Lord Ram embraced by Indian Culture : भारतीय जन मानस में राम इतने रचे बसे हैं कि उनके बिना कोई कार्य हो भी नही सकता। आते राम ,जाते राम, सोते उठते राम ही राम। अच्छा हुआ तो राम की इच्छा,बुरा हुआ तो राम राम!
लोक जीवन में राम:-
व्यक्ति के अंतिम समय शव यात्रा श्मशान ले जाने से पहले भी “राम नाम सत्य है ” कहा जाता है। यदि किसी को अपनी बात के सत्यापन के लिये सौंगंध खानी है तब भी *राम दुहाई *कह कर वह कर सारी बात राम पर डाल देगा। इस तरह हम देखते हैं कि हमारी भारतीय संस्कृति में लोकजीवन का हर पल राम के नाम में ही रचा बसा है। वह हमारी लोक धर्मिता के आधार स्तम्भ है। यही राम के नाम की महिमा हे जो अपरम्पार है। उनका संपूर्ण जीवन आदर्श बनकर हमारे समक्ष उदाहरण प्रस्तुत करता है कि एक आदर्श पुरुष को किस प्रकार से अपने सभी रिश्तों को आदर्श रूप में स्थापित करते हुये अपने दायित्व का निर्वहन करना चाहिये।
राम का जीवन ही लोक जीवन की मर्यादा है
उनका जीवन ही लोक जीवन है। सुख दुख में एक समान। अपने धर्म का पालन करते हुये उन्होंने गुरु विश्वमित्र की आज्ञा पाकर ही सीता स्वयंवर में शिव धनुष को भंग कर सीता से विवाह किया । पिता की आज्ञा का पालन करते हुये राजवैभव का परित्याग कर 14 वर्ष के लिये वनवास गये। वन वन भटकते हुये कंद-मूल फल खाकर वनवासी जीवन बिताया। ऋषिमुनियों के यज्ञ की रक्षा करते हुये असुरों का संहार किया। वन में बसने वाली जनजातियों में जागृति लाकर उनसे मित्रता करके मैत्री भाव दर्शाया। लंकापति रावण के द्वारा सीता का हरण करने पर राम ने उपलब्ध साधनों से ही रावण के साथ युद्ध करते हुये उसका संहार कर सीता को उसकी कैद से मुक्त किया। अयोध्या के राजकुमार होकर भी उन्होंने अयोध्या से सहायता नहीं मांगी। यह उनके स्वाभिमान को दर्शाता हुआ मानव को शिक्षा देता है कि धैर्य पूर्वक छोटे बड़े का भेदभाव भूलकर सभी को समान समझो ।
तभी किसी भी समय कैसी भी आपदा आने पर संचित साधनों से भी महाबली रावण जैसे शत्रु का संहार किया जा सकता है। एक आदर्श पति के रूप में पत्नी की रक्षा के लिये इतना बड़ा युद्ध किया। लक्ष्मण को शक्ति लगने पर उनको मूर्च्छित देख व्याकुल हो करुण विलाप करते। हनुमान जी जैसे भक्त और सुग्रीव विभीषण जैसे मित्रों के साथ कृत संकल्प होकर वानर रीछ भालू जैसी जन जातियों को लेकर युद्ध जीतना आसान नहीं था। जटायु जैसे पक्षीराज को सीता की रक्षा में आहत हो प्राण त्यागने पर पितृवत उन्हें मानकर उनका अंतिम दाह संस्कार किया।
यही तो राम का उदात्त चरित्र है जिसने उन्हें लोकजीवन में स्थान देकर एक आदर्श पुरुष को कैसा होना चाहिये यह अपने कार्यों से सिद्ध किया। भारतीय संस्कृति के मूलाधार लोकधर्मिता का पाठ पढ़ाने वाले राम ही तो हैं जो मर्यादित जीवन के रूप में मर्यादा पुरुषोत्तम बनें।
उषा सक्सेना