Matangi Devi : मां आदि शक्ति का ही एक रूप है मां मातंगी। जिनके पति स्वयं मतंगेश्वर भैरव के रूप मे भगवान शिव हैं। माता मातंगी की साधना अद्भुत और चमत्कारी मानी जाती है। कहते हैं कि इसे स्वयं हनुमान जी एवं शबरी के गुरू मतंग ऋषि ने अपनी कठिन साधना के तप के आशीर्वाद स्वरूप देवी से प्राप्त किया था और देवी ने उनकी पुत्री बन कर उन्हें उपकृत किया। देवी की यह गुप्त साधना गुप्त नवरात्रि में गुप्त रूप से बिना किसी बाधा के एकांत में रात्रि नौ बजे से लेकर बारह बजे के मध्य की जाती है। इस साधना के करने से व्यक्ति को वाणी की सिद्धि के साथ ही संगीत कला एवं ज्योतिष विद्या में पारंगतता प्राप्त होती है।
मां के साधना से दांपत्य जीवन हो जाता है सुखी
देवी मातंगी की साधना, धन ऐश्वर्य संतान सभी सुख सुविधाओं के साथ ही दाम्पत्य जीवन को भी श्रेष्ठ बनाती है । यह देवी प्रमुखत: भारत के आदिवासियों की देवी हैं जिनकी साधना से उन्हें असुरों को मोहित कर उन्हें नष्ट करने की शक्ति प्राप्त होती थी। इस प्रकार से मातंगी देवी की साधना साधक को अभीष्ट फल और सर्वसिद्धि प्रदान करती है।
पौराणिक कथा :-
एक बार भगवान विष्णु देवी लक्ष्मी के साथ बैकुंठ से शिव जी के पास कैलाश मिलने आये। वह उन्हें उपहार में देने के लिये कुछ मिष्टान्न व्यंजन भी साथ में लाये। उनके दिये हुये उपहार रूपी प्रसाद को जब शिव और पार्वती ग्रहण कर रहे थे तभी उनके हाथ से जूठन के कुछ कण धरती पर गिर गये। वह स्थल मतंग मुनि के आश्रम के पास था। उन जूठे अन्न कण से ही देवी मातंगी का एक कन्या रूप में जन्म हुआ जिसे मतंग मुनि ने अपनी कन्या के रूप में ग्रहण कर मातंगी नाम दिया। यही कन्या बाद में दस महाविद्याओं में नवम विद्या मातंगी के रूप में प्रतिष्ठित हुई। मतंग मुनि ने अपने आराध्य शिवजी के भैरव रूप को उनके पति रूप में चुनकर उन्हें मतंगेश्वर नाम दिया । जिस दिन माता मातंगी का पृथ्वी पर अवतरण हुआ वह दिन वैशाख मास शुक्ल पक्ष की अक्षय तृतीया थ। इसीलिये अक्षय तृतीया को ही उनकी जयंती मनाई जाती है।
उच्छिष्ट मातंगी :-एक बार एक चांडालिनी ने भक्ति पूर्वक उनको अपने जूंठे जौ का प्रसाद चढ़ाया। सभी देवताओं के मना करने पर भी देवी ने उस प्रसाद को प्रेम पूर्वक श्रद्धा भाव से दिये जाने के कारण खा लिया। इसीलिए उनका दूसरा नाम मातागिरी के बाद उच्छिष्ट मातंगी पड़ा। इसीलिए इन्हें बिना किसी विचार के जूंठा प्रसाद भी चढ़ाया जाता है। शबरी ने भगवान श्री राम को मातंगी देवी की साधिका होने के कारण ही उन्हें जूंठे बेर खिलाकर ही अपनी साधना की शक्ति प्रदान की थी। सत्य तो यह है कि शक्ति चाहिये तो शक्ति को पाने के लिये एकांतिक साधना भी आवश्यक है। गुप्त दस महाविद्याओं की साधना तांत्रिक रूप से किये जाने के कारण ही इसे अधिकांश रूप में सन्यासी और तांत्रिक लोग ही करके अपने मंत्रों को सिद्ध करते है। किसी भी कार्य की सफलता के लिये शक्ति आवश्यक है।।
उषा सक्सेना
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें।