Pitambara Peeth : कोई भी स्थल यूं ही शक्ति पीठ नहीं बन जाता। उसके बनने के पीछे एक लम्बा इतिहास छिपा होता है। ऐसी ही कठोर तप, घोर साधना, त्याग बलिदान की कहानी है माता बगलामुखी पीताम्बरा देवी को दतिया में स्वामी जी के द्वारा स्थापित करने की। उनका नाम कोई नहीं जानता। वह कहां से आये थे यह भी उन्होंने कभी किसी को नही बतलाया। वह स्वयं एक आजन्म ब्रह्मचारी के साथ ही परिव्रजाकाचार्य दंडी स्वामी थे। बस यही उनका एक मात्र परिचय है जो सभी को ज्ञात था।
मां बगलामुखी को स्थापित करने के लिए किया कठोर तप
जहां पर आज इतना बड़ा पीताम्बरा पीठ बगलामुखी देवी के साथ ही सातवीं महाविद्या धूमावती देवी का शक्ति पीठ भी है, जिनका सौभाग्यवती स्त्रियों के लिये दर्शन वर्जित है । पहले यहाँ पर श्मशान था, जहां कोई आता जाता नहीं नगर से बाहर आज वही स्थान स्वामी जी और माता पीताम्बरा के आशीर्वाद से गुलजार है। जिसकी शायद कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। सन् 1935 में दतिया के महाराज शत्रुजीत सिंह बुंदेला के सहयोग से स्वामी जी ने अपना आश्रम एक कुटिया के रूप में बनाया जहां पर वह एकांत में तप किया करते थे। मांँ बगलामुखी ने एक दिन उन्हें स्वप्न में दर्शन दिये। तब वह माता के दर्शन के लिये हिमाचल के कांगड़ा जिले के वनखंडी क्षेत्र में गये और वहां पर माता को अपने साथ दतिया लाने के लिये घोर तप करते हुये कठिन साधना की ।उनके तप और साधना से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें दर्शन दिये और वरदान मांगने को कहा -तब स्वामी जी ने देवी से प्रार्थना करते हुये कहा कि वह उनके साथ उनकी तपस्थली दतिया चलकर वहां विराजमान हों ।
देवी ने तथास्तु ! कहते हुये कहा :-“मैं तुम्हारे साथ तुम्हारी मनोकामना पूर्ण करने के लिये चल तो सकती हूं परंतु मेरी भी एक शर्त है। मैं एक तांत्रिक देवी हूं और तंत्र शास्त्र के अनुसार देवी बलि मांगती है वह भी नर बलि ,बोलो दे सकोगे मुझे स्थापित करने के लिये नर बलि । स्वामी जी देवी की बात सुनकर कुछ क्षण मौन रह कर कुछ विचारते हुये अंत में बोले।
स्वामी जी:-“अवश्य !यदि माता कि यही इच्छा है और दतिया में स्थापना की शर्त, तो अवश्य ही मैं उसे पूरा करूंगा किंतु वहां पर आपकी स्थापना और यज्ञ के पश्चात मैं आपको आपकी इच्छित बलि दूंगा। यह सुनकर देवी स्वामी जी के साथ दतिया आ गईं तब तक दतिया में उनके लिये महाराज एवं जन सहयोग से मंदिर बन चुका था। अब केवल देवी जी की मूर्ति स्थापना और यज्ञ शेष था। सभी ने स्वामी जी के आने के पश्चात उनका स्वागत करते हुये धूमधाम से देवी की मूर्ति स्थापना की और यज्ञ किया। नौ दिन तक वह यज्ञ चलता रहा। अब देवी की स्थापना और यज्ञ के पश्चात पूर्णाहुति में नरबलि के लिये देवी ने स्वामी जी को फिर स्वप्न में कहा मेरी बलि अभी शेष है। वह नर बलि कब और किसकी दोगे। स्वामी जीने विचार करते हुये कहा “देवी आपकी प्रसन्नता के लिये मैं किसी और का बलिदान क्यों करूं अपनी ही भेंट मैं आपको दूंगा। आप इसे ही सहर्ष स्वीकार करें। और तब वह देवी के सामने यज्ञ स्थल के पास अन्न जल का परित्याग करते हुये बैठ गये। देवी तो स्वामी जी की परीक्षा ले रहीं थी।
उन्होंने कहा बस बहुत हुआ। पर स्वामी जी बोले मां मैनें आपको वचन दिया था और आप इसी शर्त पर यहां आई हैं। अत:अब मुझे भी अपना वचन पूरण करने दें कहकर ध्यानावस्था में अपने प्राण ब्रह्मरंध्र में स्थापित कर प्राण त्याग दिये। देवी अपने भक्त रूपी पुत्र का यह आत्म बलिदान नहीं देख सकीं इसीलिये उन्होंने अपनी दृष्टि को फेरते हुये मुँह टेढ़ा कर लिया। स्वामी जी की उस स्थल पर बनी हुई समाधि और देवी का उस ओर न देखना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है ।
जै माता पीतामबरा । सभी की मनोकामना पूर्ण करें ।
उषा सक्सेना
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें।