Dasha Mata : चैत्र माह कृष्ण पक्ष की दशमी को दशा माता की पूजा की जाती है। दशा माता आदि शक्ति पार्वती का ही एक रूप है जो व्यक्ति की दीन हीन दशा को भी उनकी शरण में जाने पर व्यक्ति की दशा परिवर्तन कर उसे सभी प्रकार के सुख वैभव और सौभाग्य का वरदान देती हैं । दशा की स्थिति बदलने के कारण ही इनका नाम दशा माता पड़ा ।
दशा माता की पौराणिक कथा :-
राजा नल और दमयंती की कथा इस विषय में प्रचलित है। महारानी दमयंती भगवान विष्णु और महालक्ष्मी को पूजा के समय मौलि में चंदन लगा कर उन्हें अर्पित करती थीं बाद में जो भी मौलि शेष रहती उसे देवी का प्रसाद समझ कर अपने गले में धारण करते समय माता से अपने पति और राज्य के कल्याण की कामना करतीं। यह उनका प्रतिदिन का नियम था । एक दिन राजा नल ने उन्हें वह कच्चे सूत की माला पहनते देख लिया तो वह महारानी से क्रोधित होकर कहने लगे :-“इतने बड़े साम्राज्य की साम्राज्ञी होकर भी तुम इस कच्चे सूत की माला पहनती हो” ? यह कह कर उन्होने उस सूत्र को तोड़ कर फेंक दिया । दशा माता के उस सूत्र का अपमान कर फेंकते ही राजा नल अपना सम्पूर्ण राज्य अपने छोटे भाई के साथ जुये में हार गये जिसके कारण उनके भाई ने उन्हें उनके ही राज्य से निष्कासित कर दिया। अब वह दर-बदर की ठोकरें खाते वन में इधर उधर भटकने लगे। एक रात दुखी होकर वह अपनी पत्नी दमयंती को सोता हुआ छोड़ कर चले गये।
दशा परिवर्तन कर सभी प्रकार के सुख वैभव और सौभाग्य का वरदान
अपने आपको जंगल में अकेला देख कर महारानी दमयंती देवी माता की शरण में गई और दशा माता से प्रार्थना की तो स्वप्न में दशा माता ने उन्हें दर्शन देते हुये कहा कि पीपल के वृक्ष में कच्चे सूत्र को लपेट कर दशा माता हमारे दिन बदले कहते हुये दस गांठ लगा कर चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को मेरा आवाहन कर पूजन करो। मेरे आशीर्वाद से तुम्हारा सौभाग्य खोया हुआ पति और खोया राज्य सभी पुन: प्राप्त होगा।
राजा नल और दमयंती को मिला खोया हुआ सौभाग्य
उधर राजा नल को भी देवी ने स्वप्न में आदेश दिया वह कच्चेसूत्र को पीपल में लपेट कर उसके दस सूत्र में दस गाँठें लगा कर देवी मां को समर्पित करने के पश्चात अपने गले में धारण करें इससे उनके दिन पुन: परिवर्तन होकर पहले जैसे हो जायेंगे। अपनी महारानी के साथ अपने ही राज्य में जाकर भाई के साथ पुन: जुआ खेले मेरे आशीर्वाद से तुम्हारी जीत होगी। राजा नल ने ऐसा ही किया जिसके कारण देवी के आशीर्वाद से उन्हें उनका खोया हुआ सम्मान और राज्य प्राप्त हुआ। राजा नल और महारानी दमयंती ने देवी माँ को धन्यवाद देते हुये चैत्र माह की दसमी को दशा माता के नाम से समर्पित करते हुये अपने राज्य में सभी इसका पूजन करें ऐसी घोषणा करवा दी। जै दशामाता सभी को संतान का सुख और सौभाग्य प्रदान करें ।
सर्वे भवन्तु सुखिन:,सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु,मा कश्चिद् दुख भाग भवेत् ।।
उषा सक्सेना
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें