Phule Movie : ज्योतिराव फुले जिन्हें ज्योतिबा फुले के नाम से भी जाना जाता है, उन पर बनी फिल्म “Phule” रिलीज से पहले ही चर्चा में आ गई है। फिल्म का कुछ ब्राह्मण समुदायों द्वारा यह कह कर विरोध किया जा रहा है कि फिल्म ब्राह्मण विरोधी है और इसमें ब्राह्मणो को नकारात्मक रूप में दिखाया गया है। बहरहाल फिल्म 25 अप्रैल 2025 को रिलीज होने वाली है। ज्योतिबा फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले के जीवन पर आधारित यह फिल्म देखने के बाद ही दर्शक तय करेंगे कि इस फिल्म की वास्तविकता क्या है। यदि ज्योतिबा फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले के जीवन की बात की जाए तो उनके संपूर्ण जीवन से प्रेरणा लेने वाली कई बातें हैं। 19 वीं सदी में एक दलित जोड़े ने सामाजिक कुरीतियों, जातीय भेदभाव, महिला शिक्षा, विधवा उत्थान को लेकर जो अलख जगाई थी, वह अपने समय के न केवल क्रांतिकारी विचार थे अपितु भारत में समाज सुधार की धारा में एक महत्वपूर्ण कड़ी थे।
ज्योतिराव फुले, जो ज्योतिबा फुले के नाम से भी जाने जाते है, का जन्म 11 अप्रैल 1827 में सतारा जिले के एक माली जाति के परिवार में हुआ था। जो हिंदू वर्ण व्यवस्था में, शूद्र की श्रेणी में आते थे। फुले का नाम हिंदू देवता ज्योतिबा के नाम पर रखा गया था। उनका जन्म ज्योतिबा के वार्षिक मेले के दिन हुआ था । उनका परिवार कई पीढ़ी पहले सतारा से पुणे आकर बस गया था और वहां फूलों के गजरे आदि बनाने का काम करता था। इन लोगों को ‘फुले’ के नाम से पुकारा जाने लगा। ज्योतिबा ने अपनी शुरुआती पढ़ाई मराठी में की, लेकिन बीच में ही उनकी पढाई छूट गई। वक्त की मजबूरी ऐसी थी कि परिवार की मदद के लिए उन्हे दुकान और खेत दोनों जगह काम करना पड़ा। हालांकि, माली जाति के ही एक व्यक्ति ने उनकी बुद्धिमत्ता को पहचाना और फुले के पिता को उन्हें स्थानीय स्कॉटिश मिशन हाई स्कूल में जाने की अनुमति देने के लिए राजी किया। फुले ने 1847 में अपनी अंग्रेजी स्कूली शिक्षा पूरी की। उनकी शादी 13 साल की छोटी उम्र में 1840 में सावित्री बाई से हुई, जो बाद में स्वयं एक प्रसिद्ध समाजसेवी बनीं। दलित व स्त्रीशिक्षा के क्षेत्र में दोनों पति-पत्नी ने अपना सर्वस्व लगा दिया।
दलितों को शिक्षित होने के लिए किया जागरूक
फूले एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते थे, जहां व्यक्ति को उसके गुण और क्षमता से पहचाना जाए, ना कि उसके जन्म और जाति के आधार पर। ज्योतिबा फुले ने अपने विचारों को जन जन तक पहुंचाने के लिए कई किताबें भी लिखीं। अपने जीवन के शुरुआती काल में ही उन्होंने एक नाटक “तृतीय रत्न” लिखा। 1855 में प्रकाशित हुए इस नाटक में उनके समय के समाज में व्याप्त अंधविश्वास और शोषण की झलक दिखाई देती है। इस नाटक में खेती किसानी करने वाले एक मासूम और अंधविश्वासी पति-पत्नी को दिखाया गया था जो पुरोहित द्वारा शोषण का शिकार होते हैं।
स्त्री शिक्षा और अधिकारों के लिए जीवन किया समर्पित
दोनों का एक ही उद्देश्य था कि स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार मिल सके, बाल विवाह की प्रथा समाप्त हो और विधवा विवाह को समर्थन मिले। फुले सामाजिक कुप्रथा, और अंधश्रद्धा के जाल से समाज को मुक्त करना चाहते थे। अपना सम्पूर्ण जीवन उन्होंने स्त्रियों को शिक्षा प्रदान कराने में, स्त्रियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने में समर्पित कर दिया। उनके समय में स्त्रियां शिक्षा से वंचित थीं । यह बात उन्हें बहुत सालती थी।फुले महिलाओं को स्त्री-पुरुष भेदभाव से बचाना चाहते थे। उन्होंने लड़कियों के लिए भारत की पहली पाठशाला पुणे में बनाई थीं। उन्होंने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को शिक्षा दिलवाने में काफी मेहनत की। शिक्षा प्राप्त करने के बाद सावित्रीबाई फुले भारत की प्रथम महिला अध्यापिका बनीं।
उन्होंने विधवाओं और महिलाओं के कल्याण के लिए बहुत से ऐसे काम किए जो आज भी एक नज़ीर मानी जाती है। किसानों की हालत सुधारने और उनके कल्याण के लिए भी उन्होने काफी प्रयास किये। स्त्रियों की दशा सुधारने और उनकी शिक्षा के लिए फुले ने 1848 में एक स्कूल खोला। स्त्रियों की शिक्षा के लिए बना यह देश का पहला विद्यालय था। लड़कियों को पढ़ाने के लिए अध्यापिका नहीं मिलने के कारण उन्होंने कुछ दिन स्वयं पढ़ाने के बाद काफी प्रयास करके अपनी पत्नी सावित्री फुले को इस योग्य बना दिया कि वे लड़कियों को पढ़ाने लगीं। कुछ लोगों ने आरम्भ से ही उनके काम में बाधा डालने की चेष्टा की, किंतु जब फुले आगे बढ़ते ही गए तो उनके पिता पर दबाब डालकर पति-पत्नी को घर से निकालवा दिया। इससे कुछ समय के लिए उनका काम रुका अवश्य, पर शीघ्र ही उन्होंने एक के बाद एक बालिकाओं के तीन स्कूल खोल दिए।
उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं-गुलामगिरी, तृतीय रत्न, छत्रपति शिवाजी, राजा भोसला का पखड़ा, किसान का कोड़ा, अछूतों की कैफियत। महात्मा ज्योतिबा व उनके संगठन के संघर्ष के कारण सरकार ने ‘एग्रीकल्चर एक्ट’ पास किया।
ज्योतिबा फुले यह समझ चुके थे कि किसी भी वर्ग के उत्थान के लिए उसके जीवन में शिक्षा का बहुत बड़ा महत्व है। उनका मानना था कि हिंदू समाज में ब्राह्माणो के वर्चस्व का एक मुख्य कारण उनका शिक्षित होना था। बदलते वक्त के साथ ब्राह्मणों ने अंग्रेजी राज में अंग्रेजी शिक्षा भी प्राप्त कर ली थी, जिसकी वजह से समाज में उनका हमेशा से वर्चस्व रहा। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त कर लेने की वजह से ब्राह्मण समाज और अधिक शक्तिशाली हो गया और समकालीन सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासकीय जीवन में उसका एकाधिकार रहा।
वहीं दलितों में शिक्षा का अभाव होने की कारण वह अपनी स्थिति से उबर नहीं पाये थे। फुले के विचार और उनका समाज सुधार काफी हद तक शिक्षा पर केंद्रित था। उनका यही मानना था कि दलित समाज जिन में वे महिलाओं को भी शामिल करते थे, उन्हें ब्राह्मणवाद के शोषण से तब तक मुक्ति नहीं मिल सकती जब तक वह स्वयं को शिक्षित नहीं कर लेते। ज्योतिबा फुले शूद्र, अति शूद्र यानी समाज में जो अछूत थे उन्हें वह सम्मानजनक स्थान दिलाना चाहते थे। यही उनके जीवन का मिशन था। ज्योतिबा फुले का मानना था कि हिंदू धर्म जो वेद और स्मृति पर आधारित है, समय बीतने के साथ ब्राह्मणों द्वारा इसमें दर्शाई गई बातों को अपने ढंग से पेश किया जाता रहा है और इसे अपने हितों के लिए इस्तेमाल कर अपना वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश की गई है। साथ ही हिंदू समाज में वर्ण व्यवस्था की व्याख्या भी इसी वर्ग के हितों को ध्यान में रखते हुए इस तरह से की गई कि जिससे समाज में भेदभाव पैदा हुआ। वर्ण व्यवस्था को ईश्वर द्वारा प्रदत्त बताया गया जिसके पीछे मुख्य तौर पर ब्राह्मण वर्ग की मंशा बाकी समाज पर वर्चस्व स्थापित करना था। वे हमेशा ही शूद्रों के ऊपर ब्राह्मण वर्चस्व का विरोध करते रहे। वे हिंदू धर्म में इस भेदभावपूर्ण परिपाटी को मिटाकर समानता स्थापित करना चाहते थे। जहां दलितों को उनके अधिकार मिल सके।
शिक्षा का महत्व
समाज के शोषक तत्व से मुक्त होने के लिए ज्योतिबा फुले साक्षरता और खास तौर पर पाश्चात्य शिक्षा को महत्वपूर्ण हथियार मानते थे। उनका मानना था कि शिक्षा प्राप्त करके ही समाज में ब्राह्मण वर्चस्व को समाप्त कर समानता लाई जा सकती है। इतना ही नहीं वे शिक्षा को महिलाओं के लिए भी बहुत जरूरी मानते थे। उनका मानता था कि शिक्षा से ही महिला और पुरुष के बीच एक समानता लाई जा सकती है। जेंडर इक्वालिटी के लिए उन्होंने शिक्षा को बहुत महत्वपूर्ण बताया था और यही वजह है कि वही पहले ऐसे विचारक थे जिन्होंने महिलाओं की शिक्षा के लिए अभूतपूर्व कार्य किया और देश का पहला लड़कियों का स्कूल 1842 में स्थापित किया। 1873 अपने विचारों को मूर्त रूप देने के लिए और समाज में समानता स्थापित करने के लिए उन्होंने 1873 में “सत्यशोधक समाज” की स्थापना की। एक ऐसा समाज जो सत्य की खोज में हो, ऐसा समाज जो आधुनिक विचारों के साथ समानता स्थापित करना चाहता हो। इस समाज में लड़कियों के लिए शिक्षा बेहद जरूरी थी। साथ ही उन्होंने विधवा विवाह को लेकर भी कई अभियान चलाएं ।
एक प्रकार से कहा जा सकता है कि उन्होंने हिंदू व्यवस्था में रूढ़िवादी तत्वों का हमेशा विरोध किया जिससे समाज में कई वर्गो को उनका अधिकार नहीं मिल पाया था। उनका मानना था कि धर्म के नाम पर इस भेदभाव को और भी पुष्ट किया जाता है। जो एक समानता आधारित समाज बनाने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। ज्योतिबा फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले की जीवन पर पहले भी कई नाटक, फिल्में आदि बन चुकी हैं। दूरदर्शन पर डिस्कवरी ऑफ इंडिया के प्रसारण में ज्योतिबा फुले पर भी एक एपिसोड है। और अब यह फिल्म बनाई गई है, जिसमें उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं को दिखाने की कोशिश की गई है। लेकिन फिल्म के विरोध के चलते बार-बार इसकी रिलीज पर बाधा भी आ रही है।
“Phule” नाम की इस फिल्म का निर्देशन अनंत महादेवन ने किया है और इसका निर्माण डांसिंग शिवा फिल्म्स, किंग्समेन प्रोडक्शंस फिल्म्स और ज़ी स्टूडियो ने मिलकर किया है। यह फिल्म ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले के जीवन पर आधारित है। फिल्में में प्रतीक गांधी और पत्रलेखा मुख्य भूमिकाओं में हैं। पहले यह फिल्म ज्योतिबा फुले की जयंती के मौके पर 11 अप्रैल 2025 को रिलीज़ होने वाली थी। लेकिन इसे स्थगित कर दिया गया, अब “Phule” 25 अप्रैल 2025 को रिलीज़ होगी। ब्राह्मण समुदाय द्वारा फिल्म के विरोध और बॉयकॉट की बात को लेकर इस फिल्म की रिलीज में देरी हुई है। फिल्म के निर्देशक अनंत महादेवन का कहना है कि फिल्म में यथार्थ को दिखाया गया है, वह स्वयं एक ब्राह्मण है और इस फिल्म में ब्राह्मणों का चित्रण किसी भी पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर नहीं किया गया है।