Ashwathama : जिसके साथ कृष्ण हैं उसे कौन मार सकता है। अश्वत्थामा ने उत्तरा के गर्भ में पल रहे पांडव वंश के एक मात्र वंशज अर्जुन और सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु की निशानी को गर्भ में ही मारने के लिए ब्रह्मास्त्र चलाया था। उस नन्हें से भ्रूण पर जब ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया तो उत्तरा उसके भय से भयाक्रांत होकर श्रीकृष्ण की शरण में आकर उनके चरणों में गिर कर रोते हुये प्रार्थना करने लगी -हे पांडवों के उद्धारक! उनका समूल नाश होने से पहले मेरे इस गर्भस्थ शिशु की रक्षा करें। यह आग मुझे जलाये दे रही है। श्रीकृष्ण ने उसे सांत्वना देते हुये कहा-मेरे होते हुये अभिमन्यु के पुत्र को कुछ नही होगा । तुम धैर्य पूर्वक समय की प्रतीक्षा करो। मैं उसकी रक्षा का तुमको वचन देता हूं तुम्हारे गर्भस्थ शिशु की मैं रक्षा करुंगा।
ये द्वापर युग में महाभारत युद्ध के बाद द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का क्रोधवश पांडवों के समूल नाश के लिए छोड़ा गया ब्रह्मास्त्र था जिसको रोकने के लिये अर्जुन ने भी उसका प्रयोग श्रीकृष्ण के कहने पर किया जिसके टकराने से संपूर्ण सृष्टि का विनाश होता। किंतु उसे स्वयं वेद व्यास ने अपने तपोबल की शक्ति से टकराने के लिये रोकते हुये दोनों को ही वापिस लेने का आदेश दिया। अर्जुन ने उनका आदेश मानते हुये अपना ब्रह्मास्त्र वापिस ले लिया। दूसरी ओर अश्वत्थामा ने यह कह कर कि मुझे उसे वापिस करना नहीं आता उसे उत्तरा के गर्भ की ओर मोड़ दिया जब कि ब्रह्मास्त्र का प्रयोग बाल वद्ध एवं महिलाओं पर वर्जित था। अश्वत्थामा का यह कार्य नियम के विरूद्ध था। अत:उसे श्रीकृष्ण के शाप से अभिशप्त होना पड़ा । अपनी मणि के छीने जाने पर उसके रिसते घाव को लेकर अमरता का अभिशाप। जिसे मांगने पर भी मौत न मिले भटकता रहे यूं ही। अंत में सुभद्रा के कहने और उत्तरा के उनकी शरण में आने पर श्री कृष्ण ने अपने गुरु सांदीपन मुनि से प्राप्त की शिक्षा, मृत संजीवनी विद्या के द्वारा उत्तरा के गर्भ में सूक्ष्म रूप से प्रवेश कर उसके गर्भ में पल रहे अभिमन्यु के भ्रूण की रक्षा करते हुये उसका परीक्षण कर पुन:जीवन प्रदान किया।
अश्वत्थामा को श्री कृष्ण ने दिया था अभिशाप
इसके बाद अश्वत्थामा को शाप देते हुये श्रीकृष्ण ने कहा -तुमने अमरता पाने के लिये मृत्यु के भय से यह दुष्कृत्य किया, तो जाओ मैं तुम्हें अमरता का वरदान देता हूं। इस अभिशाप के साथ की तुम्हारे माथे का यह घाव जब तक तुम जीवित रहोगे रिसता रहेगा कभी भरेगा नही बल्कि रिस रिस कर सदैव तुम्हें तुम्हारे पापों की याद दिलाता रहेगा। इस संसार में सभी तुमसे घृणा करेंगे कोई भी तुम्हें आश्रय नही देगा । बस ऐसे ही कल्प कल्पांतर तक भटकते रहोगे । मौत मांगोगे पर वह भी तुमसे डर कर तुम्हारे पास नही आयेगी अब जाओ और अपने कर्मों का फल भोगो।
मृत शिशु को जीवित कर, दिया परीक्षित नाम
उत्तरा के गर्भ में पल रहे भ्रूण के गर्भपात की स्थिति को देख कर कृष्ण ने सूक्ष्म रूप धारण कर उसके गर्भ में प्रवेश कर अपने सुदर्शन चक्र के साथ निरंतर उसकी रक्षा की। अंत में जन्म के समय जब वह बालक ब्रह्मास्त्र के कारण मृत पैदा हुआ तो सभी को सांत्वना देते हुये कृष्ण ने पुन; उसका अन्वीक्षण करते हुये परीक्षण कर उसे आपने हाथ में लेकर उसके कान में कहा -उठो परीक्षित तुम्हारा परीक्षण पूर्ण हुआ,तुम अपनी परीक्षा में उत्तीर्ण हुये अत:आज से यह संसार तुम्हें पारीक्षित के नाम से पुकारेगा । तुम मृत्यु को पार करके आये हो,यह तुम्हारा नया जीवन है।
।।ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय।।
उषा सक्सेना
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें।