Shyam Benegal Movies: भारतीय फिल्म जगत में समानांतर सिनेमा आंदोलन की शुरूआत करने, सामाजिक एवं राजनीतिक पृष्ठभूमि की बेबाक बयानी और आथिर्क हालातों के निष्ठुर फिल्मांकन से भारतीय सिनेमा में एक नई क्रांति की शुरुआत का सेहरा श्याम बेनेगल को देना सर्वथा श्रेयस्कर होगा। उन्होंने अपनी फिल्मों के माध्यम से भारत के सामाजिक और राजनीतिक दृश्य एवं परिदृष्य को बहस में लाने का ऐसा ऐलान किया जो हमारी सोच और समझ को झकझोर देता है।
हाल ही में 90 वर्ष की उम्र में मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल का निधन हुआ है। श्याम बेनेगल का जाना हिंदी सिनेमा के एक युग के अंत के समान है। 70 के दशक में भारतीय सिनेमा की धारा को नई दिशा की तरफ ले जाने का श्रेय फिल्मकार श्याम बेनेगल को जाता है। सिनेमा जगत में “श्याम बाबू” के नाम से मशहूर श्याम बेनेगल ने अपनी ऑफ बीट फिल्मों के जरिए रियलिस्टिक और मानवीय संवेदना से भरपूर सिनेमा दर्शकों के लिए बनाया। आर्ट हाउस सिनेमा की परंपरा से निकले श्याम बेनेगल की फिल्में सिर्फ फिल्म फेस्टिवल्स और पुरस्कारों को जीतने के लिए बनी हुई फिल्में नहीं थी। इन फिल्मों में सामाजिक सरोकार, मानवीय दृष्टिकोण, सामाजिक – आर्थिक, जातीय और लैंगिक संप्रेषण की ऐसी कहानियां थी जो आर्ट और गैर आर्ट का फर्क किए बगैर दर्शको को एक अच्छे सिनेमा का पूरा रस देती थीं।
श्याम बेनेगल का सिनेमा सत्यजीत रे के सिनेमा की धारा की परंपरा से निकला हुआ अपने ही ढंग और मिज़ाज का सिनेमा था। 14 दिसंबर 1934 को हैदराबाद में जन्मे श्याम बेनेगल का मशहूर फिल्मकार गुरुदत्त से भी पारिवारिक नाता रहा था। जीवन के शुरुआती दौर में ही वह फिल्म निर्माण को अपना लक्ष्य और मंजिल बना चुके थे। इस सपने को पूरा करने के लिए वह 60 के दशक के अंतिम वर्षों में मुंबई पहुंच गए। फिल्म निर्माण से पहले उन्होंने कई वर्षों तक एडवरटाइजिंग एजेंसी में बतौर कॉपी एडिटर काम किया। अपने तमाम अनुभवों को समेटे हुए उन्होंने जो पहली फिल्म बनाई उस पहली फिल्म से ही वह भारतीय सिनेमा के एक बड़े हस्ताक्षर बन गए।
आज हम हम बात करेंगे श्याम बेनेगल की उन 8 चुनिंदा फिल्मों Shyam Benegal Movies की जिन्हे उनके फिल्मी नजरिए, कहानी कहने के अंदाज और उनके फिल्म की कहानियों के चयन को समझने के लिए जरूर देखना चाहिए। यूं तो उन्होंने अपने फिल्मी जीवन में कई फिल्मों का निर्माण किया था। लेकिन यहां हम कुछ ऐसी चुनिंदा फिल्मों की बात कर रहे हैं जो कई मायनो में उनकी बेहतरीन फिल्में होने के साथ उनके कथा शिल्प और फिल्म क्राफ्ट को भी दर्शाती है । इन फिल्मों को अवार्ड तो मिले ही, साथ ही ये इनमे अभिनय करने वाले कलाकारों की भी सशक्त फिल्में बन गईं।
1. अंकुर Ankur : 1974 में श्याम बेनेगल ने अपनी पहली फिल्म “अंकुर” बनाई। अपनी पहली ही फिल्म से वह कला सिनेमा में अपनी नई फिल्मी भाषा शैली और बुनावट से दर्शकों के दिलों दिमाग पर छा गए। अंकुर, शबाना आज़मी और अनंतनाग की डेब्यू फिल्म थी। अपनी पहली ही फिल्म से शबाना आज़मी ने भी अपने अभिनय का लोहा मनवाया। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। अंकुर को तीन राष्ट्रीय पुरस्कार मिले । इसके अलावा देश विदेश में कुल 43 अवार्ड इस फिल्म की झोली में गए। फिल्म में सामाजिक पैराडॉक्स को बखूबी दिखाया गया, जहां समाज में कास्ट सिस्टम की अवधारणाओं के बीच महिला पुरुष संबंधों की कंपलेक्सिटीज को दर्शाया गया था। इस फिल्म में अनंतनाग ने एक युवा जमींदार की भूमिका निभाई थी जो अपने पिता की सामंती विरासत को संभालना सीख रहा था।
फिल्म का नायक अनंतनाग एक शादीशुदा दलित महिला, शबाना आजमी के साथ अवैध रिश्ता कायम करता है। फिल्म में ऊंची जाति के सामंती पुरुष का दलित महिला से संबंध का चित्रण सामाजिक वर्ग और वर्ण भेद का कई स्तरों पर एक जटिल चित्रांकन पेश करता है। जहां प्रेम संबंध में , अस्पृश्यता, यौनिकता, घृणा,लाचारी, विद्रोह पश्चाताप, प्रेम और सामाजिक विद्रूपता के सभी रंग कहानी और पात्रों के जरिए सिनेमा के परदे पर नजर आते हैं। श्याम बेनेगल ने फिल्म इंडस्ट्री में आर्ट सिनेमा के कई दिग्गज कलाकारों को अपनी फिल्मों के जरिए लॉन्च भी किया था। शबाना आज़मी, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, अमरीश पुरी, स्मिता पाटिल, अमोल पालेकर, कुलभूषण खरबंदा से लेकर रजत कपूर, राजेश्वरी, किरण खेर जैसे कई कलाकार उनकी फिल्मों में अपने करियर का बेहतरीन अभिनय कर पाए।
2 मंथन Manthan : अंकुर के बाद 1976 में आई उनकी दूसरी फिल्म “मंथन” ग्रामीण भारत में वर्गीज कुरियन द्वारा शुरू किए कोऑपरेटिव मूवमेंट के संघर्ष को प्रेरक दास्तां के रूप में पेश करती है। फिल्म में ग्रामीण आकांक्षाओं और समकालीन भारत में डेयरी आंदोलन के शुरुआती संघर्ष को प्रभावी ढंग से दिखाया गया है। भारत की श्वेत क्रांति की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म क्राउड फंडिंग के जरिए बनाई गई थी। इस फिल्म के लिए 5 लाख किसानों ने अपना पैसा दिया था। “मंथन” भारत की पहली पूरी तरह क्राउडफंडेड फिल्म है। फिल्म में स्मिता पाटिल और गिरीश कर्नाड ने सशक्त अभिनय से जान डाल दी थी। यह फिल्म अर्थव्यवस्था के हाशिए पर पड़े समुदाय के संगठनात्मक शक्ति के रूप में उभरने की प्रेरणादायक कहानी है। मंथन को 1977 में सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था। फिल्म के गाने “मेरा गांव काथा पारे” के लिए गायिका प्रीति सागर को बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर का अवार्ड भी मिला था। बाद में यही गाना अमूल के टीवी विज्ञापन के साउंडट्रैक में भी इस्तेमाल किया गया।
3 भूमिका Bhumika : फिल्मी पर्दे पर फिल्मी दुनिया की अभिनेत्री की असली कहानी को उन्होंने इस फिल्म के जरिए दिखाया था। जहां पर्दे के पीछे की जिंदगी की सच्चाई अपने पूरे नंगेपन के साथ कई जगह फिल्म देखते हुए रोंगटे खड़े कर देती है। फिल्म में एक सफल अभिनेत्री के जीवन की कहानी का खुरदरा सत्य दर्शकों के सामने उजागर होता है। यह फिल्म एक स्त्री के दृष्टिकोण से उसके अपने ख्यालों के जीवन की तलाश की कहानी है। जो पूरी यात्रा में भटकने के बाद उसे फिर उसी पिंजरे में ले आने के लिए मजबूर कर देती है जिस पिंजरे को तोड़कर वह बाहर निकली थी। “भूमिका” कई सतहों पर नारी विचार स्वातंत्र्य और अंदर की लड़ाई की भी कहानी है।
फिल्म में स्मिता पाटिल ने ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मो की अभिनेत्री के जीवन की विडंबनाओ को, उस महिला की इच्छाओं के पंख कतरे जाने का क्रूर सत्य अपने जीवंत अभिनय से दिखाया था। वहीं अमोल पालेकर ने फिल्म में नकारात्मक किरदार के अनदेखे शेड अपने अभिनेय से बयां किये । अमरीश पुरी ने अपनी छवि को तोड़कर बहुत ही सहज अभिनय किया। फिल्म की कहानी मराठी फिल्मों के अभिनेत्री हंसा वाडकर से प्रेरित है। फिल्म को दो नेशनल अवार्ड भी मिले जिसमें स्मिता पाटिल को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए और सत्यदेव दुबे, श्याम बेनेगल और गिरीश कर्नाड को सर्वश्रेष्ठ स्क्रीन प्ले के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
4 मंडी Mandi : 1983 में श्याम बेनेगल ने मंडी का निर्माण किया। फिल्म की कहानी एक वेश्यालय और उसमें रहने वाली वेश्याओं के माध्यम से राजनीति, सत्ता और सहूलियत के साथ बदलती नैतिकता पर बड़े ही करीने से व्यंग्य करती है। फिल्म समाज की उस हिपोक्रेसी को दिखाती है, जहां नैतिकता के अर्थ, स्थान समय और सहूलियत के हिसाब से बदल जाते हैं। फिल्म की कहानी शहरीकरण से उजड़ती पुरानी बसावटों और महिलाओं की विपरीत परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता और संघर्ष को भी दर्शाती है। एक कोठे में रहने वाली महिलाओं की जिंदगी के बहाने यह फिल्म समाज के दोहरेपन की भी पोल खोलती हैं। फिल्म में शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल का बेजोड़ अभिनय देखने लायक है।
5 भारत एक खोज Bharat Ek Khoj : फिल्मों से इतर श्याम बेनेगल ने टीवी के लिए भी कुछ यादगार कार्यक्रम बनाए थे। जिनमें से एक है दूरदर्शन पर प्रसारित सीरीज “भारत एक खोज”। भारत के इतिहास में रुचि रखने वालों को यह सीरीज जरूर देखनी चाहिए। जहां भारत के “भारत” बनने का 5000 साल का इतिहास 53 एपिसोड में खूबसूरती से समेटा गया है। भारत एक खोज – जवाहरलाल नेहरू की किताब “डिस्कवरी ऑफ इंडिया” पर आधारित है। जो भारत के गौरवशाली अतीत, सांस्कृतिक विविधता और दार्शनिक विरासत का प्राचीन काल से देश के स्वतंत्र होने तक का इतिहास है। इस सीरीज में फिल्मों के उम्दा कलाकारों ने श्याम बेनेगल के निर्देशन में बेहतरीन काम किया और यह सीरीज एक तरह से टीवी की एक कालजयी कृति बन गई है।
6 सूरज का सातवां घोड़ा Suraj ka Satvan Ghoda : 80 के उत्तरार्ध और 90 के दशक की शुरुआत का वह ऐसा दौर था, जब समानांतर सिनेमा का वक्त बीतने को था। उसे दौर के फिल्मकार का बैकसीट पर चले गए थे। लेकिन श्याम बेनेगल ने हर वक्त और दौर को अपने तईं और कलेवर का सिनेमा बनाने का सफर जारी रखा। बिना किसी कलात्मक और सृजनात्मक समझौते के सामाजिक सरोकार और मानवीय संवेदना की कहानी कहते रहे । 1992 में आई “सूरज का सातवां घोड़ा” धर्मवीर भारती के उपन्यास पर आधारित है। जहां कहानी का कथा नायक अपने ही जीवन की अलग-अलग कालखंडो की प्रेम कहानियों के जरिए मानवीय संबंधों और सामाजिक हैसियत के बीच के उलझाव को व्यक्त करता है। फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था।
7 सरदारी बेगम Sardari Begum : श्याम बेनेगल अपने महिला चरित्रों को मजबूत किरदार में दिखाने के लिए जाने जाता थे। उन्होंने अपनी फिल्मों में मुस्लिम समाज की महिलाओं की कहानियों को भी नजदीकी से दिखाया। 1996 में रिलीज हुई “सरदारी बेगम” में अभिनय के लिए किरण खेर को 1997 का सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था। फिल्म की कहानी एक शास्त्रीय गायिका के जीवन और संघर्षों पर आधारित है। फिल्म में गायिका की निजी महत्वाकांक्षा और सामाजिक दबाव में उलझा हुआ जीवन दिखाया गया है। फिल्म की कहानी गायिका के सफर के जरिए एक पितृसत्तात्मक समाज में कलाकार की प्रतिभा को लैंगिक खांचो के बीच परिभाषित करती है। सरदारी बेगम का संगीत भी काफी लोकप्रिय हुआ था।
8 जुबैदा Zubeidaa : इसी कड़ी में 2001 में आई फिल्म जुबैदा श्याम बेनेगल की कमर्शियल फिल्मों के कलाकारों को लेकर बनाई बेहतरीन फिल्म थी। फिल्म में करिश्मा कपूर, मनोज बाजपेई और रेखा ने भूमिकाएं निभाई थी। फिल्म जुबैदा में भी स्त्री चरित्र के कई शेड्स दिखाई पड़े। जुबेदा की कहानी एक अल्हड़ और स्वतंत्र युवती के सामाजिक बंधनों और व्यक्तिगत सपनों के बीच चल रहे संघर्ष की कहानी है। जहां प्रेम पाने के लिए उसे बहुत से समझौते करने पड़ते हैं और एक युवा जीवन प्रेम, त्याग और महत्वाकांक्षा के बीच फंसकर खिलने से पहले ही मुरझा जाता है। मुख्य भूमिका में करिश्मा कपूर ने सपनों के टूटने की त्रासदी को अपने अभिनय से अलग स्तर पर पहुंचा दिया था।
80 पार के युवा श्याम बेनेगल
श्याम बेनेगल 80 वर्ष की उम्र के बाद भी फिल्म निर्माण में पूरी तरह सक्रिय रहे । उनकी आखिरी फिल्म मुजीब : द मेकिंग ऑफ अ नेशन उन्होंने उम्र के 87 वें वर्ष में बनाई थी। पिछले दो-तीन सालों से वे उतने सक्रिय नहीं थे, किंतु फिल्मों को लेकर उनका उत्साह और जिजीविषा एक युवा की तरह ही था।