Holi Memories : होली के पहले घर में फाग गाने का रिवाज था। वातायन के झरोंखे से झाँकती मेरी स्नेहमयी सब पर अपनी ममता लुटातीं शकुंतला बुआ जिन्हें कोई कुंता कहता तो कोई बिट्टो अनेक नाम थे प्यार के। उनकी आवाज ढोलक की थाप के साथ गूंज रही थी। गीत के स्वर ईसुरी की फाग , वह स्मृतियां आज बरबस याद आ रही हैं । उनके गए कुछ यादगार फाग यादों के पिटारे से निकल आए हैं।
जब होली में गाए जाते थे फाग
“दिन ललित बसंती आन लगे
घटन लगे दिन अब रजनी के
रवि के रथ ठहरान लगे
दिन ललित बसंती आन लगे ।”
यह तो प्रारम्भ था फागुन में फागों का। इसके बाद सामूहिक होली जलने के बाद घरों मे होली जलते ही शुरू हो जाता रसिया स्वर। गूंजते ढोलक की थाप के साथ बुआ का वो मधुर स्वर। बुआ को सुगम संगीत में उस समय गवर्नर के द्वारा अवार्ड दिया गया था। वह हम सभी के लिये सदा ही एक आदर्श थीं और सच कहूं तो मैनें जो भी सीखा वह अपनी बुआ से ही। बचपन से ही उनके साथ एक विशेष अपनापन और जुड़ाव रहा। आज जब वह हमारे बीच नहीं हैं तो उनके साथ बिताये पल और मधुर स्मृतियां हैं। कानों में गूंजता उनका मधुर कोकिल कंठी स्वर :-“रसिया को नार बना दो री रसिया को। मस्ती में झूमते हम सभी साथ में उनके स्वर से स्वर मिला कर गाने लगते। एक समाप्त हुआ नहीं कि तभी दूसरा गीत हुमक कर आ जाता है। बृज की होली और हम सब गाने लगे :
“आज बृज में होली रे रसिया
होली रे होली बर जोरी मोरे रसिया ।
अपने-अपने घर से निकलीं
कोऊ कारी कोऊ गोरी मेरे रसिया “।
इसके बाद फिर शुरू हो जाता होली का रंग राधा कृष्ण के संग:-
*सिर बांधे मुकुट खेलत होरी ,
कौन के हाथ हैं रंग पिचकारी
और,कौन के हाथ अबीर झोली ।
सिर बांधे ….. ।
और तभी उलाहना देती प्रिया अपने प्रियतम को
मेरो खो गयो बाजूबंद, रसिया होली में “।
अपनी पड़ोसन को अटा पर उदास खड़ा देख कर उसकी सखी पूछती है गी्त के माध्यम से:-
“मन मारे अटा पर काये ठाड़ी,…. मन मारे ।
के तोरी सास ननद तोसें बोली
के सैंया न दईं गारीं।मन मारे..
आखिर इस रंग भरी होली में तू खुश होने की जगह उदास क्यों है? और तब वह अपने मन की व्यथा प्रिय सखी से कहती है कि :-
रात यार सपने में देखी सो
मनवा में उठत हिलोर रे। मन मारे....
होली आई और मैके की याद न आये ऐसा कैसे हो सकता है ।
आज बुआ के न रहने पर भी उनकी वह सुखद स्मृतियां गीतों के रूप में हमारे साथ हैं । बुआ के चित्र को देखते देखते ऐसा लगा जैसे मेरी बुआ अपने संस्कारों के साथ मेरे अंदर जी उठी। जाना तो सबको है समय के साथ ही परिवर्तन प्रकृति का नियम इसे कौन बदल सकता है। हिलमिल कर सभी के साथ होली मनाने का ये उमंग भरा त्यौहार तीन दिन का उत्सव सबको जोड़ देता है। नव सृजन के पथ की ओर बढ़ता कह रहा “द्रुत झरो जगत के पीत पात”। जीर्ण शीर्ण देह तभी देहान्तरण के बाद नये रूप में अवतरित होगी। वह पुन:-हम सभी के बीच आने के लिये आतुर नव सृजन पथ की ओर चली गई ।
उषा सक्सेना