Petha : गर्मियों में जब मीठा खाने का मन करता है तो जलेबी, लड्डू बर्फी जैसी भारी मिठाइयां खाने का मन नहीं करता। कुछ हल्की, घी तेल के बिना ठंडी और रसीली मिठाई खाने को जी चाहता है। गर्मियों में खाई जाने वाली मिठाई की बात की जाए तो पेठे का नाम सबसे पहले आता है। साधारण सी दिखने वाली इस मिठाई का इतिहास काफी पुराना है। शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने आगरे के पेठे का स्वाद ना चखा हो। यह मिठाई देश ही नही बल्कि विदेशों में भी काफी पसंद की जाती है। मुगल काल की इस प्रसिद्ध मिठाई की शुरुआत आगरा से हुई थी । आगरा को ताज नगरी के साथ-साथ पेठा नगरी के नाम से भी जाना जाता है। आईए जानते हैं कि पेठे का इतिहास कितना पुराना हैं और यह प्रसिद्ध मिठाई किस तरह से दुनिया भर में इतनी मशहूर हुई।
पेठे का इतिहास:
भारतवर्ष में पेठे का इतिहास बहुत पुराना है। जब भी कोई मेहमान आगरा आते थे तो पेठे की मिठाई अवश्य साथ लेकर जाते थे। पुराने समय से इस स्वादिष्ट सफेद मुलायम मिठाई ने लोगों के दिलों में खास जगह बना रखी है । आज भी आगरा की पहचान दो चीजों से की जाती है एक तो आगरा का विश्व प्रसिद्ध ताजमहल और दूसरा आगरे का पेठा। जो आप बड़े चाव से खाते हैं। आगरा आए मेहमानों ने अगर पेठा नहीं खाया तो उनकी आगरा की यात्रा अधूरी रहती हैं । आगरा के पेठे का इतिहास भी लगभग उतना ही पुराना है ,जितना की ताजमहल का इतिहास है। ऐसा माना जाता है कि आगरा के पेठे की शुरुआत शाहजहां के काल में हुई थी। इस मिठाई को सबसे पहले रसोइयों ने शाहजहां की रसोई में इजाद किया था । इसके पीछे भी कई प्रकार की कहानियाँ मशहूर हैं ।
ताजमहल और पेठे का रिश्ता:
आगरा के पेठे को लेकर अलग-अलग तरह के किस्से और कहानी मशहूर है । ताजमहल और आगरा का पेठा लगभग एक अरसे से अस्तित्व में है। जितना पुराना इतिहास ताजमहल का है उतना ही पुराना इतिहास आगरे के पेठे का भी है । ऐसा माना जाता है कि मुगल काल में शाहजहां के शासनकाल के दौरान पेठे की मिठाई का आविष्कार हुआ था । ताजमहल के निर्माण के दौरान शाहजहां ने अपने रसोइयों से एक ऐसी मिठाई बनाने को कहा था, जिसका रंग ताजमहल की तरह सफेद हो। शाहजहां के इस आदेश के बाद सभी रसोईए एक नए प्रकार की मिठाई बनाने में कड़ी मशक्कत करने लगे, इसके बाद सफेद पेठा तैयार हुआ।
ऐसा भी कहा जाता है कि 1631 और सन 1648 के बीच जब आगरा में ताजमहल बन रहा था तो उनके मजदूरों को कमरतोड़ मेहनत करने के बाद कुछ मीठा खाने के लिए देना था। जो कि खाने में स्वादिष्ट भी हो और सेहत के लिए अच्छा भी हो । इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए रसोइयों ने कुम्हडे से एक अलग प्रकार की मिठाई तैयार की जो सस्ती आसान और खाने में स्वादिष्ट थी। जिसे पेठा का नाम दिया गया। यह मिठाई सस्ती और तुरंत एनर्जी देने वाली थी । इसके बाद से पेठा आगरा की शान बन गया।
एक अन्य कहानी के अनुसार प्राचीन काल में कुशमांडू ऋषि हुआ करते थे। जिनकी समाधि स्थल पर इसकी उत्पत्ति मानी जाती है । 1940 में खेत में उगने वाले एक साधारण से फल को काटकर छीलकर उसे गुण और खाड़ में मिलाकर खाया जाता था। जिसे बाद में पेठे का नाम दिया गया। पेठे के जनक आगरा नूरी दरवाजे के रहने वाले “गोकुल चंद्र गोयल” को माना जाता हैं। इन्होंने ही एक साधारण से फल को पेठे का रूप देकर उसकी सुगंध और स्वाद को पूरे दुनिया भर में प्रसिद्ध किया। 1940 में उन्होंने इस पेठे के फल में खुशबूदार इत्र और चीनी मिलाकर इसे स्वादिष्ट मिठाई का रूप दे डाला। जिसे बाद में पेठे का नाम दिया गया इसे लोगों ने बहुत पसंद भी किया। इसके बाद से गोकुल चंद ने अपना काम नूरी दरवाजे पर शुरु किया।
पेठे का औषधीय उपयोग:
पेठे के कारीगरों का कहना है कि पेठे का इतिहास बहुत पुराना है। उस समय से पेठा अलग-अलग नाम से जाना जाता था। पुराने वैध और हकीम लोग इस पेठे का उपयोग शरीर के कई रोगों को ठीक करने में किया करते थे। उस समय पेठे को एक मिठाई के साथ-साथ औषधि के रूप में भी जाना जाता था। पेठे को कुशमांडू फल कहा जाता था। इस फल से पीलिया, पेट की पथरी, लीवर, आंखों की रोशनी, बालों का झड़ना, जैसे कई बीमारियों को ठीक करने में प्रयोग किया जाता था। बाद में इस सूखे मेवे, केसर, इलायची और चाशनी के साथ मिलाकर एक मिठाई की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा।
पेठे के अलग-अलग स्वाद:
समय के साथ बदलते परिवेश ने और खान-पान के तरीकों ने पेठे में नए स्वाद का ईजाद किया। आज बाजार में अलग-अलग स्वाद के पेठो की बिक्री की जाती है। जैसे अंगूरी पेठा ,इलायची पेठा ,चॉकलेट पेठा, गुलाब पेठा, डोडा बर्फी पेठा, पान पेठा, केसर पेठा, आदि तरह-तरह के स्वाद में पेठे उपलब्ध है।औषधीय गुणो से भरपूर होने के कारण इसका नाम संस्कृत शब्द “कुष्मांड” नाम रखा गया। पेठे की मिठाई में किसी भी तरह के वसा और चिकनाई का प्रयोग नहीं किया जाता है। यह मिलावट से दूर रहता है। यह फाइबर युक्त पेठा सेहत के लिये काफी फायदेमंद होता है। आज 56 प्रकार के पेठे देश विदेश तक अपनी खुशबू बिखेर रहें हैं।
बबीता आर्या