Shiv Bhakt Ravan : रावण की मां कैकसी महादेव की पूजा करने नित्य प्रति नियम पूर्वक कैलाश पर्वत जाती थी। एक दिन जब वह पूजन करके वापिस वापिस आई तो रावण ने कहा मां तुम इतना उपक्रम करके वहां तक क्यों जाती हो मैं तुम्हारे लिये यहीं पर उनको स्थापित कर देता हूं। फिर यहीं अपनी पूजा साधना कर लेना । आपका श्रम बचेगा और साधना भी हो जायेगी। अपने पुत्र रावण की बात सुनकर कैकसी को हंसी आ गई । मां की हंसी के पीछे छिपा व्यंग रावण को चुभ गया और उसने दुखी होते हुये कहा-
“क्या मां मैं आपके लिये इतना भी नही कर सकता”
कैकसी ने रावण के सिर पर हाथ रखते हुये कहा –
” पुत्र ऐसा मत कह ” तेरा तो जन्म ही महादेव की भक्ति के लिये हुआ है “। तू उनका सबसे बड़ा भक्त बनेगा पर इसके लिये तुझे यहां नहीं कैलाश पर्वत पर ही तपस्या के लिये जाना होगा। उनके दर्शन बिन उनकी प्रसन्नता और इच्छा के दुर्लभ है । यद्यपि वह आशुतोष हैं प्रसन्न होने पर उनके लिये इस संसार में अदेय कुछ भी नही । इसीलिए मैनें तुमसे शक्ति शाली बनने के लिये उनकी तपस्या के लिये कहा था ।
रावण तेरा जन्म ही महादेव की भक्ति के लिए हुआ है – कैकसी
आज तुम्हारे सौतेले भाई कुबेर के पास जो भी है वह सब उन्हीं की कृपा से है ।वह उनका बहुत बड़ा भक्त है जो प्रतिदिन लंका से पुष्पक विमान पर बैठ कर उनकी पूजा के लिये कैलाश पर्वत जाता है । मैं चाहती हूं की तुम अपने उस भाई से भी बढ़कर महान् शिवभक्त बनो तभी तुम अपने मातृकुल को संतुष्ट कर पाओगे । महादेव को समझने के लिये पहले तुम्हें शिव को समझना होगा ।शिव का अर्थ और विज्ञान समझना आसान नही । शिव कोई व्यक्ति या शरीर नही जिसे हम प्रत्यक्ष देख सकें । यह तो वह शाश्वत त्तत्व है जो सभी त्तत्वों का सार है ।
रावण को मां ने समझाया शिव का वास्तविक अर्थ
शिव का वास्तविक अर्थ है “वह जो होकर भी नही है” । यह संपूर्ण सृष्टि शून्य से उत्पन्न हुई और अंत में इसका विलय भी शून्य में ही हो जाना है । व्यापक शून्यता ही उसका आधार है और ब्रह्मांड का मूलभूत गुण । इस निराकार विशाल शून्यता को ही हम शिव कहते हैं । वस्तुत:शिव, शक्ति स्वरूपा हो कर ही कल्याण कारी है। बिना शक्ति के वे शव हैं । निर्जीव को चेतना प्रदान करने वाली शक्ति। है उसे मूर्त रूप देकर जड़ से चेतन बनाती है। शक्ति को धारण करने के लिये देह आवश्यक है । बिना देह के शक्ति निरर्थक है । दिशाहीन शक्ति सदैव ही विनाश कारी होती है । इसलिए शिव शब्द को कल्याण से जोड़ कर “कल्याण कारी “कहा जाता है।
सत्यं शिवम् सुन्दरम् “
“सत्यं शिवम् सुन्दरम् “। (शि+व) यह एक ध्वनि विज्ञान भी है जो हमें अपने अंदर एक गहरी अनुभूति देता है। इस मंत्र में “शि ” शब्द यदि उसे ऊर्जा देता है तो “व ” शब्द उस शक्ति को वहन करता हुआ उसे संतुलित एवं नियंत्रित करता है। यही शिव शब्द का रहस्य है जो उसे महादेव से भिन्न करता है। शिव को किसी ने उत्पन्न नही किया वह स्वयम्भू हैं, इसीलिए उन्हें शम्भू भी कहते है । इस सृष्टि में सबसे पहले अंधकार से उत्पन्न होने के कारण उन्हें तम का देवता काल पुरुष के रूप में आदि देव सदाशिव कहा जाता है। सदाशिव पुरुष है जो स्त्री रूपी प्रकृति के द्वारा धारण करने पर प्रकाशित हुआ । शिवलिंग स्त्री और पुरुष दोनों का प्रतीक है। वेद और पुराण के अनुसार सदाशिव से ही विष्णु और ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई । शिव आदि , अनादि , अनंत और अखंड होकर शून्य से भी परे हैं। शिव त्तत्व को ही शिव रूप में परम ब्रह्म माना गया है । इसलिए पुत्र इस संसार के सारे त्तत्व शिव में ही निहित हैं। वह निराकार होकर भी महादेव के रूप में साकार हैं। शिव रूप में उनका निवास काशी में है जो उनके त्रिशूल के ऊपर है और प्रलय में भी नष्ट नही होती ऐसा शिव का निवास है । लिंगरूप शिव शक्ति के साथ सभी के कल्याण के लिये अपने कल्याण कारी रूप में काशी में वारणी और असि नदी के संगम पर गंगा किनारे रहते हैं।
देवों के देव महादेव
महादेव के रूप में वह सदा ही कैलाश में बसते हैं, शिव और महादेव एक ही हैं। देवों के देव महादेव हैं क्यों कि वह त्रिदेवों में प्रथम हैं इसीलिए उन्हें महेश्वर कहा जाता है (महा+ ईश ) महेश जिनसे बड़ा कोई भी इस सृष्टि में नही है ।इसलिये महादेव के रूप में अपने अंतस् में शक्ति को धारण कर सबसे शक्तिशाली पुरुष रूप महादेव देवाधिदेव होकर देव , दैत्य, दानव ,यक्ष, किन्नर, गंधर्व, नाग एवं नर सभी जातियों से पूजित हैं । देवों के देव महादेव अघोर रूपी ध्यान में रत रहने के कारण उन्हें अघोरी भी कहा जाता है । दक्ष के यज्ञ में सती के दाह के पश्चात जब दक्ष के यज्ञ को विध्वंस करते हुये नंदी ने ब्राह्मणों को शाप दिया तो भगु ऋषि ने भी क्रोध में आकर शिव को शाप दिया था कि तुम्हारे भक्त धर्म, कर्म ,शशास्त्रों से विपरीत आचरण करते हुये अपना श्रृंगार भस्म से करते हुये जटाओं को धारण करेंगे और भक्ष्य अभक्ष्य का भक्षण करेंगे।
शिव जी ने उनके शाप को स्वीकार कर उन्हें एक ऋषि के रूप में सम्मान दिया किंतु उनके भक्तों के लिये इस शाप को धारण कर उसका वहन करना कठिन था तब शिव ने स्वयं इस शाप को धारण कर उनका नाम अघोरी रखा और कहा कि जब तक इस धरती पर अघोरी रहेंगे उनके तप के प्रभाव से प्रलय नही आयेगी । अघोर पंथ यहीं से प्रारंभ हुआ। रुद्र के रौद्र रूप के कारण यह अघोरी तप के बल के प्रभाव से शक्तिशाली होंगे और क्रोधी भी। इनकी तपस्या देवताओं के समान होकर यह स्वयं ही मेरा शिव स्वरूप धारण करें इनकी संतुष्टि के लिये शिव स्वयं इनको सम्मान देते हुये इनकी पूजा करते हैं ।
शिव यदि आत्मत्तत्व है, तो महादेव उनका साकार रूप जो कैलाश वासी होकर पर्वत निवासी हैं । पुत्र तुम्हें महादेव को प्रसन्न करने के लिये कैलाश पर जाकर ही तप करना चाहिये तभी तुम्हारी तपस्या फलीभूत होगी ।
ऊषा सक्सेना
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें।