Monday, April 20, 2026
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Ramdhari Singh Dinkar: “दो राह, समय के रथ का घर्घर- नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।”

Ramdhari Singh Dinkar

by KhabarDesk
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Ramdhari Singh Dinkar

Ramdhari Singh Dinkar: ‘कुरूक्षेत्र’ के प्रथम सर्ग में रामधारी सिंह दिनकर लिखते हैं,

वह कौन रोता है वहां–
इतिहास के अध्याय पर,
जिसमें लिखा है, नौजवानों के लहू का मोल है
प्रत्यय किसी बूढ़े, कुटिल नीतिज्ञ के व्यवहार का;
जिसका ह्रदय उतना मलिन कि शीर्ष वलक्ष है;
जो आप तो लड़ता नहीं,
कटवा किशोरों को मगर,
आश्वस्त होकर सोचता,
शोणित बहा, लेकिन, गयी बच लाज सारे देश की?

आधुनिक भारत के राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर ने समसामयिक सामाजिक और राजनीतिक चेतना को झकझोर देने वाली रचनाओं के माध्यम से हमें एक घुप्प अंधकारमय और अनिर्णित सामाजिक और राजनीतिक वातावरण को तोड़ने की प्रेरणा दी है। ऐसे में एक बार फिर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर (23 सितंबर 1908 24 अप्रैल 1974) को याद करना न सिर्फ वर्तमान पीढ़ी की सामाजिक और राजनीतिक चेतना और विमर्श को नई दिशा दिखाने के लिए अहम हो सकता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह एक संदेश भी होगा। ओजस्वी कवि रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar) का जन्म बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गांव (तब के मुंगेर जिला में) 23 सितंबर 1908 को हुआ था।

दिनकर का रचना संसार

दिनकर की रचनाओं में उनकी भाषा में एक ख़ास किस्म की उर्जा के साथ सम्मोहन देखने को मिलता है, जो हमारी चेतना को उद्वेलित कर देती है। यही वजह है कि उनकी कविताओं में समाज और राष्ट्र के लिए आह्वान, विचारों का विस्तार किसी खास कालखंड मात्र को प्रभावित नहीं करता, बल्कि उनकी कृतियां कालातीत होकर भी समकालीन और आज भी प्रासंगिक है।

शान्ति नहीं तबतक, जबतक
सुख – भाग न नर का सम हो,
नहीं किसी को बहुत अधिक हो, नहीं किसी को कम हो।

Ramdhari Singh Dinkar का प्रारंभिक काल

बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गांव में 23 सितंबर 1908 को जन्मे रामधारी सिंह दिनकर की प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई। मोकामा घाट हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद 1932 में उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से इतिहास में बीए ऑनर्स की डिग्री प्राप्त की। बीए ऑनर्स करने के बाद एक स्कूल में वह प्रधानाध्यापक नियुक्त हुए। कुछ दिनों बाद 1934 में बिहार सरकार के अधीन उन्होंने सब रजिस्ट्रार का पद स्वीकार कर लिया और लगभग 9 वर्षों तक वह इस पद पर रहे। इस दौरान बिहार के ग्रामीण इलाकों की पीड़ा और विषमता को और भी गहराई से जानने के क्रम में उनकी बौद्धिक जिज्ञासा ने उनकी लेखनी को विस्तार दिया। इसका प्रभाव उनके अंतर्मन पर भी पड़ा। यही वजह है कि भावनाओं की तीव्रता का प्रभाव उनकी लेखनी में उभर कर आया है।

कार्यक्षेत्र

1947 में आजादी के बाद,बिहार विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक व विभाग का अध्यक्ष नियुक्त होकर मुज़फ्फ़रपुर आ गए। 1952 में जब भारत की प्रथम संसद का गठन हुआ तो उन्हें राज्यसभा का सदस्य चुना गया और वह दिल्ली आ गए। 12 वर्षों तक संसद सदस्य रहने के बाद उन्हें 1964 से 1965 तक भागलपुर विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया। लेकिन 1 वर्ष बाद ही 1965 में उन्हें भारत सरकार में हिंदी सलाहकार के पद पर नियुक्त किया गया और वे दिल्ली आ गए।

दिनकर की काव्य-धारा

दिनकर अपनी लेखनी में छायावाद और व्यक्ति की मुक्ति के स्थान पर समाज की मुक्ति की बात सीधे-सीधे रखते हैं। कल्पनाशीलता, अतिशय भावुकता और रूमानियत के उलट वे राष्ट्र और समाज की अभिव्यक्ति की आवाज बने। दिनकर का समस्त काव्य राष्ट्रीय उत्थान और जागरण की प्रेरणा है। “कुरुक्षेत्र”, “हुंकार” और “रेणुका” जैसी काव्य कृति में दिनकर का राष्ट्रीय प्रेम सजग होकर तीव्रता से प्रवाहित हुआ है। राष्ट्र-प्रेम और सामाजिक चेतना का समन्वय उनकी लेखनी के माध्यम से आज तक निरंकुश सत्ता के विरुद्ध ध्वजवाहक के रूप में आमजन की आवाज़ बनी रही।
दिनकर इंकलाब के कवि के तौर पर जाने जाते हैं और वह जन भावनाओं के गायक हैं। कुरुक्षेत्र की रचना के समय भारत की जो दयनीय दशा थी, वह इनमें ध्वनित हो उठती है।

जीवन दर्शन

दिनकर का जीवन दर्शन उनका अपना जीवन दर्शन है, उनकी अपनी अनुभूति से अनुप्राणित और उनके अपने विवेक से स्थापित निरंतर प्रगतिशील है।
दिनकर की कविताओं में हमें प्रतिवादी, जनवादी, मानववादी धाराओं का परिचय तो मिलता ही है, साथ ही जीवन की गहराइयों को समसामयिक विषयों के धरातल पर लाने की उत्कट् इच्छा भी दिखाई पड़ती है। दिनकर की प्रगतिशीलता एक ऐसी सामाजिक चेतना का परिणाम है, जो मूलत: भारतीय है और राष्ट्रीय भावना से परिचालित है।

गांधीवादी और गांधी विरोधी दिनकर

गांधीवादी और अंहिसा के समर्थक होते हुए भी “कुरुक्षेत्र ” में वह कहते हैं- ‘ कौन केवल आत्मबल से जूझ कर, जीत सकता देह का संग्राम है, पाशविकता खड्ग जो लेती उठा, आत्मबल का एक वश चलता नहीं। योगियों की शक्ति से संसार में, हारता लेकिन नहीं समुदाय है।

पुरूस्कार

दिनकर को सत्ता के विरोधी के रूप में भी जाना जाता है। बाबजूद इसके तत्कालीन प्रधानमंत्री, नेहरू से उनके आत्मीय संबंध रहे! भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मभूषण से अलंकृत किया गया। “संस्कृति के चार अध्याय” के लिए साहित्य अकादमी और “उर्वशी” के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया।
दिनकर जी को “कुरुक्षेत्र” के लिए इलाहाबाद की साहित्यकार संसद द्वारा पुरस्कृत किया गया।

दिनकर आज भी प्रेरणास्रोत

26 जनवरी 1950 के अवसर पर उनकी लिखी ये पंक्तियां-

सदियों की ठंडी – बुझी राख सुग बुगा उठी
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती हैं,
दो राह, समय के रथ का घर्घर- नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो की जनता आती है।”

हमें आजादी मिलने के बाद गणतंत्र बनने के क्रम में आई विसंगतियों और दर्द को बयां करती है। आजादी के बाद भी व्यवस्था वैसी नही बदली जिसकी अपेक्षा जनमानस को थी! दिनकर नेहरू विरोधी भी रहे हैं और गांधी से भी अपनी असहमति जताते दिखे हैं, “परशुराम की प्रतीक्षा” में हमें इस भाव का परिचय मिल जाता है। यही कारण है कि आज देश में दिनकर का नाम एक कवि के रूप में नहीं, बल्कि जन कवि के रूप में जाना जाता है। दिनकर की प्रासंगिकता को इन पंक्तियों के माध्यम से पूरे विश्व के लिए चेतावनी के साथ एक संदेश भी है :

पापी कौन? मनुज से उसका
न्याय चुराने वाला?
याकि न्याय खोजते विघ्न का
सीस उड़ाने वाला?

जय पी स्वर्ण

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