Phule Movie Review : भारतीय समाज की विडंबनाओ की गाथा कोई 3500 साल के कालखंड का लेखा-जोखा हो सकती है। अन्याय, शोषण, दमन और भेदभाव की पराकाष्ठा सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन का हिस्सा मात्र नहीं रहा, बल्कि समाज को बांटकर धर्म के नाम पर सबसे निकृष्ट और घृणित व्यवस्था के स्वरूप और विस्तार ने भारत को न सिर्फ अंधकार के गर्त में धकेला है, बल्कि सामाजिक एकता और राष्ट्रीय चेतना को भी मिटाने का काम किया है। यह आज भी जारी है और इसके विरोध में आवाज़ें भी बुलंद होती रही हैं। ऐसी ही विडंबनाओं और सामाजिक विकृतियों के खिलाफ संघर्ष की एक कहानी कहती है, हाल ही में रिलीज हुई फिल्म “फुले“।
अंशु नैथानी
फुले फिल्म हम सभी को देखनी चाहिए और देखने के बाद अपने समाज की विद्रूपता का अवलोकन भी जरूर करना चाहिए। जहां वर्ण व्यवस्था के आधार पर समाज के इतने बड़े तबके को हजारों सालों तक शोषण का दंश सहना पड़ा और सामाजिक अपमान के घूंट पीने पड़े। धर्म और भगवान के नाम पर बनाई गई जिस वर्ण व्यवस्था के नाम पर उनका दमन और शोषण हुआ, उसी धर्म और भगवान के मंदिरों के दरवाजे भी उनके लिए बंद किए गए। प्रकृति का दिया हुआ जल जिस पर सभी जीव जंतुओं का समान अधिकार है, उसके कुएं को हाथ लगाने पर उन पर अत्याचार हुए। उनकी परछाई से भी नफरत की गई। इस दमन और शोषण ने उन्हें समाज की मुख्य धारा और प्रगति से शताब्दियों पीछे धकेल दिया। उनकी अपनी संस्कृति, अपनी विचारधारा, अपना जीवन, अपना खान-पान और अपने रीति रिवाज सब कुछ को शूद्र की संज्ञा दे दी गई।
यह विचार बहुत कचोटता है। पूरी दुनिया में शायद भारत ही ऐसा देश होगा जहां जाति व्यवस्था भेदभाव का पर्याय है। एक धर्म की छत के नीचे इतनी बड़ी असमानता पोषित होती रही, पलती रही और गुजरते वक्त के साथ उसको सामान्य बना दिया गया। जब इसे बदलने के लिए लोगों ने आवाज उठाई तो उसे दबाने की कोशिश की गई। लेकिन क्रांतियां रुकती नहीं है, क्रांति होकर रहती है। यह चिंगारी कहीं ना कहीं से उठती जरूर है। जैसे फ्रेंच क्रांति के दौरान कुलीन वर्ग और चर्च के खिलाफ वंचित वर्ग एक हुआ था। जैसे अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग और उससे पहले भी अश्वेतों ने अपने खिलाफ दामन को लेकर संघर्ष किया था। साउथ अफ्रीका में जिस तरह नेल्सन मंडेला और उससे भी पहले कई लोगों ने नस्लीय भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई थी, उन्हें अत्याचार सहने पड़े, उनकी आवाज को दबाया गया। उन्होंने सब कुछ सहा और इतिहास बनाया।
यहां बात हो रही है फुले फिल्म की जो महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले की कहानी के मर्म को पूरी तरह से प्रकट करती है। यह एक फिल्म नहीं, यह एक आंदोलन की कथा है और इसे इस दृष्टि से ही देखना उचित होगा। फिर भी फिल्म के निर्देशक अनंत महादेवन ने बहुत ही संयम के साथ फिल्म में अन्याय और असमानता के खिलाफ इस पति पत्नी के संघर्ष की कहानी को उनके जीवन के कालखंड की सभी महत्वपूर्ण कड़ियों को जोड़ते हुए कहानी में पिरोकर बहुत खूबसूरती से पेश किया है। प्रतीक गांधी और पत्रलेखा का अभिनय बिल्कुल ही नेचुरल है। यह फिल्म कहीं से भी फिल्मी लगती ही नहीं है। यह आंदोलन का एक दस्तावेज है। इसीलिए जरूरी है कि आज हमारे इस बंटे हुए समाज में बढ़ रही वैमनस्यता के बीच पूरे परिवार के साथ जाकर इस फिल्म को जरुर देखना चाहिए। किस तरह से 200 साल पहले समाज में महिलाओं की स्थिति को उठाने के लिए, उन्हें पढ़ने का हक दिलाने के लिए इस दंपति ने संघर्ष किया, समाज के उच्च वर्ग की धमकी, उनके पैसे, उनके रसूख, उनकी घृणा, उनके अत्याचार और प्रताड़ना से डरे नहीं। उसका डटकर मुकाबला किया। क्योंकि वे जानते थे कि शिक्षा की अलख जो जल गई तो फिर शोषितों और वंचितों का जीवन बदल जाएगा।
जब उनकी शिष्या मुक्ता साल्वे ने समाज में भेदभाव आधारित व्यवस्था का चित्रण अपने निबंध में किया तो वह निबंध दलित साहित्य का पहला हस्ताक्षर बन गया। उनकी यह लड़ाई ब्राह्मणों के खिलाफ नहीं, बल्कि ब्राह्मणवादी वर्चस्व की सोच को एक पूरे समाज के खिलाफ बनाएं रखने की प्रवृत्ति के खिलाफ एक क्रांति थी।
ज्योतिराव फुले ने अपनी किताब “गुलामगिरी” में इस दमन-शोषण की शुरुआत और इसके दुष्चक्र का बखूबी वर्णन किया है। उच्च वर्ग द्वारा वंचितों-शोषितों की इस हालत के लिए उनके जन्म और जाति को जिम्मेदार बताते हुए इन अत्याचारों का जस्टिफिकेशन देकर अपनी नाइंसाफी से हाथ झाड़ लेने के रवैये के खिलाफ फुले दंपति ने क्रांति की मशाल जलाई थी। वह सावित्रीबाई फुले ही थी जिन्होंने पहली बार इस समाज को दलित का नाम दिया। वह महात्मा ज्योतिबा फुले ही थे जिन्होंने सत्यशोधक समाज की स्थापना कर समाज के नए नियमों की प्रस्तावना लिखी। जहां सामानता सबसे ऊपर थी। वे थॉमस पेन की किताब “राइट्स ऑफ मैन” से बेहद प्रभावित थे और यह किताब उनके लिए प्रेरणा का स्रोत थी। इस फिल्म की कुछ झलकियां इसके बेहतरीन डायलॉग में समाहित है।
“You know I have a dream… एक ऐसा समाज जिसमें कोई प्रधान न हो, सब समान हों.” –
“जो धर्म तर्क नहीं झेल सकता वह पाखंड कहलाता है।”
“अंग्रेजों की गुलामी तो सिर्फ सौ साल पुरानी है..अब इस गुलामी से लोगों को स्वतंत्र करना चाहता हूं जो 3,000 साल पुरानी हैं”
“फेंकने दो उन्हे गोबर, देखते हैं कौन पहले थकता है, वो या हम”
यह फिल्म ऑस्कर में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए पूरी तरह योग्य लगती है।
फिल्म के सभी कलाकारों का अभिनय स्वाभाविक लगता है। प्रतीक गांधी और पत्रलेखा दोनों ने ही ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के किरदार के साथ पूरा न्याय किया है। ज्योतिबा फुले के पिता के किरदार में विनय पाठक का अभिनय बेहतरीन है । फिल्म का संगीत फिल्म की कहानी को मजबूती देता है। फिल्म का संगीत रोहन रोहन ने दिया है जो कहानी के साथ पूरी तरह लय में सुनाई देता है। फिल्म के गीत लिखे हैं कौसर मुनीर और सरोश आसिफ ने। फिल्म का निर्देशन किया है अनंत महादेवन ने। फिल्म की कहानी अंत तक दर्शकों को बांधे रखती है।
भारत में भक्ति काल से लेकर अब तक वंचितों शोषितों की लड़ाई कई लोगों ने लड़ी है। पेरियार इसके उदाहरण बने। कई और लोग इसमें शामिल रहे। यह लड़ाई आज भी चल रही है। आज ऐसा लगता है, फुले दंपति की इस लड़ाई को लड़ने के 200 साल बाद भी हमारा समाज और भी विभक्त हो गया है। और भी बंट गया है, धर्म जाति, वर्ग इन सारे खांचों में बंटा समाज देश की प्रगति और सामाजिक समरसता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। एक बंटा हुआ समाज कभी भी सही अर्थों में प्रगतिशील नहीं हो सकता।