Monday, March 2, 2026
Home खबर टल्ली न्यूज़ क्या है पर्यावरण शब्द का सही अर्थ ? कितने प्रकार का होता है पर्यावरण ?

क्या है पर्यावरण शब्द का सही अर्थ ? कितने प्रकार का होता है पर्यावरण ?

by KhabarDesk
0 comment
World Environment Day

World Environment Day : हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। पर यह पर्यावरण क्या है जिसका जिक्र हम बार-बार करते हैं ? जिसके लिये हम सभी इतना चिंतित हैं कि इसे “विश्व पर्यावरण दिवस ” के रूप में विशेष स्थान देकर विशेष दिवस घोषित करना पड़ा है। आईये सबसे पहले हम इस शब्द के अर्थ इसकी परिभाषा और प्रकार को समझते हैं।

परि +आवरण=पर्यावरण । प्रकृति का वह आवरण जो वायुमंडल के रूप में पृथ्वी को चारों ओर से घेर कर हमारी रक्षा कर रहा है जिसके कारण हम सुरक्षित और संरक्षित हैं वही परिधि का आवरण ही यथार्थ में पर्यावरण है ।

यह दो प्रकार का होता है:

1.जैविक या भौतिक
2.प्राकृतिक प्रकृति दत्त

पर्यावरण उन सभी भौतिक और रासायनिक एवं जैविक कारकों की समष्टिगत एक ईकाई है जो किसी जीवधारी या पारितंत्रीय आबादी को प्रभावित करती है तथा उनके रूप जीवन और जीवंतता को तय करते हैं ।

पर्यावरण एक आवरण की तरह आवृत करता हुआ हमारे चारों ओर पर्याप्त रूप से व्याप्त होता है । मानव जीवन में पर्यावरण की महत्वपूर्ण भूमिका है ।यह एक मात्र प्रकृति दत्त वह घर है जो मानव के पास है । भोजन, पानी, धूप हवा इन सब पर पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है । आज मानव ही इसे अपने दुष्कर्मों से दूषित कर रहा है जिसका प्रत्यक्ष प्रतिफल प्रदूषण है । धरती की रक्षा कर रहे वृक्षों को काट कर जंगल उजाड़ दिये। नदियों के जल को प्रदूषित कर उनके उद्गम को ही समाप्त कर रहे हैं । वायु मंडल को वाहनों से निकले धुंए और रासायनिक प्रदूषण , ध्वनि प्रदूषण से दूषित किया जा रहा है । इन सबका स्पष्ट प्रभाव प्राकृतिक पर्यावरण पर पड़ने से आज पृथ्वी का अस्तित्व ही खतरे में आ गया है ।

मानव के द्वारा प्रकृति दत्त संसाधनों के दुरूपयोग ने ही आज उसे स्वयं विनाश के कगार पर पहुंचा दिया । धरती की सरसता को नदियों के जल तथा भूमिगत जल का अत्यधिक शोषण कर उसे शुष्क बना दिया । जिसका स्पष्ट  प्रभाव मानव की सोच और चिंतन पर पड़ा है। आज उसके स्वभाव में आई शुष्क नीरसता , स्वार्थ, असहिष्णुता सब उसका ही परिणाम है । आज का मानव अब उदार नही रहा ।  अपनी प्रभुसत्ता के मद में मानव स्वयं मानवता और उसके धर्म को भूल कर आततायी बन गया है । यह सब पर्यावरण प्रदूषण के ही लक्षण है‌ जो परिलक्षित हो रहे हैं।

आज आवश्यकता है उस पृथ्वी को फिर से वृक्षों द्वारा श्रृंगारित कर प्रदूषण से बचाने की । नदी पहाड़ जंगल यह सब प्रकृति की अपनी संरचना है जिसके द्वारा हम रक्षित थे । हरे भरे जंगलों को देखकर मन स्वयं हरियाला हो जाता है।धूप जल को वाष्पित कर बादल का रूप लेकर शून्य में विचरण करते वृक्षों से आकर्षित हो कर पर्वतों से टकरा कर ही तो वर्षा करते हैं । जब वृक्ष ही नहीं होंगे तो उन्हें आकर्षित कौन करेगा पहाड़ों का उत्खननकर समतल बनाये जाने पर वह केवल जल भरे शून्य में ही विचरण कर निकल जायेंगे । आज आवश्यकता है पर्यावरण के संरक्षण की तभी मानव और उसका मानव गत स्वभाव संरक्षित हो पायेगा । अन्यथा यह शुष्कता हमारे आचरण और व्यवहार में प्रवेश कर हमें मानव से दानव बना देगी । जिसकी प्रक्रिया से हम गुजर रहे हैं । अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम अपनी संतानों को विरासत में क्या दें ?

उषा सक्सेना

You may also like

Leave a Comment

About Us

We’re a media company. We promise to tell you what’s new in the parts of modern life that matter. Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit. Ut elit tellus, luctus nec ullamcorper mattis, pulvinar dapibus leo. Sed consequat, leo eget bibendum sodales, augue velit.

@2022 – All Right Reserved. Designed and Developed byu00a0PenciDesign