Britain : दुनिया में औद्योगिक क्रांति ( Industrial Revolution) के जनक माने जाने वाले ग्रेट ब्रिटेन ने औद्योगिक क्रांति के जरिए दो शताब्दी पहले दुनिया को आधुनिकता की तेज रफ्तार दी थी और लगभग आधी दुनिया पर अपना वर्चस्व भी कायम किया था। ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति में बिजली के उपयोग ने बहुत बड़ा योगदान दिया था। बिजली के उत्पादन के लिए पहले कोयले का ही इस्तेमाल किया जाता था। उद्योगों और आधुनिक जीवन शैली में बिजली के प्रयोग से ब्रिटेन कई शताब्दियों तक आधुनिकता के दौड़ में अग्रणी बना रहा।
युग बदला तो कोयला बना दुश्मन
आधुनिकता की दौड़ में कोयले के इस्तेमाल से प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी सवाल भी खड़े हुए। पर्यावरण के खतरे की दृष्टि से दुनिया के अधिकांश देशों ने ग्रीन और क्लीन एनर्जी को अपनाने में ही समझदारी जानी। ग्रीन और रिन्यूएबल एनर्जी को चरणबद्ध रूप से 100 फीसदी अपनाने के लक्ष्य में अब ग्रेट ब्रिटेन ने एक बड़ा मुकाम हासिल कर लिया है। Britain के इस मिशन के पीछे अतंरराष्ट्रीय संस्था संयुक्त राष्ट्र (UN) का बड़ा योगदान रहा है।
PARIS AGREEMENT पेरिस एग्रीमेंट
विकसित देशों के बेतहाशा औधोगिक विकास, अनियंत्रित बढ़ता शहरीकरण और बढ़ती जनसंख्या के दवाब ने पावर सेक्टर यानी बिजली उत्पादन पर विशेष जोर डाला। पारम्परिक तौर पर उर्जा उत्पादन का सबसे सस्ता और आसान विकल्प थर्मल उर्जा रहा है, यानी कोयले से पावर प्लांट में बिजली उत्पादन। लेकिन तेजी से इसके दुष्परिणाम भी दिखने लगे, जिसका कुप्रभाव पूरे विश्व पर छाने लगा। औधोगिक विकास की होड़ में चीन, भारत, ब्राजील और मैक्सिको जैसे कई अन्य देशों ने पिछले चार दशक में अपनी औधोगिक क्षमता बढ़ाने और बढ़ती जनसंख्या की जरूरतों को पूरा करने के लिए अधिक से अधिक थर्मल उर्जा संयंत्र स्थापित किए। नतीजा- प्रदूषण का उत्सर्जन और ग्रीन हाउस गैस के निर्माण के कारण पूरे विश्व में क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वार्मिंग जैसे संकट का खतरा मंडराने लगा।
इसी खतरे को देखते हुए UN के तत्वावधान में पेरिस में दुनिया के देशों ने 12 दिसंबर 2015 को एक एतिहासिक एग्रीमेंट (संधि) पर हस्ताक्षर किए। इस एग्रीमेंट का दीर्घकालिक लक्ष्य था- सभी देशों को निर्देशित करना कि किस तरह क्लाइमेट चेंज के खतरे से निपटने के लिए ग्रीन और क्लीन एनर्जी के विकल्पों पर काम किया जाए। लक्ष्य रखा गया कि ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन को पर्याप्त रूप से कम कर पूर्व औधोगिक काल के वैश्विक तापमान में वृद्धि 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक ना रहे। और यह कोशिश जारी रहे कि वैश्विक तापमान में यह वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक ना पहुंचे। इस महत्व को समझते हुए क्लाइमेट चेंज के खतरे और दुष्प्रभाव को काफी कम किया जा सकता है। यह एग्रीमेंट विधिक रूप से बंधित अंतर्राष्ट्रीय संधि है (Legally binding international treaty), जो 4 नवंबर 2016 को लागू हुआ। इसके 195 (194 राष्ट्र और यूरोपीय यूनियन) सदस्य देश हैं।
पूरी दुनिया में ग्रीन और क्लीन एनर्जी को लेकर मुहिम चल पड़ी
Britain ने बंद किया आखिरी कोयला चालित बिजली संयंत्र
ग्रीन और रिन्यूएबल एनर्जी की दिशा में ब्रिटेन एक बार फिर अग्रणी साबित हुआ है। ब्रिटेन में अब एक भी संयंत्र में कोयले द्वारा बिजली उत्पादन नहीं होगा। ब्रिटेन में कोयले से चलने वाले आखिरी बिजली संयंत्र को बंद कर दिया है। 142 साल पुराने इस कोयला बिजली संयंत्र को 29 सितंबर को बंद कर दिया गया। सेंट्रल लंदन में Ratcliffe-On -Soar Station नामक इस बिजली संयंत्र को 142 साल के सफल संचालन के बाद बंद कर दिया गया।
जी 7 देशों में ब्रिटेन बना नंबर वन
यूके की सरकार ने इस संयंत्र को बंद करने को ग्रीन और क्लीन एनर्जी लक्ष्य की दिशा में मील का पत्थर बताया है। ब्रिटेन का 2030 तक पूरे देश में केवल रिन्यूएबल संसाधनों द्वारा ही बिजली प्राप्त करने का लक्ष्य है। प्लांट के मैनेजर ने बताया कि यह उनके लिए भावनात्मक क्षण था। वह 36 साल से यहां काम कर रहे थे। उन्होंने कहा, हमने इसकी कल्पना नहीं की थी कि हमारे जीवन काल में ही कोयले से बिजली उत्पादन बंद हो जाएगा। ऐसा करके ब्रिटेन की G 7 समूह की 7 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में चरणबद्ध रूप से कोयले का इस्तेमाल बंद करने वाला पहला देश बन गया है। हालांकि, स्वीडन और बेल्जियम जैसे कई दूसरे यूरोपीय देश इस लक्ष्य को बहुत पहले हासिल कर चुके हैं। संयंत्र के बंद होने पर देश के ऊर्जा मंत्री ने कहा कि यह एक युग का अंत है। देश में 140 साल तक कोयले के माध्यम से बिजली देने वाले कोयला मजदूरों पर हमें गर्व है।
एक दौर वो भी था जब कोयला यूनियन ने गिराई थी ब्रिटेन की सरकार
Britain में एक वक्त ऐसा भी था जब कोयला यूनियन इतनी मजबूत थी कि उनकी हड़ताल सरकारों की चूलें हिला दिया करती थी। यह किस्सा है कंजरवेटिव पार्टी के प्रधानमंत्री Sir Edward Heath का, उनके कार्यकाल में अपने वेतन और अन्य मांगों को लेकर कोयला यूनियनों की दो बड़ी हड़ताले हुई थी। नेशनल यूनियन ऑफ माइंन वर्कर्स (NUM ) वेतन के मुद्दे पर हड़ताल पर चले गए थे। सरकार यूनियन के साथ सख्ती से पेश आई, सरकार को उम्मीद थी की हड़ताल जल्द टूट जाएगी पर ऐसा हुआ नहीं। देश में बिजली का संकट खड़ा हो गया। 10 दिन तक बिजली को लेकर इमरजेंसी की स्थिति बनी रही। इंडस्ट्री में काम नहीं हुआ और उसके बाद सप्ताह में तीन दिन ही काम करने की पाबंदी करनी पड़ी।
आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा और खनिको की वेतन मांगों को स्वीकार कर लिया गया । 1974 में एक बार फिर मांगो की अनदेखी को लेकर एन यू एम के कर्मियों ने हड़ताल की। इस बार हड़ताल में काम पूरी तरह से ठप कर दिया गया। सभी कोयला खदानें बंद कर दी गई। हड़ताल का परिणाम यह हुआ कि खनिक आंदोलन की जीत हुई और 1974 में आम चुनाव करवाने पड़े। जिसमें कंजरवेटिव पार्टी की हार हुई। हीथ की सरकार गिर गई और उनके स्थान पर हेराल्ड विल्सन (Harold Wilson) के नेतृत्व में लेबर सरकार स्थापित हुई। वर्तमान समय में पूरे विश्व में सभी देशों में ग्रीन और रिन्यूएबल एनर्जी के विकल्पों पर वृहत पैमाने पर काम जारी है। ग्रीन एनर्जी उत्पादन के मामले में भारत का चतुर्थ (4th) स्थान है और आने वाले समय में इस क्षेत्र में काफी-कुछ होने जा रहा है।