Prayagraj: प्रयागराज को प्राचीन काल से ही तीर्थराज भी कहा जाता है। प्रयाग राज और तीर्थ राज के नाम के पीछे छिपा रहस्य आखिर है क्या ? प्रयागराज को तीर्थराज क्यों कहते हैं ?
प्रयागराज और तीर्थराज
कोई भी व्यक्ति हो या स्थान। किसी का नाम अपने आप में निहित उसके सार तत्व रुपी गुण को छिपाये रहता है। आईये आज हम प्रयाग के अर्थ को समझें प्र+याग = प्र का अर्थ है प्रथम या विशेष रूप से ,याग का अर्थ है यज्ञ इसका दूसरा अर्थ उत्सर्ग या बलिदान से भी है। यज्ञ के अंत में यज्ञ कर्ता के द्वारा समापन के समय भेंट में जो समर्पित किया जाता है वही बलिदान है, जिसे याग कहते है।इसके विषय में कहा जाता है कि सृष्टि की रचना और उसके विस्तार के लिये सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने अपने सभी मानस पुत्रों, देवताओं एवं ऋषि मुनियों का एक सम्मेलन बुलाया। जिसमें सभी ने अपने अपने सोच और चिंतन के अनुसार विचार रखे । उस समय का यह प्रथम “ज्ञान यज्ञ ” था। इसी में सभी के वैचारिक मानस मंथन के पश्चात ज्ञान की देवी सरस्वती का प्राकट्य हुआ था । सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी की पुत्री के रूप में उसे सभी ने स्वीकार किया।
उसके रूप सौंदर्य और ज्ञान को देख कर ब्रह्मा जी उस पर विमोहित हो गये और उन्होंने उस ज्ञान को केवल अपने ही आधिपत्य में लेना चाहा था । यही उनका मोह था जिससे उनके मन ने उसे केवल अकेले ही भोगना चाहा। जब कि वह ज्ञान सभी के वैचारिक मानस मंथन की उत्पत्ति थी। यहीं से व्यष्टि वाद और समष्टिवाद की उत्पति हुई । जो सबका है उस पर किसी एक अकेले का कभी भी आधिपत्य कैसे हो सकता है। सरस्वती ने अपने सृजन कर्ता पिता के रूप में उनकी प्रदक्षिणा करते हुये वंदना की । वह जिस ओर जाती ब्रह्मा जी उसी ओर लालायित दृष्टि से निहारने लगते। इस तरह चतुर्मुखी ब्रह्मा के चार वेद रूपी मुख प्रकट हो गये । यह देख कर कि अभी भी मेरा सृजन कर्ता मुझसे विमुख नही हुआ वे आकाश की ओर शब्द बन कर लीन हो गईं। तब ब्रह्मा जी आखेटक बनकर उनके पीछे भागने के लिये तत्पर हुये जिससे पांचवे मुख का सृजन हुआ। जो भोग का था, काम प्रवृत्ति को जागृत करने वाला। यह देख सभी ऋषि मुनि अपने पिता ब्रह्मा जी की भर्त्सना करते हुये त्राहि-त्राहि करने लगे।
यह देखकर भी उनका लालसा का लोलुप मन शांत नही हुआ और सरस्वती को पाने के लिये आकाश की ओर उछले। अब सरस्वती जो की ज्ञान की देवी थी किसी एक के प्रभुत्व में कैसे रहती,इसलिये नदी बन कर प्रवाहित हुईं। ब्रह्मा जी नद बन कर उनके पीछे दौड़े तो अपनी प्रवाहित धारा की दिशा बदल कर सरस्वती विलुप्त हो अंत: स्त्रावी हो गई। यह देख देवर्षि नारद ने कटु शब्दों में पिता की भर्त्सना की। सभी के मना करने पर भी जब वह नही माने तो शिव जी ने क्रोध में भर कर अपने त्रिशूल से उनके उस पांचवे वेद रूपी सिर का शिरोच्छेदन कर दिया। ग्लानि वश ब्रह्मा जी ने अपने शरीर का त्याग कर दिया किंतु मन में सरस्वती को अपने आधीन करने की लालसा के कारण अगले जन्म में उनकी अंतिम इच्छा की पूर्ति के लिये सरस्वती ने स्त्री रूप धारण कर उनकी पत्नी बनना स्वीकार किया। इस प्रकार से सरस्वती जी उनकी पुत्री और बाद में सृजन कर्ता के रूप में उनका आधिपत्य स्वीकार कर पत्नी बनी। उस यज्ञ में याग के रूप में ब्रह्माजी का यह प्रथम यज्ञ और बलिदान दोनों होने के कारण उस स्थान को प्रयागराज कहा जाता है।
प्रयागराज तीर्थराज कैसे हुआ ?
Why Prayagraj is called tirthraj.
तीर्थराज :-अब पुन: यक्ष प्रश्न अपना जवाब मांगता है कि प्रयागराज ही तीर्थ राज कैसे हुआ । यदि हम संधि विच्छेद करें तो ती +अर्थ = तीर्थ । ती का अर्थ यहां पर तीर तट या किनारा से है और अर्थ का सार तत्व मतलब से। इस प्रकार से इसका अर्थ हुआ वह पवित्र स्थान जहां व्यक्ति को भुक्ति से मुक्ति मिले । ब्रह्मा जी को सर्वप्रथम यहां पर ज्ञान यज्ञ के द्वारा जो बोध हुआ और भोगवाद से भी मुक्ति मिली। इसी लिये इस स्थान को तीर्थराज कहा गया। Prayagraj ऋषि मुनियों के ज्ञान यज्ञ की तपस्थली है, जहां ज्ञान की कोई सीमा नही। आप अपने ज्ञान को केवल अपने तक सीमित रख व्यष्टि वादी न बनें जो है वह हमने इस समाज से ही अर्जित किया है अत:उस पर समान रूप से सभी का अधिकार है। अब यह तो पात्र की पात्रता पर निर्भर है कि उस ज्ञान सागर में गोता लगाकर कौन कितने मोती चुनता है। गंगा यमुना के बीच ही तो गुप्त सरस्वती मानस मंथन से प्रचण्ड रूप में प्रवाहित हुई। यह इसका रहस्य है । इस तरह प्रयागराज, तीर्थराज भी बन गया।
उषा सक्सेना
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें।