Parshuram Jayanti : वैशाख मास शुक्ल पक्ष के प्रदोष काल अर्थात द्वितीया और तृतीय के संधि काल में अक्षय तृतीया के दिन भृगुवंशीय ऋचीक के पुत्र जमदग्नि के यहां माता रेणुका की कोख से चतुर्थ पुत्र के रूप में भगवान परशुराम जन्म हुआ था। उन्हें भगवान विष्णु का छठवां अवतार कहा जाता है। परशुराम को शौर्य एवं वीरता का प्रतीक माना जाता है। आज भी हनुमान जी के समान ही उनको भी जीवित माना जाता है। वह शिव जी के परम भक्त और प्रिय शिष्य थे।
ब्राह्मण कुल में जन्म हुआ था किंतु उनके अंदर थे क्षत्रियों के गुण
यद्यपि् उनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था किंतु उनके अंदर क्षत्रियों के गुण थे। इस विषय में कहा जाता है कि जब राजा गाधि ने अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह ऋचीक ऋषि के साथ किया तो सत्यवती की माता ने एक पुत्र की उनसे प्रार्ना की थी। तब ऋचीक मुनि ने अपने तपो बल से दो कमंडल में औषधीय जल तैयार किया जिसमें विशेष गुण थे। एक क्षत्रिय गुण वाला दूसरा ब्राह्मण गुण का। सत्यवती की माता ने सत्यवती वाला जल अपनी बेटी से लेकर पी लिया और बेटी ने तब माता के कहने पर क्षत्रिय गुण वाला जल पिया ।
जब ऋचीक ऋषि को यह पता चला तो उन्होंने सत्यवती से कहा तुम्हारा पुत्र अत्यंत क्रोधी और क्षत्रियगुण वाला होगा और तुम्हारी माता का पुत्र ज्ञानवान तपस्वी ब्राह्मण के गुण से युक्त। तब यह सुनकर सत्यवती ने क्षमा मांगते हुये कहा मुझे तो ब्राह्मण गुण वाला ही पुत्र चाहिये। तब ऋचीक ऋषि ने चिंतन करते हुये कहा भाग्य को मैं बदल नही सकता पर इतना अवश्य कर सकता हूं कि पुत्र के स्थान पर पौत्र यथा गुण का होगा।
इक्कीस बार क्षत्रियों से युद्ध करते हुये उनका विनाश किया
इस प्रकार से विश्वामित्र और परशुराम जी का जन्म हुआ क्षत्रियों के बढ़ते हुये अत्याचार को रोकने के लिये उन्होंने इक्कीस बार क्षत्रियों से युद्ध करते हुये उनका विनाश किया। जन्म से उनका नाम राम था परंतु शिव जी के द्वारा परशु हथियार दिये जाने पर, परशु को धारण करने के कारण उनका नाम परशुराम हुआ ।
उषा सक्सेना