Friday, April 10, 2026
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Sheetala Ashtami : शीतलाष्टमी क्यों मनाते हैं ?

by KhabarDesk
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Sheetala Ashtami :  चैत्र माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी को शीतला माता की पूजा की जाती है। इसके एक दिन पूर्व ही जो लोग सप्तमी पूजते हैं वह अष्टमी के दिन जहांँ अष्टमी की पूजा होती है वहाँ सप्तमी को देवी की पूजा के लिये हलुआ पूड़ी मीठे पुआ, रबड़ी ,चावल आदि बनाकर रख लेते हैं। इस दिन बासी पानी से ही देवी की पूजा करते उन्हें दही चावल खिला कर शीतल करते हैं। धूप दीप आरती हवन आदि नहीं करते।

बसौड़ा खाने‌ का अर्थ

बसौड़ा खाने‌ का अर्थ है जितना भी होली का बचा हुआ गुझिया पपड़िया आदि हैं वह सब समाप्त कर दो। इसके बाद ताजा खाना खाओ लेकिन गरम नहीं ठंडा करके। शीत ऋतु से ग्रीष्म ऋतु का सन्धिकाल का अत: शारीरिक रूप से उसे सहने के लिये गरम भोजन के स्थान पर ठंडा भोजन करते हुये ग्रीष्म ऋतु के स्वागत के लिये अपने तन और मन दोनों को ही तैयार करें जिससे ग्रीष्म का‌ प्रकोप न सता सके ।

यह हमें स्वास्थ्य की रक्षा के लिये स्वच्छता की शिक्षा देती है।  पहले चेचक का रोग भी प्राय: इसी समय बहुतायत से होता था जिसमें रोगी को ताप से बचाने के लिये घर में शुद्ध सात्विक आहार बिना किसी छौंका बघारी के ही सादा भोजन के रूप में ग्रहण किया जाता था। रोगी के पास कोरा मिट्ठी का घड़ा भर कर पानी पीने के लिये रखा जाता था, साथ ही नीम का‌ झौंका कीटाणु रहित करने के लिये। इस समय शीतला माता की मनौती मानकर बाद में उनकी उपासना करते हुये पूजा की जाती। शीतला माता का मानव जीवन में बहुत अधिक महत्व है । वह अपनी उपासना करने वाले व्यक्ति को सदा ही क्रोध से बचाकर शीतलता प्रदान करती हैं। जिस व्यक्ति ने अपने क्रोध पर विजय नहीं पाई वह दूसरे को क्या जीत सकता है।

यही गूढ़ रहस्य शीतला माता के पूजन में छिपा है। हमें सबसे पहले तन की स्वच्छता के साथ ही मन के विकारों को निकाल कर उसे नव सृजन की ओर ले जाना है। मन और मस्तिष्क दोनों को ही शीतलता की आवश्यकता है तभी हम जीवन में आगे बढ़ सकते हैं । सनातनन हिन्दू धर्म में बात को सीधे से न कह कर कथा और संकेतों के माध्यम से समझाने का प्रयास किया गया जिसे समझने के स्थान पर हम उसे परम्परा और रीति रिवाज के रूप में पालन करने लगे । ज्ञान के साथ ही विज्ञान भी तो आवश्यक है और हमें उसके वैज्ञानिक दृष्टिकोण को भी समझना होगा ।
उषा सक्सेना-

डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें

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