Sawan Kajari Songs : सावन का महीना कजरी के गीतों को समर्पित है। कजरी पूर्वी उत्तरप्रदेश के प्रसिद्ध लोक गीत हैं। इनकी उत्पत्ति मिर्जापुर से मानी जाती है। यह वर्षा ऋतु के प्रसिद्ध बिरहा लोकगीत हैं। कहते हैं कि राजा कीर्ति नरेश की पुत्री का नाम कजरी था, वह अपने पति से बहुत प्रेम करती थी। किसी कारण वश नाराज होकर राजा ने उसे कैद कर कारागार में डाल दिया। तब अपने पति की याद में वह जो गीत गाती थी उन्हें ही बाद में कजरी का नाम दिया गया । राजा ने जब अपने बेटी के बिरहा गीत सुनें तो उनका भी मन भर आया और उन्होंने उसे कैद से रिहा कर दिया ।
कजरी में सबसे पहले मिर्जापुर की देवी माता विंध्यवासिनी से प्रार्थना कर देवी गीत गाया जाता है, तब कजरी गाई जाती है । कजरी के गीतों में अधिकांशत: राधा कृष्ण की लीलाओं का वर्णन मिलता है। जिसमें कृष्ण अपनी रूठी हुई राधा को मनाने के लिये गीत गाकर बागों में उसे झूला झूलने के लिये बड़े प्रेम से मनुहार करते हुये बुलाते हैं ।
राधे झूलन पधारो झुकि आये बदरा ।
साजो सकल श्रृंगार नैनन् डारो कजरा ।
ऐसे ही नही सोलह श्रृंगार करके आओ । कजरी के गीतों में श्रृंगार रस की प्रधानता है। जब इस ऋतु में जब चारों ओर हरियाली ही हरियाली होती है, प्रकृति आनंदित होकर अपना सर्वस्व लुटा रही होती है। ऐसे में मानव मन भी उल्लास की तरंगों से तरंगित होकर प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित कर हर्षित होता है । प्रेम और प्रिय बिरह की करुण पुकार के गीत हैं कजरी। जो सावन मास में गाये जाते हैं । ‘दादुर मोर पपिहरा’ की सावन में अपनी प्यास बुझाने के लिये प्रिय की पुकार। ऐसे में मानव कैसे चुप रह सकता है । वह भी अपने प्रिय को मिलन के लिये पुकारता है, प्रेम पगे रस भरे गीतों के साथ ।
सावन भादों की झुकी अंधियारिया
चमके बिच बिच बिजुरिया
बरसन लागी काली बदरिया
पिया आन मिलो …।
झूला गीत :-
झूला पड़े कदम्ब की छैंया
झूलें राधे नंद किशोर।
काहे के तोरे बनें हैं पालना
काहे की लागी डोर ।
चंदन के माई बने हैं पालना
रेशम लागी डोर ।
झूला और कजरी सावन मास के गीत हैं, जिन्हें महिलायें बाग बगीचे में सखियों के संग जाकर मौज मस्ती के साथ झूला झूलते हुये उमंग से भर कर गाती हैं ।हर मौसम का अपना आनंद है। इसी तरह सावन मास का भी । सावन की फुहारों के साथ सखियों संग मौज मस्ती करते हुये उसका अपना आनंद है।
उषा सक्सेना