Saturday, April 11, 2026
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बॉम्बे हाई कोर्ट का फ़ैसला आईवीएफ या एग डोनर ट्रीटमेंट से जन्मे बच्चे पर नही है डोनर का कानूनी हक!

by Jai P Swarn
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Bombay HC

Bombay HC: एग डोनेट कर बच्चों पर हक जताने वाली एक एग दाता महिला के मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने किसी भी एग डोनर को बच्चे की बायोलॉजिकल मां होने का दावा करने के कानूनी अधिकार से इनकार कर दिया है । कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा की यचिकाकर्ता की बहन एग डोनर थी लेकिन वो एक बायोलॉजिकल मां होने का कानूनी दावा नही कर सकती। हालांकि वो जेनेटिक मां बनने के योग्य हो सकती हैं ।

एग डोनर नही हो सकती बायोलॉजिकल मां:

बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक 42 साल की महिला को उसकी पांच साल की जुड़वा बेटियों से मिलने का अधिकार देते हुए यह बात साफ कर दी की स्पर्म डोनर और एग डोनर से होने वाले बच्चे पर डोनर का कोई कानूनी अधिकार नहीं है । डोनर किसी भी प्रकार से बच्चों के बायोलॉजिकल मां बाप होने का दावा नही कर सकतें हैं । बॉम्बे हाई कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान यह फ़ैसला सुनाया कि सरोगेसी के जरिए जन्मे बच्चे पर डोनर को बायोलॉजिकल मां का अधिकार नहीं मिल सकता है।

महिला की बहन थी एग डोनर:

दरसल 42 वर्षीय महिला ने बच्चा ना होने पर अपनी बहन से एग लेकर मां बनने का सपना पूरा किया था। महिला की शादी 2012 में हुई थी लेकिन कोई बच्चा ना होने पर 2019 में उसने अपनी बहन द्वारा दान किए गए एग से दो जुड़वा बेटियों को जन्म दिया । कुछ समय बाद महिला का अपने पति से अलगाव हो गया। महिला को एग देने वाली उनकी बहन के पति और उनकी बेटी की एक हादसे में मौत हो गई और उसके बाद वह एग डोनेट करने वाली बहन अपने जीजा के साथ रहने लगी और उसके साथ ही वह अपनी बहन और जीजा के जुड़वा बेटियों की मां होने का हक जताने लगी। महिला के पति का कहना है कि उसकी साली जो की एग डोनर है उसका बच्चों पर बायोलॉजिकल माता पिता होने का अधिकार है ,लेकिन उसकी पत्नी का बच्चों पर कोई लीगल अधिकार नहीं है ।उसकी साली जो की एग डोनर हैं उसके परिवार का 2019 मे एक्सीडेंट हो गया जिसमे उसने अपने पति और बच्चे को खो दिया था । वहीं दूसरी तरफ याचिकाकर्ता अपने पति और अपने बच्चों के साथ 2021 तक साथ रही । कुछ पारिवारिक झगड़े के कारण पति बच्चों के साथ दूसरे फ्लैट मे रहनें चला गया। वहां उसकी पत्नी की बहन उसके साथ रहने आ गयी। इसके बाद यचिकाकर्ता ने कोर्ट मे बच्चों से मिलने के लिये आवेदन किया लेकिन 2023 मे वह आवेदन खारिज कर दिया गया। जिसके बाद उसने हाई कोर्ट मे अपील की।

फ़ैसला,सरोगेसी से सम्बंधित कानून को समझने के लिये महत्वपूर्ण कदम:

वही दूसरी तरफ बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस बात से इंकार किया है । कोर्ट कहना है कि सरोगेसी एक्ट के तहत डोनर का केवल बायोलॉजिकल योगदान होता है और सरोगेट मां को अपने सभी पैरेंटल अधिकार छोड़ने होते हैं। बच्चे के कानूनी मां बाप की पहचान बच्चें के जन्म के समय होती है ।ठाणे की निचली अदालत के फैसले को अमान्य करार करते हुए हाईकोर्ट ने इस मामले पर फैसला सुनाते हुआ कहा कि कोई व्यक्ति जो स्पर्म डोनर हो या एग डोनर  या इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) ट्रीटमेंट से पैदा हुए बच्चों पर माता-पिता के अधिकार का दावा नहीं कर सकतें हैं । कोर्ट का कहना है कि सरोगेसी के मामले में कानूनी अधिकारों की रक्षा और स्पष्टता सुनिश्चित करने के लिए कानूनों का पालन करना बहुत ही जरुरी हैं । यह फ़ैसला सरोगेसी से सम्बंधित कानून को समझने के लिये यह एक महत्वपूर्ण कदम है । बच्चे को जन्म देने के बाद बच्चा कपल का हो जाता है । अदालत ने पति को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को हर सप्ताह तीन घंटे के लिए जुड़वां बच्चों से मिलने का अधिकार दे।

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