Sunday, April 12, 2026
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षट्तिला एकादशी पर इस उपाय से दूर होते हैं दुर्भाग्य और दरिद्रता

by KhabarDesk
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Shattila Ekadashi :  दिव्य महाकुंभ का माघ मेला, माघ मास की कृष्ण पक्ष की षट्तिला एकादशी और ऐसे में विशेष रूप से तीर्थराज प्रयाग में साधु संत समागम के साथ संगम स्नान और तब तिलगुड़ का दान अपने आप में इस व्रत का फल हजार गुना बढ़ जाता है। ऐसा व्यक्ति स्वयं भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की कृपा से संसार के सारे सुखों को भोग कर उनके बैकुंठ लोक को जाता है। षट्तिला एकादशी का वर्ष की चार एकादशियों में महत्वपूर्ण स्थान है‌।

षट्तिला एकादशी व्रत से मिलता है मोक्ष

एक बार दालभ्य ऋषि ने अपने गुरू पुलत्स्य ऋषि से प्रश्न करते हुये कहा कि -“हे प्रभू ! ऐसा कौन सा व्रत है जिसके करने से मनुष्य, संसार में किये गये सारे पापों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है”। तब पुलत्स्य मुनि ने अपने शिष्य दालभ्य मुनि को षट्तिला एकादशी का महात्म्य बतलाते हुये कहा कि जो भी व्यक्ति आज के दिन प्रात: स्नान करने के पश्चात काले तिल और गुड़ का दान करता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

पौराणिक कथा :-

एक बार देवर्षि नारद ने विष्णुजी से पूछा, ऐसा कौन सा व्रत है जिसके करने से व्यक्ति को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। तब विष्णु जी ने नारद मुनि को समझाते हुये कहा केवल व्रत करने से ही संपूर्ण फल नहीं मिलता वरन उसके साथ दान का भी अपना महत्व है। संसार का नियम है जो तुम दोगे वही लौटकर तुम्हारे पास आयेगा। इस विषय में एक कथा है। एक बार मेरी भक्त ब्राह्मणी ने पूरे माघ मास व्रत किया जिसके कारण वह अत्यंत दुर्बल हो गई। उसने स्नान के बाद मेरा पूजन और भजन तो किया किंतु यह सोच कर कि मेरे इस एक माह व्रत करने के कारण मुझे बैकुंठ तो मिलेगा ही फिर मै क्यों दान करूं।

मै उसके पास एक साधु का वेष धारण कर भिक्षा मांगने गया तो उसने कुछ देने के स्थान पर एक मिट्टी का ढेला मेरी झोली में डाल दिया। जब वह मृत होकर मेरे लोक में आई तो उसे रहने के लिये उस मिट्टी के ढेले के स्थान पर स्वर्ण महल मिला किंतु अन्नधन नहीं। यह देख कर वह मेरे पास आई और अपनी व्यथा कहने लगी कि स्वर्ण महल सुंदर है किन्तु ‌भोजन के लिये कुछ नही है। तब मैंनें उससे कहा :-“जब स्वर्ग की देव स्त्रियां तुमसे मिलने आयें तो उनसे कहना कि पहले मुझे षट्तिला एकादशी की कथा सुनाओ तब द्वार खोलूंगी “।

ब्राह्मणी ने ऐसा ही किया। जब वह सभी उससे मिलने आईं तो ब्राह्मणी ने पहले षट्तिला एकादशी की कथा सुनाने की बात कही। तब एक देवस्त्री ने उसे षट्तिला एकादशी की कथा सुनाई जिसके सुनते ही उसका महल अन्न धनधान्य से भर गया। उसने द्वार खोलकर उन सभी का प्रेमपूर्वक स्वागत करते हुये उन सभी को तिलगुड़ दान में दिया। उन देव स्त्रियों ने उसके दर्शन कर उसे अपने आशीर्वाद दिये।

दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर गमन करते सूर्य देव जब मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो पूरे एक माह अपने पुत्र शनिदेव के घर में निवास करते हैं। काला तिल शनि को प्रिय है और गुड़ सूर्यदेव को। इन दोनों की प्रसन्नता के लिये तिलगुड़ के दान का महत्व है । अत्यधिक शीत में गुड़ शरीर को गर्मी देता है और शुष्क हुये तन मन को तिल तैलीय होने के कारण स्निग्धता प्रदान करता है। इसीलिये धर्म से जोड़कर ऋषि-मुनियों ने शोध करते हुये षट्तिला के रूप में इसका प्रावधान किया। जिनके पास नही है और जो गरीब भिक्षु हैं उनको दान देकर हम अपनी उदारता प्रकट करते हैं। जिसके करण सामने वाले की आत्मा भी तृप्त होकर हमें आशीर्वाद देती है।
।।ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय।।
ऊषा सक्सेना

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