Donald Trump : पिछले दिनों सउदी अरब की राजधानी रियाद में यूक्रेन युद्ध को समाप्त करवाने को लेकर रूस और अमेरिका के बीच वार्ता शुरू हुई। हैरत की बात यह है कि इस वार्ता में युद्ध रत दूसरा पक्ष यानी यूक्रेन ही शामिल नहीं था। अमेरिका और रूस आपस में ही मिल बैठकर इस युद्ध को सुलझाने के लिए डील कर रहे थे। यूक्रेन के कंधे पर हाथ रखने वाला अमेरिका आज उसे पीछे हटाने की जुगत में है। इसे लेकर यूरोप अलग परेशान है! यूरोप को समझ नही आ रहा है कि अचानक अमेरिका की विदेश नीति का यह कैसा बदला हुआ पैंतरा है? वाकई समझना मुश्किल है, या फिर इस तरह समझा जाए कि इसमें अमेरिका, रूस और यूक्रेन तीनों की मजबूरी है।
अंशु नैथानी
यहां यह समझना जरूरी है कि ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका की विदेश नीति आखिर कौन सी नयी करवट ले रही है? रूस और यूक्रेन के युद्ध को शुरू हुए 3 साल बीत चुके हैं। इस युद्ध को रोकने के लिए बातें तो बहुत हुई, लेकिन युद्ध को रोकने के लिए कोई ठोस प्रयास कहीं से भी होता नही दिखा। दोनों तरफ से हजारों की संख्या में सैनिकों की जानें गईं, साथ में आम नागरिकों को युद्ध की विभीषिका के गंभीर परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं। इस युद्ध में बेशुमार पैसा फूंका गया। युद्ध की शुरुआत यूक्रेन के NATO में शामिल होने को लेकर शुरू हुई थी। अमेरिका ने यूरोप के साथ मिलकर यूक्रेन को अपनी गोद में बैठा कर इस युद्ध में लड़ने के लिए सारी हवन सामग्री दी थी। लेकिन ट्रंप सरकार के सत्ता में आते ही पूरे समीकरण बदल दिए गए।
यूक्रेन युद्ध को लेकर ट्रंप की नीतियों से यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की भी परेशान और अचंभित हैं। जेलेंस्की कह रहे है कि ट्रम्प को यूक्रेन युद्ध और रूस की भूमिका को लेकर वास्तविक और सही जानकारी नही दी जा रही है। जेलेंस्की सीधे तौर पर ट्रम्प की आलोचना भी नहीं कर पा रहे हैं। युक्रेन युद्ध पर ट्रंप के बदले रूख से जेलेंस्की आज ऐसे मझधार पर आकर खड़े हैं जहां असमंजस की स्थिति बनी हुई है। यूरोपीय शक्तियां भी इस मामले में विशेष कुछ करती नही दिख रही है। आखिर सवाल उठता है कि बदलते व्यापारिक और प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा के दौर में अमेरिकी विदेश नीति, ट्रंप के नेतृत्व में अपनी स्थापित विदेश नीति से कितना अलग और किस तरह की नीतियों पर चल रही है। आईए जानते हैं सबसे पहले अमेरिकी विदेश नीति के स्थापित मुख्य कारकों के बारे में।
दशकों से मुख्य रूप से स्वतंत्रता और लोकतंत्र को बढ़ावा देना और दुनिया भर में मानवाधिकारों की रक्षा करना अमेरिकी विदेश नीति का केंद्र रहा है। मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा और अन्य वैश्विक और क्षेत्रीय प्रतिबद्धताओं में शामिल मूल्य, उन मूल्यों के अनुरूप है जिन पर संयुक्त राज्य अमेरिका की स्थापना सदियों पहले हुई थी।
अमेरिका की विदेश नीति का एजेंडा
अमेरिकी विदेश नीति का उद्देश्य : अमेरिकी लोगों और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के हित में बेहतर लोकतांत्रिक, सुरक्षित और समृद्ध दुनिया का निर्माण करना मुख्य लक्ष्य रहा है। ब्रिटेन से आजादी के बाद अमेरिकी विदेश नीति उदारवाद के सिद्धांतों पर केंद्रित रही है। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद से अमेरिकी विदेश नीति अंतरराष्ट्रीय मामलों में उनकी भूमिका और उदारवाद को लेकर आधिपत्य के इर्द-गिर्द घूमती रही है। अमेरिका की स्ट्रेटजी सामरिक रूप से अधिक वर्चस्व की नीति के कारण पूरी दुनिया में घटक देशों के एक नेटवर्क का निर्माण करने की रही है, जिसमें नाटो (NATO), द्विपक्षीय गठबंधन और विदेशी धरती पर अमेरिकी सैन्य अड्डों का निर्माण करना शामिल है। साथ ही अमेरिका द्वारा निर्मित और डिजाइन किए गए अंतरराष्ट्रीय संस्थानों- जैसे IMF, WTO और World Bank में अधिक से अधिक राष्ट्रों को शामिल करने की नीति रही है। न्यूक्लियर हथियार के प्रसार को रोकना भी अमेरिका की विदेश नीति का मुख्य हिस्सा रहा है।
अमेरिका की विदेश नीति के लिए गठित हाउस कमेटी के अनुसार इसके कार्य क्षेत्र में निर्यात संबंधी नियंत्रण, जिसमें न्यूक्लियर प्रौद्योगिकी और न्यूक्लियर यांत्रिकी के प्रसार को रोकना शामिल है। अन्य देशों के साथ व्यावसायिक संपर्क को बढ़ाना और विदेश में अमेरिकी व्यवसाय के हितों की रक्षा करना, अंतर्राष्ट्रीय कमोडिटी एग्रीमेंट्स, अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था, विदेशों में अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा और expulsion अमेरिकी विदेश नीति के मुख्य कारक रहे हैं।
डोनाल्ड ट्रंप की नई पारी
अब, डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिकी विदेश नीति में स्थापित मौलिक नीतियों और सिद्धांतों के साथ राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखने पर जोर दिया गया है। इसके लिए उन्होंने अपने कूटनीतिक दृष्टिकोण, रणनीतिक साझेदारी और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में अमेरिकी वर्चस्व को फिर से कायम करने के लिए नई धार के साथ बदलते विश्व परिदृश्य में ‘अमेरिका फर्स्ट'(AMERICA FIRST) की नीति पर कार्य करना शुरू कर दिया है । पद संभालने के तुरंत बाद ट्रंप ने अमेरिका के चुनाव में किए गए अपने वादे ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीतियों को अमली जामा पहनाने का काम भी शुरू कर दिया है। इसके लिए ट्रंप ने अमेरिकी विदेश मंत्रालय को यह कार्यभार सौंपा है कि राष्ट्रपति के विदेश नीति एजेंडे को सही और प्रभावी तरीके से कानून के अनुरूप क्रियान्वित करना सुनिश्चित करें। राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने आदेश में विदेश मंत्रालय को यह शक्ति दी है कि विदेशी मामलों के मैनुअल और प्रक्रियात्मक दस्तावेजों में संशोधन और परिवर्तन लाएं, जो विदेश सेवा के क्रियान्वयन को निदेशित करते हैं। ट्रंप के ये आदेश इस बात का भरोसा अथवा गारंटी देते हैं कि एक मजबूत और प्रभावी दृष्टिकोण से अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अमेरिका के हितों को सबसे पहले रखने की बात हो।
Keeping His Promise To Put America First
ये कार्यकारी आदेश राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा पहले से की गई कार्रवाई पर आधारित हैं और विदेशी संबंध के हर पहलू में अमेरिका को पहले रखने के उनके वादे को पुष्ट करता है। पहले दिन ही राष्ट्रपति ट्रंप ने ‘अमेरिका पहले’ की नीति (‘America First’) से संबंधित निर्देश पर हस्ताक्षर करते हुए यह ऐलान कर दिया कि अमेरिकी विदेश नीति, अमेरिकी नागरिकों और अमेरिका के हितों को सबसे पहले रखें। राष्ट्रपति ट्रंप का यह कदम शक्ति के माध्यम से शांति को हासिल करना और इस बात को पक्का करना है कि अमेरिकी विदेश नीति में अमेरिकी मूल्य, संप्रभुता और सुरक्षा साफ-साफ दिखे । राष्ट्रपति ट्रंप का कार्यकारी आदेश इस बात को और भी पक्का करता है कि अमेरिका के राजनयिक सेवा में जवाबदेही और प्रभावशीलता को लेकर उनकी प्रतिबद्धता स्पष्ट है।
Donald Trump ने कहा ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (Make America Great Again)
“अमेरिका फर्स्ट” के लिए अमेरिका की विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय संबंध, द्विपक्षीय वार्ता और ट्रीटीज को नए तरीके से परिभाषित करने और गढ़ने की ओर बढ़ रही है। विश्व परिदृश्य में शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में साधने के प्रयास की ओर ट्रम्प का यह एक आक्रामक कदम है। अमेरिका अपने बिगड़ते आर्थिक हालात, व्यापार घाटा, सामरिक सर्वोच्चता और विश्व परिदृश्य पर शक्ति संतुलन को लेकर काफी चिंतित और सजग है। हो भी क्यों ना। पिछले दो दशकों से चीन की तरफ से जो चुनौतियां अमेरिका को आर्थिक, सामरिक और नई प्रौद्योगिकी के नवाचार के क्षेत्र में मिल रही है, उससे अमेरिका को आने वाले दशकों में अपनी सर्वोच्चता को खोने का डर सता रहा है। दूसरी तरफ रूस और चीन के बीच बढ़ती नजदीकियां और ईरान जैसे मुल्कों के साथ उनके त्रीआयामी समीकरण भी अमेरिका के लिए परेशानी खड़ी कर सकते हैं। एशियाई और अफ्रीकी देशों में चीन के बढ़ते प्रभाव से भी अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अपनी साख को कायम रखने में प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में ट्रम्प सरकार ने ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति पर चलते हुए कुछ ऐसे कदम उठाए हैं जिससे विश्व के आर्थिक परिदृश्य पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है और अमेरिकी मदद से चलने वाली बहुत सारी अंतरराष्ट्रीय परियोजनाएं और कार्यक्रमों पर दूरगामी प्रभाव पड़ने का खतरा भी मडंराने लगा है।
ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद बहुत सारे फैसले उलट रहे हैं। पहले उन्होंने WHO से हाथ खींच लिए, जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते के खिलाफ वह पहले से ही थे। उन्होंने दुनिया के तमाम देशों के लिए रिसिप्रोकल टैरिफ का ऐलान कर दिया है। यानी कि जो देश जितना टैरिफ अमेरिका पर लगाएगा उतना ही वे उस देश पर लगाएंगे। इजरायल की बात हो तो गज़ा को वह अपने अधिकार में लेने की बात करते हैं, कभी कनाडा को अमेरिका में शामिल होने के लिए कह देते हैं, तो कभी फिनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाने पर बयान दे डालते हैं। ट्रंप बहुत तेजी में दिखाई दे रहे हैं। हो सकता है कि अमेरिका के नागरिकों को यह सब कुछ अमेरिका के हित में नजर आ रहा हो, क्योंकि जिस तरह से यूक्रेन युद्ध में अमेरिका का पैसा फूंका गया उससे अमेरिकी हित को कुछ खास प्राप्त नही हुआ।
ट्रंप ने पहले ही कहा था कि वह इसे बंद कर देंगे। उन्होंने कहा कि अगर वे प्रेसिडेंट होते तो युद्ध होता ही नहीं। टैरिफ लगाने को लेकर वह अपने देश के आर्थिक हितों के लिए कुछ भी करने पर आमादा हैं। अमेरिका में अवैध रूप से रह रहे विदेशियों पर उन्होंने पहले ही डंडा चला दिया है। सबको हांक- हांक कर निकाल रहे हैं। यहां हैरत इस बात पर हो रही है कि अचानक ही ट्रंप क्या वैश्विक कूटनीतिक परिदृश्य को बदलने जा रहे हैं। जिस तरह से अमेरिका हमेशा ही यूरोप के साथ खड़ा नजर आया है और जो यूक्रेन युद्ध के समय भी था, क्या वह अब बदलने वाला है? अगर ऐसे में अमेरिका NATO से बाहर निकलने का फैसला करता है तो यूरोप अपने आप को कहां खड़ा पाएगा? NATO के अस्तित्व का क्या होगा? रूस से तनातनी खत्म करने के लिए अमेरिका यूक्रेन युद्ध बंद करवाना चाहता है। इसके लिए अमेरिका क्या रूस की शर्तों को भी मान लेगा? दोनो बातचीत के टेबल पर आ गए हैं। सारा खेल बदलता नजर आ रहा है। जेलेंस्की अचानक अनाथ हुए बच्चे की तरह नजर आ रहे हैं, जिन्हें भयानक ट्रैफिक के बीच सड़क पार करने के लिए अकेला छोड़ दिया गया है। अमेरिका और रूस अगर नजदीक आते हैं या अपने तनाव को कम करते हैं, तो यह वैश्विक समुदाय और शांति के लिए एक अच्छा कदम होगा। लेकिन इस तरह का एक तरफा फैसला क्या दुनिया में फिर से अमेरिकी वर्चस्व का दम भरने के लिए किया जा रहा है?
अमेरिका आज के वैश्विक परिपेक्ष्य में द्वीधुरीय (Bipolar) विश्व व्यवस्था (World Order) नही चाहता है। उसे पता है चीन के बढ़ते आर्थिक और सामरिक शक्ति से शक्ति संतुलन अमेरिका के पक्ष में नही रहेगा। इसीलिए अमेरिका ने चीन पर कई आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबंध लगा रखे हैं। हाल के दिनों में चीन के खिलाफ अमेरिका द्वारा AI से संबंधित टेक्नोलॉजीज के निर्यात पर लगे प्रतिबंध के बावजूद चीन के DeepSeek AI model के आने से अमेरिका के कान खड़े हो गए। आनन-फानन में ट्रंप ने अमेरिकी AI इंडस्ट्रीज को आगाह किया कि हमें सतर्क रहने और इस क्षेत्र में विशेष करने के लिए पूरी सक्रियता से लगने की जरूरत है। इतना ही नही, व्यापार घाटे को लेकर Donald Trump भारत को लेकर भी सख्त रवैया अख्तियार करने पर उतारू हैं।
Donald Trump के नेतृत्व में अमेरिका अपने राजकोष में इजाफा करने के लिए हर तरह की कटौती कर रहा है। भारत को चुनाव में वोटर टर्न आउट को बढ़ाने के लिए अमेरिका द्वारा दिया जाने वाला 21 मिलियन डॉलर की वित्तीय मदद पर भी रोक लगा दी गई है। इस सबके बावजूद, क्या अमेरिका चीन और भारत समेत दुनिया के तमाम विकासशील देशों के आर्थिक, सामरिक, औद्योगिक और तकनीकि क्षेत्र में बढते कदम को रोक पाएगा? विशेषज्ञों की राय है कि आने वाले समय में ऐसा होना संभव नही है। हो सकता है अमेरिका वर्चस्व की लड़ाई में चीन, रूस और अन्य शक्तियों के मुकाबले वर्षों तक सरताज बना रहे। लेकिन आने वाले दो दशक बाद के समय में अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज का नम्बर एक खिलाड़ी कौन होगा? कोई नही जानता।