Success Story : बुलंद हौसले, कड़ी मेहनत और दिल में जज्बा हो तो आसमान में भी सुराख किया सकता है। यह बात कबाड़ जमा करने वाले एक गुमनाम नौजवान ने साबित करके दिखाई है। महाराष्ट्र के छोटे से गांव वेलापुर का राम जी कश्यप का पूरा परिवार कबाड़ जमा करने का काम किया करता था। जिससे किसी तरह परिवार का गुजर बसर होता था। अपने पिता, दो भाइयों और एक बहन के साथ राम जी भी दिन भर कार्डबोर्ड, पैकेजिंग मैटेरियल और पुराने कपड़े जमा कर कबाड़ का ढेर लगाया करता था। राम जी की जिंदगी भगांर के ढेर के बीच बीत रही थी। लेकिन किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था। दिन बीत रहे थे, राम जी आंखो में एक सपना पल रहा था जो मौके की तलाश में वक्त का इंतजार कर रहा था। गरीबी के दुष्चक्र को तोड़कर एक नया मुकाम हासिल करने की चाह में सफलता के कदम चूमने के लिए उनकी बांहें फड़फड़ा रही थीं। और वक्त उसके साथ था जिससे मंजिल तक पहुँचने में उसकी मेहनत और जज्बे को रास्ता मिल ही गया। कबाड़ की जिंदगी को पीछे छोड़कर वह आगे बढ़ता गया। उसके संघर्ष और हार नहीं मानने की जिद की यह कहानी हर किसी के लिए प्रेरणादायक है।
कबाड़ की जिंदगी पीछे छोड़, बना खो- खो का चमकता सितारा
राम जी कश्यप का जीवन अपने गांव में किसी तरह परिवार के साथ कबाड़ के बीच रहा था। लेकिन कबाड़ की जिंदगी के बीच उनकी आंखों में एक सपना भी पल रहा था, बड़ा आदमी बनने का। राम जी में कुछ करने की लगन थी। परिवार ने राम जी कश्यप का दाखिला गांव के एकमात्र इंग्लिश मीडियम म्युनिसिपल स्कूल में करवा दिया और यहां से राम जी की जिंदगी ने अलग ही मोड़ ले लिया। स्कूल में पढ़ाई के दौरान उन्हें खो खो ने आकर्षित किया, वह खेल सीखने लगा और देखते-देखते अपनी फुर्ती, स्किल और गतिशीलता के दम पर एक के बाद एक सफलता की सीढ़ियां चढ़ता गया। लेकिन इस सफलता के पीछे वर्षों का संघर्ष और गरीबी का दर्द छिपा है।
एक समय ऐसा भी था जब राम जी के पास खेलने के लिए जूते खरीदने तक के पैसे नहीं हुआ करते थे। परिवार से भी कोई प्रोत्साहन नहीं मिल रहा था, क्योंकि माता-पिता भी अपनी गरीबी के कारण उनके खेलने को लेकर अपने को असमर्थ पा रहे थे, क्योंकि कबाड़ जमा करने में परिवार का एक हाथ जो कम हो रहा था। वह नहीं चाहते थे कि राम जी कबाड़ जमा करने का काम छोड़ खो खो खेलने में लग जाए। लेकिन उनके हौसले को देख उनके भाई बहनों ने राम जी के सपनों को पंख दिए और उन्हें सपोर्ट किया।
गरीबी की जिंदगी को हराकर बना अव्वल खिलाड़ी
राम जी ने मीडिया से बातचीत में बताया उनका परिवार काम की तलाश में 90 के दशक में उत्तर प्रदेश के कानपुर से महाराष्ट्र आया था। जहां वेलापुर में कबाड़ जमा करने का काम कर मुश्किल से गुजर बसर कर रहा था।
वेलापुर में खो खो का खेल काफी प्रचलित है। गांव के बच्चे अक्सर ही खेल मैदान में प्रैक्टिस करते रहते थे और यहां से कई खिलाड़ी भी निकले हैं। राम जी भी अपनी मेहनत और जिद लिए उतर पड़े खो खो के मैदान में। फिर सिलसिला शुरू हुआ घंटो- घंटो इन्हीं मैदानो में राम जी का अपना खेल सुधारने का। वक्त उनके साथ था। 30-40 किलो कबाड़ रोज सिर पर उठाते और मुश्किल से महीने भर में तीन से पांच हजार रूपये कमा पाते थे। लेकिन उसकी मेहनत ने रंग दिखाना शुरू किया। इस जिंदगी से बाहर निकलने की चाह और खो खो खेलना उनके लिए इस जिंदगी से बाहर निकलने की एक उम्मीद भरी किरण थी। दिन भर कबाड़ का काम, शाम ढलते ही खो खो का मैदान, और रात तक खो खो का अभ्यास करते सपनों को पूरा करने की जिद ने आखिरकार उन्हें खो खो का राष्ट्रीय खिलाड़ी बना दिया।
राम जी ने खो खो के टूर्नामेंट में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। ऐसे ही एक सीनियर नेशनल खो खो इवेंट के दौरान Chennai Quick Guns Franchise ने राम जी की प्रतिभा देख, उन्हें अपनी टीम में शामिल कर लिया और उसके बाद राम जी की किस्मत पलट गई। अपने फुर्तीले डिफेंसिव खेल के दम पर वे खो खो की National Sensation बन गए। राम जी के कोच कहते हैं, उनके शारीरिक गठन, फुर्ती, तेजी और सही बॉडी लैंग्वेज के कारण ही इस खेल में वे इतने आगे आ पाये। राम जी हमेशा अपने खेल को सुधारने और स्टेमिना बढ़ाने पर फोकस रखते रहे। वे गिरने से घबराए नही। राम जी कहते है कि गिरकर उठना जिंदगी में उन्होंने हर पल देखा है। यही कारण है कि वह आज देश के बेहतरीन खिलाड़ी बन गए हैं और वर्ष 2025 खो खो वर्ल्ड कप में एक चमकता सितारा बनकर उभरे हैं। अपने खेल के दम पर वे आज मुंबई में सेंट्रल रेलवे की नौकरी कर रहे हैं। अपने फुर्तीले खेल के कारण राम जी को साथी खिलाड़ी रैंबो कहकर बुलाते हैं। उनकी जिंदगी में एक वक्त ऐसा भी आया था जब एड़ी में गंभीर चोट की वजह से उन्हें एक साल खेल से दूर रहना पड़ा था, ऐसे में परिवार का भी कोई सपोर्ट नहीं था। परिवार चाहता था कि वह खेल छोड़कर वापस कबाड़ के काम में आ जाए । लेकिन ऐसे समय में पूरे गांव ने उनका साथ दिया। उनके खाने पीने से लेकर रिहैब में उनकी मदद की और उन्हें वापस खेल में लौटने के लिए प्रेरित किया। और आज यही 22 साल का नौजवान भारत का सर्वश्रेष्ठ खो खो खिलाड़ी बन चुका है, जो आज देश के लिए मेडल का अंबार लगा रहा है, और अपने खेल के दम पर बड़ी-बड़ी इनामी राशि भी जीत रहा है। आज भी गांव में जाते ही गांव के लोग उन्हें गर्व से देखते हैं। अपने पूरे गांव के लिए राम जी न सिर्फ एक गौरव र्हैं, बल्कि गांव की पहचान बन चुके हैं। आज वह गांव के बच्चों और युवकों के लिए प्रेरणा के स्रोत भी हैं।