Paush Month : 16 दिसंबर से पौष मास आरंभ हो चुका है। पौषमास को खरमास भी कहा जाता है । पौष मास में सूर्य की उपासना का विशेष महत्व है, इसके साथ ही पौषमास का यह महीना अपने गुरु की सेवा और आराधना का भी महीना माना जाता है।
गुरू गोविन्द दोऊ खड़े
काके लांगू पाँय ।
बलिहारी गुरु आपने
गोविन्द दियो बताय ।।
पौषमास को साधारण बोलचाल की भाषा में खर-मास भी कहते हैं । सनातन हिन्दू धर्म में गुरु की महत्ता ईश्वर से भी बड़ी है। गुरू ही व्यक्ति को ज्ञान देता है, अज्ञान के अंधकार से निकाल कर प्रकाश की ओर ले जाने वाला केवल गुरू ही है जो गुरुता के भार को वहन करता है । सत्य क्या है ? उसके मार्ग पर चल कर व्यक्ति अपने जीवन में किस प्रकार से अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है, इसका मार्ग हमें गुरु पथ प्रदर्शक बनकर बताता है । इसीलिये ग्रहों के राजा सूर्यदेव जब अपने सेना पति मंगल की वृश्चिक राशि से धनु राशि पर आते हैं तो राज्य के समस्त कार्यों पर विचार विमर्श के पश्चात वह उनसे अध्यात्म पर भी चर्चा करते हैं । इसके बाद ही वह अपने पुत्र शनिदेव के घर आकर उनको धर्म और न्याय के पथ पर चलने की शिक्षा और निर्देश देते हुये वह अपने पितृकर्तव्य का पालन करते हैं ।
मार्गशीर्ष अर्थात भगवान विष्णु को समर्पित माह के समाप्त होते ही पौषमास देव गुरु बृहस्पति को समर्पित होता है । यह माह सृष्टि में सभी को पोषण देकर पुष्ट करने वाला माह है । इसका प्रारम्भ पुष्य नक्षत्र होने से इसे पूष माह भी साधारण बोलचाल की भाषा में कहते हैं। इस समय कुहरीला कुहासा धुंध बनकर सूर्यदेव को अपने आवरण में आवृत किये रहने से सूर्य का प्रकाश बाधित होकर ही धरा पर आ पाता है। उनकी किरणों का ताप और प्रकाश के रूप में ऊर्जित ऊष्मा धुंध में अवशोषित हो जाने से शीत का प्रकोप बढ़ जाता है । पौषमास को खरमास भी कहते है। कालचक्र के अनुसार सूर्यदेव अपने मित्र एवं सेनापति मंगल की राशि वृश्चिक को पार कर देव गुरू बृहस्पति की राशि धनु में प्रवेश करते हैं । गुरू की गरिमा के आगे शिष्य सदा नत मस्तक होकर लघु ही होता है । ज्ञान के देवता गुरू की गुरुता को चाहे वह राजा ही क्यों न हो उसे सम्मान देना ही पड़ेगा, क्यों कि वह गुरू से ही तो जीवन को जीने की कला और शिक्षा सीखता है । इस माह के स्वामी का नाम भी पूषण देव हैं । पौष माह में गुरू से ज्ञान प्राप्त कर अपने विचारों को पोषण देकर पोषित करते हुये ही तो वह हेमंत का अंत कर पायेंगे। इस असत् रूपी अन्धकार को दूर करने के लिये गुरू का ज्ञान आवश्यक है, जो आगे का पथ प्रशस्त कर सके ।
“हिरण्यमेन पात्रेण सत्यास्यापिहितं मुखं। त्तत्वं पूषन्नपावृणुसत्य धर्माय दृश्ये ।।”
अर्थात:-सत्य का मुख सोने के पात्र से ढका हुआ है, इससे हम उसे नहीं देख पा रहे। अत:हे! पूषण आप इस आवृत किये हुये आवरण को हटा कर मुझे सत्य के दर्शन करने दें । हमारी बुद्धि पर पड़े हुये मोह माया के आवरण को जब तक हे पूषण आप दूर नहीं करते ,हम उस सत्य के दर्शन नहीं कर पायेंगे ।सत्य की खोज में भटकते साधक के लिये सबसे पहले अपने मन से मोह रूपी माया का परित्याग करना पड़ेगा तभी हमारे आत्म त्तत्व को सत्य की प्राप्ति होगी । सत्य की खोज,जिसे मानव मन आदि काल से खोजता रहा परंतु जिसे पाना इतना आसान नही है। शारीरिक आवरणों से आवृत सुंदरता बाह्य रूप से आकर्षित करने वाली सुंदरता है, किंतु आंतरिक सुंदरता तो सदगुणों की है जो हमारे आचरण में सदव्यवहार और सद्भावना के रूप में रहती है । यह आत्मा का वह गुण है जिसे हम बाह्य चकाचौंध में रहकर भौतिकवादी भोगवाद में फंस कर नहीं देख पाते। उसे मैं और मेरा का मोह ही अहं का कुहरीला कुहासा बनकर घेरे रहता है । अध्यात्मवाद में “मैं” से ऊपर उठकर “हम” सबके लिये कल्याण की बात करता है । यह सत्य का सद्गुण ही सभी धर्मों का मूल आधार हैं । जो सत्य है वही शिव होकर सभी के लिये कल्याणकारी रूप में सुंदर है ।इसकी सुंदरता कभी नष्ट नहीं होती वरन् फूलों की सुगंध की तरह सर्वत्र व्याप्त होकर अपने आस-पास के वातावरण को भी सुवासित करती है । यह वह प्रार्थना है जिसके द्वारा हम असद् से सद् की ओर गमन करते है । इसीलिये यह पौष मास खरा मास होकर हमें आत्मचिंतन की ओर प्रवृत्त करता है । पौषमास में सभी शुभ कार्य वर्जित होकर केवल पवित्र नदियों में स्नान और दान -पुण्य, कथा श्रवण के माध्यम से अपने आपको पोषित कर पुख़्ता करने वाला कहा गया है। पौषमास में खेतों में लहराती फसलें भी तुहिन कणों से शीतलता पाकर पुष्ट हो लहलहा उठती हैं ।
उषा सक्सेना
Paush Month गुरू की महिमा और ज्ञान के संवर्धन को दर्शाता पौषमास
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