Thursday, April 9, 2026
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Mangal Nath Temple Ujjain: महाकाल की नगरी उज्जैन और भूमिपुत्र मंगलनाथ

by KhabarDesk
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Mangal Nath Temple Ujjain

Mangal Nath Temple Ujjain :  महाकाल की नगरी उज्जैन अनेक विशेषताओं को लिये जानी जाती है। अपने भक्तों की रक्षा के लिये शिव जी ने जितने रूप धारण किये उनमें से उनका एक रूप मंगलनाथ भी है, जिसका कार्य सभी कष्ट बाधाओं और दोषों को दूर करते हुये मंगल करना है। अंधकासुर के साथ हुये शिव जी के युद्ध की भूमि उज्जैन ही थी।

अंधकासुर को मिला था शिव जी का वरदान

यहांँ पर शिवजी को प्रसन्न कर अंधकासुर ने उनसे वरदान मांगा था कि धरा पर उसकी जितनी रक्त की बूंदें गिरेंगी वह उसी का रूप लेकर अंधकासुर का नया जन्म  लेंगी। इस तरह दैत्य अंधकासुर अमर हो गया और सम्पूर्ण धरा उसके प्रतिरूपों से भर गई। सभी देव ऋषि मुनि उसके अत्याचारों से त्रस्त हो गये कोई भी उसे मार नहीं पाया। तब स्वयं महादेवने उससे युद्ध किया । अंत में जब वह भी उसे नहीं हरा पाये तो उनके मस्तक से अत्यधिक श्रम के कारण पसीने की बूंदें भूमि पर गिरीं जिससे अत्यधिक गर्मी के कारण धरती फट गई और धरती ने अंधकासुर के रक्त की बूंदों‌ को अपने में समेट कर सोख लिया। उन रक्त की बूंदों को अपने आंँचल में सहेज कर एक पुत्र को जन्म दिया। भूमि का वह पुत्र शिव जी का मंगल के रूप में नया अवतार था। धरती ने अंधकासुर के रक्त को जिस स्थान पर सोखा था वहां की धरती आज भी अंधकासुर के रुधिर से रक्त रंजित हुई लाल है।

सबके कल्याण के लिए मंगलनाथ के रूप में हुआ था जन्म

सृष्टि में सभी की रक्षा और कल्याण के लिये उनका जन्म होने के कारण उनका नाम मंगलनाथ पड़ा। बाद में वह देवताओं की रक्षा के लिये उनकी सेना के सेनापति बनें। जिस दिन उनका जन्म हुआ वह दिन मंगल देव के नाम को समर्पित होने से मंगलवार कहा जाने लगा। ज्येष्ठ मास कृष्णपक्ष की अमावस्या के बाद आने वाले मंगलवार को ही उनका जन्म माना जाता है। इसलिये ये मंगलवार शिव जी के पुत्र रूप में भूमि पुत्र भौम को समर्पित मंगलवार है। मंगलनाथ की विशेष पूजा व्यक्ति के जीवन में आये अंधकार को दूर करती हुई समस्त दोषों का निवारण करती है ।

इस कथा के पीछे छिपे रहस्य को समझें

हमारे ऋषि मुनियों ने बात को सीधे से न कहकर उसे आख्यानों के माध्यम से प्रकट किया है। सत्य तो यह है कि तमोगुण प्रधान महादेव के द्वारा सृष्टि का प्रलय अंधकार में होता है और उस अंधकार की समाप्ति के पश्चात नई सृष्टि का सृजन उसी रक्त रंजित धरा पर होता है। शिव ही तब नव सृजन के लिये भोर की लालिमा लेकर दिवस के प्रकाश के लिये ज्योतिर्मय सूर्य के स्रूप में प्रकट होकर सृष्टि के क्रम को आगे बढ़ाते है। शिव का यह मंगल कारी रूप ही मंगलनाथ है जिसकी जन्मभूमि अवन्तिका अर्थात उज्जैन है।

नवग्रहों में मंगल का विशेष स्थान

नवग्रहों में मंगल का स्थान तीसरा है। सूर्यदेव यदि राजा है और चंद्रमा रानी तो उनकी सेना के सेनापति मंगल देव हैं। अपने पराक्रम के कारण ही उन्हें यह स्थान प्राप्त है। वह कोई और नहीं भूमिपुत्र है, जो अंधकार रूपी दैत्यों का विनाश करने के लिये ही जन्मा है। हे भूमिपुत्र सभी का मंगल करें। हमारे कृषक ,श्रमिक और सैनिक‌ ही तो वह भूमिपुत्र हैं जिनकी शक्ति के बल पर सृष्टि का सृजन रथ आगे बढ़ता है। जै मंगलनाथ सभी का मंगल करें।

उषा सक्सेना

डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें

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