Devi Puran : देवी की महत्ता को सिद्ध करने के लिये सबसे पहले मार्कण्डेय पुराण में इसका वर्णन मिलता है। देवी के त्रयोगुणी रूप का, मार्कण्डेय पुराण के अध्याय 81 से लेकर 93 तक, मार्कण्डेय ऋषि ने सावर्णि मनु को देवी का महात्म्य सुनाया है। देवी के प्रति आपनी भक्ति के अस्तित्व को बनाये रखने के लिये वेद व्यास जी ने देवी भागवत के नाम से देवी पुराण की रचना की । जिसके द्वारा सबसे पहले एक नारी शक्ति का जल में उदय होता है जो अपने को अकेला देखकर अपने सृजन की इच्छा से सृष्टि का विस्तार करना चाहती है। वह महामाया आदिशक्ति है जो अपने सतोगुणी रूप से विचार करती है। जिससे ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई । वह ब्रह्मा जी से अपने साथ सहयोग कर सृजन की बात करती है तो ब्रह्मा जी कहते हैं मैं आपका सतोगुणी विचार के रूप में जन्मा पुत्र हूं अत:ऐसा नहीं कर सकता।
देवी क्रुद्ध होकर तो फिर “पुत्र ही बने रहो ” । उन्हें एक पिण्ड बना देती हैं । दूसरी बार पुनः तप करती, हृदय से कामना करती हुई उनके हृदय से रजोगुणी विष्णु का जन्म होता है । देवी के द्वारा सहयोग करने की बात करने पर वह यह कर कि मैं तुम्हारे हृदय से उत्पन्न हुआ हूं अत:भाई बनकर संकट के समय तुम्हारी रक्षा कर सकता हूं सृजन नहीं। यह सुन कर देवी उन्हें भी तो फिर “भाई ही बने रहो” कह कर पिण्ड रूप में बदल देती हैं । देवी सृजन चाहती है। सृष्टि का विस्तार कैसे हो। अबकी बार वह नाभि स्थल में अपना ध्यान केन्द्रित कर तमोगुणी रूप से विचार करती है जिससे शिव का जन्म होता है । देवी का उनसे भी वही प्रश्न ! शिव क्षण भर विचार कर दोनों पिण्ड की ओर देखते हुये कहते हैं यदि मैं मना करुंगा तो तुम मेरा भी यही हश्र करोगी । अत:मैं तुम्हारा प्रस्ताव स्वीकार करता हूं किंतु उसके पहले तुम मेरे इन दोनों ही भ्राताओं को साकार रूप दो।
देवी के महात्म्य की कथा
देवी शिव जी की सहमति पाकर ब्रह्मा और विष्णु को साकार रूप देकर प्रकट कर देती हैं। शिव जी कहते हैं मैनें तुम्हें अंगीकार किया क्यों कि मैं तमोगुणी हूं। किंतु तुम्हें मेरी भार्या बनने के पहले योनिजा होकर स्त्री रूप में जन्म लेना पड़ेगा तब तक तुम्हारा निवास मेरे हृदय में शक्ति के रूप में रहेगा। देवी शिव जी की बात सुन कर प्रसन्न होकर शिव जी से कहने लगी ऐसा ही होगा । तब उन्होंने ब्रह्मा जी और विष्णु जी से कहा कि आप अपने दाहिने अंग की शक्ति प्रकट कीजिये ब्रह्मा जी सतोगुणी थे इसलिये उनकी प्रवृत्ति रजोगुणी की ओर होने से रजोगुणी पीताभा युक्त लक्ष्मी का जन्म हुआ जिसे उन्होंने विष्णु जी को सौंप दिया।
अब विष्णु जी की बारी थी उनके हृदय में रजो गुणी से तमोगुणी प्रवृत्ति होने के कारण काली का जनम हुआ जिसे उन्होंने शिव जी को सौपा ।अब शिव जी की तमोगुण से सतोगुण की ओर जाने के कारण ही गौर वर्ण सरस्वती का जन्म हुआ जिसे ब्रह्मा जी को सौंप कर देवी ने साकार से पुन: निराकार रूप धारण कर तीनों की शक्ति बन कर कहा कि ब्रह्मा जी सृजन के देवता हैं विष्णु जग के पालन हार और शिव जी स्वयं नियमों के व्यवस्थापक हो कर संहार के देवता बनेंगे । इस तरह से देवी महात्म्य में स्त्री की शक्ति को नारी रूप में स्थापित किया गया।
नारी में समाहित है देवी के तीनों रूप
देखा जाये तो यही नारी की कथा है । उसके अंतस् में नारी के तीनों रूप समाहित हैं। ज्ञान में सरस्वती है, धन सुख वैभव की देवी लक्ष्मी बनकर अपनी संतान का पालन करती है। जब परिवार पर कोई संकट आता है तो उसके अंतस् की काली जागने में भी समय नही लगता। नारी के इन्हीं तीनों रूपों को लेकर ही देवी पुराण और दुर्गा सप्तशती की रचना की गई है। बिना शक्ति के शिव भी शव हैं। ब्रह्मा,विष्णु और शिव निरंतर तपस्या करते हुये अपनी अंतस् की आत्मशक्ति रूपी आदिशक्ति की साधना करते हैं जिसके द्वारा ही वह अपने कार्य करते हैं।
देवी है प्राणियों में निवास करने वाली चेतन शक्ति
देवी पाठ में सभी प्राणियों में निवास करनेवाली आत्मा के रूप में जानने,इच्छा करने और अंत में क्रिया शक्ति का वर्णन किया गया है । वह सभी के अंत:में विद्यमान चेतन शक्ति हैं। निर्गुण रूप में वह अमूर्त है जबकि सगुण रूप मे वह देवी त्रयोगुणी महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी हैं।
नवरात्रि:-
देवी की पूजा और भक्ति के लिये एक वर्ष में चार नवरात्रि आती हैं। इनमें दो नवरात्रि प्रत्यक्ष रूप से सामान्य रूप से सभी के द्वारा पूजा के लिये होती हैं । इन्हें वैष्णव धर्म वाले सभी सनातनी हिन्दू मानते हैं और इनका व्रत उपवास पूजन भजन नौ दिन तक करते हैं ।
(1)बासंतीय नवरात्रि:- नयासंवत्सर प्रारम्भ होते ही चैत्र मास की प्रतिपदा से रामनवमी तक मनाई जाती है ।
(2) शारदीय नवरात्रि:-शरद ऋतु कुंआर माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर नवमी तक, इसके बाद दशहरा आता है ।
(2) गुप्तनवरात्रि :- इसमें पार्वती के ही महाकाली रूप को शाक्त और शैव धर्म वाले तांत्रिक क्रियाओं के लिये तंत्र मंत्र की सिद्धि के लिये गुप्त रूप से करते हैं। इसलिये इनका नाम गुप्त नवरात्रि पड़ा। रात के अंधकार में कोई देखे नहीं एकांत स्थल में इनकी साधना की जाती है। यह दस महाविद्यायें हैं जिनको साधक अपनी साधना और तप के बल पर जागृत कर कार्य की सिद्धि करते हैं। किसी विशेष कामना के उद्देश्य को लेकर ही इनकी साधना की जाती है। सामान्य जन के लिये इनका निषेध होने से भी यह वर्जित हैं ।
(1)आषाढ़ीय गुप्त नवरात्रि:- यह आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नवमी तक इनका प्रावधान है। इस नवमी को भिड़ारी नवमी भी कहते हैं जो विवाह शादी का अंतिम मुहूर्त होता है।उसके बाद देवशयनी एकादशी चातुर्मास प्रारम्भ ।
(2)दूसरी गुप्त नवरात्रि माघीय नवरात्रि होती है।शीत ऋतु में माघ माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक। माता सरस्वती का जन्म इसी नवरात्रि की पंचमी तिथि को होता है ।
इस तरह देवी की साधना का मानव जीवन में बहुत महत्व है इनके माध्यम से व्यक्ति अपनी आत्म शक्ति जागृत करते हुये देवी के आशीर्वाद से धन वैभव सुख संपदा और संतान की प्राप्ति करता है। देवी सभी की मनो कामना पूर्ण करती हैं। श्रद्धा आस्था और विश्वास के साथ आपकी उनके प्रति सच्ची भक्ति होने पर वह भुक्ति और मुक्ति दोनों को ही देती हैं । इस पुस्तक में विस्तार से देवी महात्म्य की चर्चा की गई है।
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:।
नम:प्रकृत्यै भद्रायै नियता प्रणता स्मृताम्।।
उषा सक्सेना
Disclaimer: इस लेख में व्यक्त सभी विचार लेखिका के अपने निजी विचार हैं। पाठक गण अपने विवेक से धार्मिक संदर्भ का अनुपालन करें।