Ayodhya : कौशल साम्राज्य का एक जनपद जिसका प्रथम नाम, साकेत और दूसरा नाम अजेय होने के कारण अयोध्या पड़ा। वाल्मीकि रामायण के अनुसार सूर्यपुत्र प्रजापति मनु ने ही इस पृथ्वी पर सूर्यवंश की स्थापना करते हुये सर्वप्रथम अपने राज्य की नींव डाली। उनके पुत्र इक्ष्वाकु ने अपने पिता के राज्य का विस्तार करते हुये अपने कुशल कौशल से सरयू नदी के तट पर जो नगर बसाया वह उनके अति प्रतापी होने के कारण, जिसे युद्ध में जीता न जा सके ऐसे अयोध्या (Ayodhya) नाम की नगरी बसी। उनके साम्राज्य का नाम कौशल राज्य था। बाद में यही कौशल राज्य दो भागों में बंट गया।
History of Ayodhya
(1) उत्तर कौशल (2) दक्षिण कौशल।
सरयू नदी के उत्तर वाला भाग जिसकी राजधानी अयोध्या थी, उसे उत्तर कौशल और दक्षिण वाला भाग आज का छत्तीसगढ़,दक्षिण कौशल कहलाया। इसकी राजधानी कुशावती थी। भगवान श्री राम चंद्र की माता कौशल्या दक्षिण कौशल की ही राजकुमारी थी। अयोध्या का दूसरा नाम साकेत था। कहते हैं कि इस पुरी को स्वयं मनु ने ही बनवाया था। जिसे उन्होने बाद मेंअपने सबसे बड़े पुत्र को राज्य सिंहासन पर अभिषिक्त करते हुये दिया था। तभी से इक्ष्वाकु वंश में राज्य सिंहासन का अधिकार राजा के रूप में बड़े पुत्र को ही देने की परम्परा प्रारम्भ हुई ।
अयोध्या कहलाती है सप्त तो पुरियो में महापुरी
अयोध्या की शोभा निराली होने से देवता भी ईर्ष्या करते थे। इस तरह से यह भारतीय संस्कृति का प्रथम नगर राज्य था, सप्त पुरियों में भी महापुरी की संज्ञा प्राप्त है । इसके विस्तार के विषय में कहा जाता है कि यह बारह योजन लम्बी और तीन योजन चौड़ी सरयू नदी के तट पर बसी परम पावन पुनीत नगरी थी। वेदों में इसका वर्णन देवों की नगरी के रूप में किया गया है। अथर्ववेद में इसका वर्णन करते हुये इसे कहा है कि *अष्टचक्र नवद्वारा देवतानां पुर अयोध्या*। अध्यात्म और दर्शन को समाविष्ट करती श्री राम नाम की रसधार बहाती अयोध्या के भगवान श्री राम की जन्मभूमि होने के कारण भारत की सप्तपुरी में इसे प्रथम स्थान प्राप्त है।
सप्तपुरी जो कहलाती हैं मोक्ष पुरी
सप्तपुरी ‘-(1) अयोध्या (2) मथुरा (3) मायापुरी (हरिद्वार) (4) काशी (5) कांचीपुरम -(दक्षिण की काशी ) (6) अवंतिका पुरी (7) द्वारिकापुरी। इन सप्तपुरियों को मोक्षपुरी भी कहा जाता है। वाल्मीकि रामायण में अयोध्या का विशद वर्णन करते हुये लिखा है, कि जिस प्रकार से देवराज इन्द्र ने अमरावती बसाई थी। उसी प्रकार से महाराज दशरथ ने अपने पूर्वजों से प्राप्त इस नगर अयोध्या को अपने धर्म और न्याय के बल पर एक महान राज्य का रूप देते हुये सजाया था। इस पुरी में सभी कलाओं के शिल्पी निवास करते थे। इस पुरी की सुरक्षा के लिये ही इसके चारों ओर गहरी खाईयां खुदी थी, जिसके कारण किसी का भी इस नगरी में प्रवेश दुर्गम होने से यह नगरी अजेय थी। इसे समतल भूमि पर बसाये जाने से यह नगरी सदैव ही धन-धान्य के भंडार से भरपूर थी। इस तरह अयोध्या नगर ही नहीं वरन् पौराणिक और धार्मिक रूप से एक तीर्थस्थल है जहां पर व्यक्ति निवास करते हुये जीवन मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। भगवान श्री राम की जन्मभूमि का अपने आप में ऐतिहासिक ,धार्मिक और पौराणिक महत्व होने के कारण Ayodhya की महिमा अपार है। जो हमारी सनातन भारतीय संस्कृति की गरिमा कहती गौरव युक्त होकर हमें गौरवान्वित करती है।
उषा सक्सेना-
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें।