Hanuman Ji : अहिरावण और महिरावण के वध के लिये हनुमान जी को पंचमुखी मुख एवं दस हाथ वाला रूप धारण करना पड़ा था । अहिरावण ने कामाक्षी देवी को अपनी भक्ति से प्रसन्न कर यह वरदान पाया था कि यज्ञस्थल की चारों दिशाओं और मध्य में जलते हुये पांचों दीपकों को जो एक साथ बुझायेगा वही उसे मार सकेगा । एक साथ चारो दिशाओं के साथ ऊर्ध्व मुखी दीप को बुझाना किसी के लिये भी संभव नही था । यह भेद विभीषण के द्वारा ज्ञात होने पर अपने बल और बुद्धि के द्वारा अपनी इच्छा के अनुसार रूप धारण करने वाले हनुमान जी ने पंच मुखी मुख और दस हाथों में सभी प्रकार के अस्त्र शस्त्र धारण किए फिर, देवी के सूक्ष्म रूप से ही विशाल रूप धारण कर राम लक्ष्मण को बंधन मुक्त कराया। उसके पश्चात अहिरावण और महिरावण से युद्ध करने के पूर्व अपने पांचों मुख से एक ही फूंक मे पांचों दीपक बुझा दिये । इससे अहिरावण को देवी के द्वारा प्रदत्त अमरता का वरदान समाप्त हो गया था ।
हनुमान जी के पाँच मुख :-
(१) वानर मुख :-पूर्व दिशा में सामने की ओर जो हनुमान जी का अपना स्वयं का वानर रूपी मुख है । उनका यह मुख हमेशा शत्रु पर विजय दिलाता है।
(२) नृसिंह मुख:- दक्षिण दिशा की ओर यह मुख भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार में हिरण्यकश्यप से उसके पुत्र भक्त प्रह्लाद की रक्षा करता हुआ अपने भक्तों को सभी प्रकार के संकटों से रक्षा करता हुआ अभय देता है ।
(३) गरुड़ मुख :-वानर मुख की दूसरी ओर पश्चिम दिशा में यह मुख भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ जी के रूप में जीवन में आये सभी संकटों से रक्षा करता है । राम लक्ष्मण को जब मेघनाद ने नाग पाश में बांधा था तो उस समय हनुमान जी के कहने पर स्वयं गरुड़ जी ने उनके बंधन काट कर उन्हें नाग पाश से मुक्त किया था । इसीलिए इस मुख को वंदनीय रूप में प्रार्थना करने पर यह मुख जीवन में आये सभी संकटों से बंधन मुक्त करता है ।
(४) वाराह मुख:- उत्तर दिशा में स्थित यह मुख भगवान विष्णु के द्वारा पृथ्वी को हिरण्याक्ष के द्वारा रसातल में ले जाने पर वाराह रूप धारण कर जल के अंदर ही हिरण्याक्ष से युद्ध करते हुये उसका संहार कर पृथ्वी को हिरण्याक्ष की कैद से मुक्त करने की कथा कहता है। इस मुख का दर्शन सदा जीवन में सुख और समृद्धि को देता है ।
(५) हयग्रीव मुख :-ऊपर आकाश की ओर यह मुख भगवान विष्णु के हयग्रीव की कथा कहता है। जब हयग्रव दैत्य जो कि अत्यंत बलवान था। वह ब्रह्मा के हाथ से चारों वेदों को ले जाकर समुद्र में डुबो कर स्वयं भी उसी में छिप जाता है । तब वेदों की रक्षा के लिये स्वयं भगवान विष्णु हयग्रीव का रूप धारण कर उससे युद्ध करते हुये पराजित कर वेदों का उद्धार करते हुये ब्रह्मा जी को सौंपते हैं । उनका यह ज्ञान, बुद्धि और विवेक का प्रतीक है ।
पंच वक्त्रं महा भीमं त्रिपंचनयनैर्युतम् ।
बाहुभिर्दशभुजयुक्तं सर्वकामार्थ सिद्धिदम्।।
।। जै हनुमान।।
ऊषा सक्सेना
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें।