History of Chhatarpur : मध्य प्रदेश का छतरपुर, महाराजा छत्रपति छत्रसाल के नाम पर बसाया गया था , गौरव गौरव पूर्ण इतिहास को अपने आप में समेटे ये नगर कभी मध्य भारत की एक रियासत हुआ करता था। बुंदेल राजा छत्रपति छत्रसाल महाराज ने औरंग जेब से युद्ध के लिये 1707 में इसकी स्थापना कर मुगलों को हराया था। प्राकृतिक ,भौगोलिक,ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अपने आप में महत्वपूर्ण क्षेत्र आज उपेक्षा का शिकार है। पर्यटन की दृष्टि से भी विश्व की धरोहर खजुराहो को अपने आप में समेटे है, लेकिन आवागमन के साधनों के अभाव में पिछड़ गया है। इस क्षेत्र में इतना नैसर्गिक सौंदर्य और आकर्षण है कि पर्यटक स्थल के रूप में इसका अच्छा विकास किया जाए तो, न सिर्फ इसे पर्यटन के विश्व मानचित्र पर स्थापित किया जा सकता है बल्कि से यहां के स्थानीय लोगों को भी बड़ा रोजगार मिल सकता है।
छतरपुर के अद्भुत नजारे
यदि इसके चारों ओर देखें तो छतरपुर की पूर्वी सीमा पर सिंघारी नदी और केन नदी बहती है ,पश्चिमी सीमा पर कठान और धसान नदी है। यह चारों ओर से पहाड़ और पठारों से घिरा शुष्क क्षेत्र है। अपने धरातलीय ढाल पश्चिम और उत्तरकी ओर होने से यहां छोटी मोटी नदियों का पानी केन और धसान में समाहित हो जाता है। इसीलिये कितने प्रयासों के बाद भी आज तक छतरपुर स्वयं प्यासा का प्यासा है। जिसकी प्यास आज तक कोई नही बुझा पाया। यही कारण है कि एक महत्वपूर्ण रियासत एवं जिला होकर भी यह विकास में अभी तक पिछड़ा है । पानी की कमी के कारण कोई भी उद्योग यहां नही पनप पाते । यहां की शुष्क और बंजर भूमि के कारण अधिकांश लोग बाहर जाकर कार्य करने के लिये विवश हैं। खास तौर पर मजदूर वर्ग ।
वर्षा पर निर्भर केवल खरीफ की ही फसल यहां पर हो पाती है। जिसमें कौदों ,धान लठारा, समां उड़द और तिली ही है। महुआ ,अचार ,बेर तेंदु मकोरा आदि जंगल अधिक होने से अधिक पाये जाते हैं । वनों की अधिकता के कारण यहां के लोग वनाफ़र कहलाते थे जो एक घुमन्तू जाति थी। जो एक जगह का जल स्त्रोत सूख जाने पर दूसरी जगह डेरा डाल लेते हैं। छतरपुर की सीमा देखें तो पूर्व में पन्ना पश्चिम में टीकमगढ़ ,दक्षिण में दमोह , दक्षिण-पश्चिम में सागर और उत्तर में उत्तर प्रदेश स्थित है।
छतरपुर का इतिहास
1707 ई. में इसकी स्थापना के पश्चात एक रियासत के रूप में 1785 में छतरपुर उभरा। कहते हैं कि पन्ना रियासत के राजकुमार सरनेत सिंह को जो बहुत क्रूर स्वभाव के थे उन्हें पन्ना से दूर राजनगर भेज दिया गया था। उनके सचिव सोने जू पंवार थे। सरनेत सिंह की मृत्यु के पश्चात उन्होंने सत्ता को हथिया कर अपना अधिकार कर किया और छतरपुर को अपनी राजधानी बनाया । इस प्रकार से पंदार वंश को राजा का अधिकार मिला। पन्ना नरेश हिन्दूपत ने छतपुर में सुंदर राजमहल का निर्माण कराया था । उस राजमहल की शोभा बढ़ाता है, बड़ा तालाब जिसे महाराजा प्रताप सिंह द्वारा बनवाए जाने के कारण प्रतापसागर भी कहते हैं।
इसी तालाब के किनारे नर्मदेश्वर मंदिर है जिसका निर्माण महाराज प्रताप सिंह ने करवाया था । छतरपुर की जल समस्या को दूर करने के लिये यहां का सबसे पुराना तालाब रावसागर है जो एक पहाड़ी की तलहटी में वर्षा के जल को रोकने के लिये सर्वप्रथम 1706 में राव हिम्मत राय जी कायस्थ ने बनवाया था । उसी तालाब के किनारे शिवमंदिर ,संकट मोचन के नाम से बना जो अपने नाम के अनुसार उस क्षेत्र के कष्ट हरण कर आज भी प्रसिद्ध मंदिर माना जाता है।
छतरपुर में जल समस्या की आपूर्ति के लिये हनुमान टौरिया के नीचे पहाड़ी के बरसाती जल संग्रह के लिये किशोर सागर भी बनाया गया । इसका निर्माण भी महाराज प्रताप सिंह ने पन्ना के राजा किशोर सिंह के संरक्षक बनाये जाने पर उनके नाम समर्पित किया। ग्वाल मगरा तालाब परमार कालीन राजाओं के समय ग्वालैं के सहयोग से बनने के कारण इसका नाम ग्वाल मगरा पड़ा । इस तालाब के किनारे सिद्धेश्वर महादेव का मंदिर और एक धर्म शाला है। छतरपुर शहर के बीचों बीच सभी के निस्तारण के लिये बना इसका अपना सौन्दर्य है। इस प्रकार से यहां की जल आपूर्ति के लिये प्रयास किये गये पर बुंदेल खंड का छतरपुर आज भी प्यासा है, जिसे प्रतीक्षा है किसी भागीरथ की जो उसका तरण तारण बन सके।
उषा सक्सेना
Disclaimer: लेख में व्यक्त सभी विचार और और जानकारियां लेखिका के अपने विचार हैं।