णा देवी का कहना है कि एक महिला एक दिन में करीब 15 शाल, 8 गमछे 5 बेडशीट तथा 10 तकिये के खोल तैयार कर सकती है। वहीं रुक्मिणी देवी बताती है कि उनके हथकरघा केंद्र में करीब 25 महिलाएं कार्य करती हैं। प्रतिदिन दर्जनों फ्रेम पर कपड़ों की बुनाई करती हैं और हाथों से उस पर कलाकृतियां बनाती हैं।
हाथ से बनाए गए कपड़ों की कीमत :
हथकरघा केंद्र में महिलाओं के हाथों द्वारा तैयार किए गए इन कपड़ों की कीमत उनकी कलाकृतियों के अनुसार तय की जाती है । जहां हाथ से बने हुए शॉल की कीमत 600 रूपये तक होती है । तो वहीं डबल बेड पर बिछाए जाने वाली चादरों की कीमत 500 रूपये तक हो सकती है । महिलाओं का कहना है कि इन कपड़ो को बार-बार धोने पर भी इनका रंग फीका नहीं पड़ता है और ना ही इन कपड़ों की बनावट पर कोई असर पड़ता है। हाथ से बने हुए इन कपड़ों की लाइफ काफी लंबी होती है । कुछ कपड़े तो ऐसे भी हैं जिनकी कीमत ब्रांडेड कपड़ों से ज्यादा होती है।
थारु जाति की महिलाओं का कहना है कि उन्होंने अपनी कला और विरासत को पुनर्जीवित कर नई पीढ़ी से जोड़ने का प्रयास किया है। उनका कहना है कि यह उनके पूर्वजों की अमूल्य धरोहर है जिसे वह भूल नहीं सकते हैं।
बबीता आर्या