Meaning of Namaste : भारतीय हिंदू संस्कृति में किसी का अभिवादन करने के लिए नमस्ते या नमस्कार बोला जाता है। पर क्या आपने कभी सोचा है एक अभिवादन के लिए दो शब्द क्यों हैं ? दरअसल इसके पीछे एक बहुत बड़ा भेद है। नमस्ते और नमस्कार के अर्थ में यह भेद छुपा है और यही वजह है कि जब नमस्ते बोला जाता है, उस समय नमस्कार नहीं बोला जाता और नमस्कार के समय नमस्ते नहीं बोला जाता है। आईए जानते हैं क्या है यह भेद।
यह भी सत्य है कि जो दिखता है वह हमेशा सत्य नही होता । सूर्य एक तारा है जो अपनी धुरी पर घूर्णन करते हुये 25•4 दिन में उसे पूरा करता है । दूसरी ओर परिक्रमण के समय हमारी आकाशगंगा के केन्द्र के चारों ओर परिक्रमा लगाते समय उसे 2•25 करोड़ वर्ष लगते हैं । इसी कारण वह अपनी धुरी पर घूमते हुये भी स्थिर दिखता है । दूसरी ओर पृथ्वी भी अपनी धुरी पर घूमती है ,इसके घूर्णन से ही दिन एवं रात होते हैं । जब दिन होता है तो हम यह नही कहते कि पृथ्वी घूम गई बल्कि यह कह कर सूर्य देव का स्वागत करते हुये उन्हें प्रणाम करते हैं कि अब हमारे जाग कर अपने कर्म पथ पर अग्रसर होने का समय आ गया । तब हम सूर्य को नमस्कार करते हैं। हम दिन भर सूर्य के प्रकाश से ऊर्जावान होकर कार्य करते हैं पर जब पृथ्वी घूमती हुई दूसरी ओर आ जाती है तो पीछे की ओर अंधेरा हो जाने से हमारे लिये रात्रि हो जाती है,अंधेरा हो जाता है तब हम उनका अस्त होना कहकर नम:ते (नमस्ते) कहते हुये उनको नमस्कार है कह कर वह हमारे लिये अतीत बन जाते हैं ।
अर्थात प्रभात वेला में हम नमस्कार करते हैं और संध्या बेला में सूर्य अस्त होते समय वह अभिवादन नमस्ते बन जाता है। वैसे इन दोनों में यह बहुत ही सूक्ष्म भेद है जो आम चलन में अपनाया नहीं जाता। अकसर नमस्ते और नमस्कार में ज्यादा अंतर नहीं माना जाता।
- नमस्कार और नमस्ते दोनों ही हिंदी में अभिवादन के रूप में उपयोग किए जाने वाले शब्द हैं, लेकिन इनमें थोड़ा अंतर है:
- नमस्कार: यह एक अधिक औपचारिक और सम्मानजनक अभिवादन है, जो अक्सर बड़े लोगों, अनजान लोगों या औपचारिक अवसरों पर उपयोग किया जाता है।
- नमस्ते: यह एक अधिक अनौपचारिक और दोस्ताना अभिवादन है, जो अक्सर दोस्तों, परिवार के सदस्यों या परिचित लोगों के साथ उपयोग किया जाता है।
- इस प्रकार, नमस्कार अधिक सम्मान और औपचारिकता को दर्शाता है, जबकि नमस्ते अधिक दोस्ताना और अनौपचारिक होता है।
मानव जीवन भी इसी प्रकार है। जब कोई जन्म लेता है तो खुशियां मनाते हैं पर जब यौवन पार कर वृद्धावस्था की ओर जाता है तो उसकी शक्ति स्वत:ही क्षीण होकर समाप्त हो एक दिन मृत हो जाता है। तब हम उसे कुछ समय बाद भुला देते है । पर आत्मा तो कभी मरती नही वह देहांतरण करती है । एक शरीर को छोड़ कर दूसरा शरीर धारण करती लेकिन हम उसे पिछले वाले रूप में ना जानकर नये परिवर्तित कलेवर में ही देखते हैं । यही नमस्कार और नम:ते अर्थात। नमस्ते में अंतर है ।
उषा सक्सेना