Bihar Election : बिहार विधान सभा के चुनाव इस साल के आखिर में अक्टूबर-नवंबर में होने वाले हैं। लेकिन सियासी पारा वहां अभी से काफी चढ़ गया है। बिहार में मुख्यतया दो गठबंधन हैं। सत्तारूढ़ एनडीए और विपक्षी इंडिया का जिसे बिहार में महागठबंधन कहा जाता है। दोनों गठबंधनों के प्रमुख नेता बिहार का दौरा कर रहे हैं। राज्य के नेता तो सक्रिय हो ही गये हैं। सत्तारूठ गठबंधन एनडीए की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोक सभा चुनावों के बाद से ही बिहार को प्राथमिकता पर रखे हुए हैं और कई बार राज्य का दौरा कर चुके हैं।
अमरेंद्र कुमार राय
इसी तरह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी राज्य का दौरा कर रहे हैं। इन दोनों नेताओं ने अभी हाल ही में बिहार का दौरा किया और बड़ी-बड़ी सभाएं कीं। इनके अलावा भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जे पी नड्डा, केंद्रीय मंत्री और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और दूसरे कई केंद्रीय मंत्री भी बिहार का दौरा कर रहे हैं। इसी तरह विपक्षी इंडिया गठबंधन की ओर से सबसे बड़े दल कांग्रेस के सबसे बड़े दो नेता राहुल गांधी और पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी बिहार का दौरा कर रहे हैं। इन दोनों नेताओं ने भी अभी हाल ही में बिहार का दौरा किया। इस तरह हम देख रहे हैं कि राज्य में चुनाव अभी भले ही छह महीने बाद हों लेकिन दोनों पक्षों की ओर से चुनावी तैयारियां अभी से शुरू हो चुकी हैं। ठीक वैसे ही जैसे महाभारत युद्ध से पहले कौरव और पांडव दोनों तरफ से सेनाएं सजने लगी थीं।
दोनों ही गठबंधन इस समय आशंकाओं और उम्मीदों के झूले में झूल रहे हैं। सत्ताधारी गठबंधन को उम्मीद है कि वह इस बार भी चुनावी बैतरनी पार कर जाएगा। लेकिन उसके मन में गहरी आशंकाएं भी हैं। सबसे बड़ी आशंका पिछले 20 साल से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व के खिलाफ पनपे असंतोष और उनका स्वास्थ्य है। पिछले विधान सभा चुनाव ( 2020 ) में दोनों गठबंधनों में हार-जीत का फासला बहुत कम था। जब कि उससे पहले 2019 के लोक सभा चुनाव में एनडीए ने विपक्ष पर पूरी तरह से झाड़ू फेर दिया था। राज्य की चालीस सीटों में से उसने 39 सीटें जीत ली थीं। बावजूद इसके जब विधान सभा चुनाव हुए तो विपक्षी गठबंधन ने उसे कड़ी टक्कर दी। एक समय तो ऐसा लग रहा था कि दोनों गठबंधन 112-114 सीटों पर बराबर दिख रहे थे। वो तो आखिरी की करीब 15 सीटों ने एनडीए को सरकार बनाने की स्थिति में ला खड़ा किया। यह भी कहा जाता है कि वे सीटें सत्ताधारी दल के दबाव में सत्ता पक्ष को मिल गईं। जबकि इस बार 2024 के लोक सभा चुनाव में विपक्षी गठबंधन की नौ सीटें आई हैं। फिर माहौल भी इस बार विपक्षी महागठबंधन के पक्ष में है। लोक सभा चुनावों के दौरान जातीय सर्वेक्षण कराने और संविधान की रक्षा का जो नारा इंडिया गठबंधन ने दिया था उसी पर वह इस विधान सभा चुनाव में भी आगे बढ़ रहा है।
एनडीए में बेचैनी
दोनों गठबंधन दावा कर रहे हैं कि इस बार उनकी सरकार बनेगी। लेकिन दोनों गठबंधनों के भीतर एक बचैनी भी है। वह बेचैनी सत्ताधारी गठबंधन में कुछ ज्यादा ही है। उसकी प्रमुख वजह यह है कि नीतीश कुमार पिछले 20 साल से राज्य के मुख्यमंत्री हैं। जाहिर है उसका एक नुकसान है। लोग नीतीश कुमार से ऊंब गये हैं और इनके शासन से निराश हैं। सत्ताधारी दल होने का जो नुकसान होता है वह इस बार ज्यादा दिख रहा है। दूसरे नीतीश कुमार का स्वास्थ्य भी अच्छा नहीं है। पिछले एक साल से नीतीश कुमार सार्वजनिक कार्यक्रमों में उचित व्यवहार नहीं कर पा रहे हैं। कभी किसी के पांव छूने लग रहे हैं, कभी राष्ट्र गान के समय बात करने लग रहे हैं, कभी किसी धार्मिक कार्यक्रम में आरती की थाली हाथ में लेकर आरती करने की बजाय खड़े रह जा रहे हैं। और तो और विधान सभा में उन्होंने ऐसा भाषण दिया कि पूरे एनडीए और उनकी पार्टी जनता दल यू को शर्मसार होना पड़ा। इसी से बचने के लिए बीजेपी चाहती थी कि उन्हें हटाकर किसी दूसरे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना दिया जाए। ताकि सत्ता से उपजे असंतोष और उनके स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं से होने वाले नुकसान से बचा जा सके। लेकिन नीतीश कुमार और जेडी यू के अड़े रहने के कारण वह कुछ नहीं कर सकी। अब जब उसने देख लिया कि यह संभव नहीं है तो नुकसान को कम करने के लिए एक नई योजना बनाई गई है। नई योजना के तहत राज्य सरकार का कार्य अब उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ( भाजपा ) और केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ( जे डी यू ) मिलकर संभालेंगे। पिछले दिनों इन दोनों ने राज्य के अधिकारियों के साथ एक बैठक भी की।
सीटों के बंटवारे का सर दर्द
इसके अलावा सत्तारूढ़ गठबंधन में सीटों के बंटवारे को लेकर भी समस्या आ रही है। पिछले विधान सभा चुनाव में बीजेपी, जेडी यू, हम और वीआईपी एनडीए गठबंधन में शामिल थे। चिराग पासवान की लोक जन शक्ति पार्टी अलग चुनाव लड़ी थी। तब बीजेपी 110, जेडी यू 115, हम 7 और वीआईपी 11 सीटों पर लड़ी थी। इसमें बीजेपी 74, जेडी यू 43, हम 4 और वीआईपी भी चार सीटों पर जीती थी। 115 सीटों पर लड़ने के बावजूद जेडी यू के सिर्फ 43 सीटें जीतने के पीछे भी एक कहानी है। तब बीजेपी के संरक्षण में चिराग पासवान अलग से चुनाव लड़े और उन्होंने जेडी यू के उम्मीदवारों के खिलाफ अपने उम्मीदवार उतारे। बीजेपी ने भी पीछे से उनकी मदद की। चिराग पासवान का तो सिर्फ एक ही उम्मीदवार जीत पाया लेकिन नीतीश कुमार के विधायकों की संख्या उम्मीद से आधी रह गई। जेडी यू के कम से कम 30 उम्मीदवार चिराग पासवान के कारण हार गये। अब वो चिराग पासवान इस बार एनडीए गठबंधन में शामिल हैं। उन्होंने दावा भी किया है कि उनकी पार्टी कम से कम 40 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। अब सवाल ये उठता है कि ये ऐडजस्टमेंट होगा कैसे ? कौन अपनी सीटें छोड़ने को तैयार होगा ? बीजेपी कह रही है कि वह किसी भी कीमत पर 100 से कम सीटों पर चुनाव नहीं लड़ेगी। जेडी यू के अपनी सीटें छोड़ने की उम्मीद न के बराबर है। लोक सभा चुनाव में जेडी यू ने ये दिखा भी दिया। सीटें लेकर भी और जीत कर भी। फिर चिराग पासवान के लिए इतनी सीटें आएंगी कहां से ?
सीटों के बंटवारे के खतरे से भी बड़ा एक और खतरा है। पिछले विधान सभा चुनाव में चिराग पासवान ने नीतीश कुमार के उम्मीदवारों को निशाना बनाया था और उसमें वे सफल भी रहे। उन्होंने विधान सभा की 134 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। लेकिन तभी से चिराग पासवान भी नीतीश कुमार के निशाने पर हैं। उन्होंने लोक सभा में चिराग की पार्टी को तोड़वा दिया था और उनके चाचा पारस पासवान को नेता बनवा दिया था। चिराग तब बिल्कुल अकेले पड़े गये थे। कुछ जानकारों का कहना है कि नीतीश और उनके समर्थक अभी भी चिराग पासवान से खार खाए बैठे हैं। इस चुनाव में वे अपना पुराना बदला निकाल सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो पूरे एनडीए की संभावना पर ही इसका बहुत खराब असर पड़ेगा।
महागठबंधन में भी खींचतान
एनडीए गठबंधन में आशंकाएं हैं तो महागठबंधन भी इससे अछूता नहीं है। फर्क इतना है कि चूंकि मीडिया एनडीए गठबंधन का पक्षधर है तो उसके अंतर्विरोधों को उछालता नहीं जबकि महागठबंधन के अंतर्विरोधों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करता है। फिलहाल वह इस बात में लगा हुआ है कि महागठबंधन की दोनों प्रमुख पार्टियों राजद और कांग्रेस में समझौता न होने पाये। मीडिया में बार-बार यह प्रचारित किया जा रहा है कि कांग्रेस की महत्वाकांक्षा बढ़ गई है और वह राजद से कड़ी सौदेबाजी कर रही है। ऐसा नहीं है कि इस बात में सचाई नहीं है लेकिन उतनी नहीं जितनी मीडिया फैला रहा है। पिछली विधान सभा में राजद 144 सीटों पर चुनाव लड़ा और 74 सीटें जीता।
कांग्रेस 70 सीटों पर लड़ी और सिर्फ 19 सीटें जीत पाई। पिछली बार महागठबंधन में मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी नहीं थी जबकि इस बार वह महागठबंधन में शामिल है। तो उसे भी ऐडजस्ट करना है। पिछले विधान सभा में महागठबंधन 110 सीटें जीता जबकि सत्ताधारी एनडीए 125 सीटें। अंतर सिर्फ 15 सीटों का। तब यह कहा गया कि कांग्रेस अगर ठीक ढंग से लड़ी होती तो सरकार एनडीए की बजाय महागठबंन की बनती। कांग्रेस को अगर सत्तर की बजाय 40-45 सीटें दी गई होतीं और बाकी सीटें राजद और लेफ्ट में बंटी होतीं तो नतीजे कुछ और होते। क्योंकि राजद और लेफ्ट दोनों का ही जीत का अच्छा रिकॉर्ड था। जबकि कांग्रेस की जीत का रिकॉर्ड सिर्फ 27 फीसदी बन पाया। लेकिन यह कहना इतना आसान भी नहीं है। जब इस तरह की बातें होती हैं तो कांग्रेस कहती है कि उसे वो सीटें ज्यादा दी गईं जो हारने वाली ही थीं। उन सीटों पर राजद भी पिछले 20 सालों में कभी नहीं जीत पाया था।
सीट बंटवारा बड़ा मुद्दा है लेकिन उतना नहीं कि गठबंधन ही टूट जाए। गठबंधन की अहमियत दोनों ही जानते हैं। तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनना है तो कांग्रेस को भी राज्य में अपनी स्थिति मजबूत करनी है। दोनों जानते हैं कि दोनों के अलग होने से दोनों के सपने बिखर जाएंगे। दोनों ने कम से कम चार बार अलग-अलग लड़कर देख लिया है। दोनों की दुर्गति हुई है ।
पिछले दिनों तेजस्वी यादव अपने दो सहयोगियों के साथ कांग्रेस से सीटों पर बात करने दिल्ली पहुंचे। कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे प्रमुख रूप से बैठक में शामिल हुए। बैठक में बिहार कांग्रेस के प्रभारी कृष्णा अल्लावरू और बिहार कांग्रेस के नए बने अध्यक्ष राजेश कुमार भी थे। बंद कमरे में क्या हुआ यह तो किसी को नहीं मालूम लेकिन जो बातें छनकर बाहर आ रही हैं उसके अनुसार कांग्रेस ने तेजस्वी से दो बातें साफ कर दीं। एक यह कि उन्हें मुख्यमंत्री का उम्मीदवार मानने में उसे कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन वे कांग्रेस के मामले खासकर कन्हैया कुमार और पप्पू यादव को लेकर ज्यादा नुक्ताचीनी न करें। आपको पता है कि इन दोनों नेताओं को आगे करके कांग्रेस बिहार में “पलायन रोको, नौकरी दो” के नारे के साथ पदयात्रा निकाल रही है।
इस पदयात्रा में खुद राहुल गांधी और सचिन पायलट भी शामिल हुए। दूसरा यह कि अगर तेजस्वी यादव पिछली विधान सभा में हारी सीटें कांग्रेस से वापस लेने की बात करेंगे तो लोक सभा चुनाव में राजद जिन सीटों पर हारी है वो भी उसे छोड़ दे। वैसे भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस ज्यादा सीटें लड़ने पर जोर नहीं देगी। वह जीतने वाली सीटें लड़ने पर जोर देगी। सब लोग उसकी आलोचना कर रहे हैं कि 70 सीटों पर लड़ी और सिर्फ 19 जीत पाई। लेकिन वो लोग 2015 के विधान सभा चुनाव को भूल जा रहे हैं जब वह सिर्फ 41 सीटों पर लड़ी और 29 जीत गई। इस बार भी कांग्रेस का जोर बेशक कम लेकिन जीतने वाली सीटों पर है। तेजस्वी को एक और बात साफ की गई कि अब राज्य की कमान कांग्रेस के नए प्रभारी कृष्णा अल्लावरू और पार्टी की राज्य इकाई के अध्यक्ष दलित नेता राजेश कुमार के हाथ में है और तेजस्वी को सीट बंटवारे को लेकर उन्हीं से बात करनी होगी।
दरअसल लोकसभा चुनावों के बाद कांग्रेस की स्थिति पहले की तुलना में काफी बेहतर हो गई है। लोक सभा में उसके सदस्यों की संख्या 99 तक पहुंच गई है। राहुल गांधी ने जिस तरह से पूरे देश की पदयात्रा की और जातीय सर्वेक्षण तथा संविधान का मुद्दा उठाया उससे उनकी लोकप्रियता खासी बढ़ी है। अल्पसंख्यकों और दलितों के बीच खासकर कांग्रेस की छवि बेहतर हुई है और ये दोनों वर्ग कांग्रेस की ओर उम्मीद से देख रहे हैं। कांग्रेस इस स्थिति का फायदा उठाना चाहती है। वह पूरे देश में अपने संगठन को मजबूत बनाने में जुटी है। बिहार में भी उसने संगठन को मजबूत बनाने की दृष्टि से ही कर्नाटक के युवा नेता कृष्णा अल्लावरू को इंचार्ज बनाया तो दलित नेता राजेश कुमार को अध्यक्ष बनाया। जिले स्तर तक पर पार्टी को मजबूत बनाने की कार्यवाही के तहत 19 जिलाध्यक्षों को भी बदल दिया गया। निश्चित रूप से यह सब इसलिए किया गया है कि लालू यादव और तेजस्वी कांग्रेस को कमजोर मानकर अपनी मनमर्जी न चला सकें।
प्रशांत किशोर का गुब्बारा
प्रशांत किशोर का गुब्बारा भी फूटता हुआ ही दीख रहा है। उप चुनावों में एक-दो सीटों पर उन्हें अच्छे वोट मिले तो ज्यादातर पर जमानत जब्त हो गई। लेकिन जीत किसी भी सीट पर नहीं मिली। वैसे भी उन्हें बीजेपी की ओर से बैटिंग करते हुए माना जा रहा है। अभी हाल ही में उन्होंने पटना के गांधी मैदान में पांच लाख की रैली करने का दावा किया था लेकिन रैली में लोग ही नहीं पहुंचे। खुद प्रशांत किशोर पांच घंटे बाद रैली में पहुंचे। उन्होंने लोगों से माफी मांगी और कहा कि सरकार ने उनके लोगों को पटना मे आने ही नहीं दिया।
किसका पलड़ा भारी ?
पिछले विधान सभा चुनाव को देखें तो दोनों गठबंधनों का पलड़ा लगभग बराबरी का था। एक ने 110 सीटें जीतीं तो दूसरे ने 125. अब स्थिति में थोड़ा बदलाव आया है। जो मुकेश सहनी पिछली बार एनडीए के साथ थे वो इस बार गठबंधन के साथ हो गये हैं। उनके महागठबंधन में आने से फिलहाल पलड़ा महागठबंधन की ओर झुका है। लोक जन शक्ति पार्टी के दूसरे धड़े के नेता राम विलास पासवान के भाई पारस पासवान ने भी एनडीए से अपना नाता तोड़ लिया है। वे भी महागठबंधन के साथ ही चुनाव लड़ेंगे। नीतीश कुमार की स्थिति भी पहले की तुलना में कमजोर हुई है। बार-बार गठबंधन बदलने और उनके स्वास्थ्य को लेकर उनकी छवि खराब हुई है। जब उन्होंने महागठबंधन के साथ मिलकर सरकार बनाई तो तेजस्वी उप मुख्यमंत्री बने। उस दौरान उन्होंने जो कार्य किये उससे तेजस्वी की छवि और निखरी। उसका लाभ भी महागठबंधन को मिलेगा। पिछली बार अससुद्दीन ओवैसी की पार्टी के भी पांच विधायक जीत गये थे। इस बार अल्पसंख्यकों में कांग्रेस और महागठबंधन की ओर झुकाव को देखते हुए कहा जा सकता है कि ओवैसी को अब वैसी सफलता नहीं मिलने वाली। इस तरह देखें तो आज की तारीख में जो स्थिति पिछली विधान सभा में एनडीए की थी वो इस बार महागठबंधन की दिख रही है। मतलब महागठबंधन सत्ता के ज्यादा करीब दिख रहा है। लेकिन अभी भी चुनावों में छह महीने बाकी हैं। कौन क्या करता है, कैसा करता है, इस पर बहुत कुछ निर्भर करेगा।