Saturday, April 18, 2026
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अहोई अष्टमी व्रत : मातृत्व की ममता और संतान की दीर्घायु का पर्व

Ahoi Ashtami Vrat

by KhabarDesk
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Ahoi Ashtami

Ahoi Ashtami : अहोई माता का व्रत मातृत्व और संतान के पवित्र बंधन का प्रतीक है। यह व्रत माताओं की श्रद्धा, विश्वास और निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक बनकर पीढ़ियों से परिवार की सुख-शांति और समृद्धि का आधार माना जाता है।

– डॉ. प्रियंका सौरभ

भारतीय संस्कृति में व्रत और त्योहार केवल पूजा-पाठ के माध्यम नहीं हैं, बल्कि यह जीवन के आदर्शों, भावनाओं और संबंधों की गहराई को दर्शाते हैं। इन्हीं में से एक है अहोई अष्टमी व्रत, जो मातृत्व की भावना से जुड़ा एक अत्यंत पवित्र पर्व है। यह व्रत माताएँ अपने बच्चों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखती हैं। यह पर्व माँ के त्याग, स्नेह और श्रद्धा का अद्भुत प्रतीक है।

तिथि: 13 अक्टूबर 2025, सोमवार
अष्टमी तिथि प्रारंभ: 13 अक्टूबर सुबह 9:15 बजे
अष्टमी तिथि समाप्त: 14 अक्टूबर सुबह 7:10 बजे
तारा दर्शन मुहूर्त (व्रत खोलने का समय): शाम 6:45 बजे से 7:15 बजे तक (स्थानीय समय अनुसार)
योग: रवि योग, शिव योग, परिधि योग
नक्षत्र: पुनर्वसु नक्षत्र
व्रत उद्देश्य: संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की कामना हेतु।

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अहोई अष्टमी का व्रत किया जाता है। यह पर्व करवा चौथ के ठीक चार दिन बाद और दीपावली से सात दिन पहले आता है। वर्ष 2025 में अहोई अष्टमी 13 अक्टूबर, सोमवार को मनाई जाएगी। इस दिन आद्रा और पुनर्वसु नक्षत्र, बव करण, परिधि योग तथा शिव योग जैसे शुभ संयोग बन रहे हैं। इस शुभ मुहूर्त में अहोई माता की पूजा और व्रत विशेष फलदायी मानी जाती है।

अहोई अष्टमी व्रत का उद्देश्य संतान की दीर्घायु, सुख और सुरक्षा के लिए माँ द्वारा किया गया एक निस्वार्थ संकल्प है। इस दिन माताएँ निर्जला उपवास रखती हैं और रात्रि में तारा दर्शन के बाद ही व्रत खोलती हैं। यह व्रत नारी के समर्पण और आस्था की मिसाल है। प्राचीन समय में इसे केवल पुत्र की लंबी आयु के लिए रखा जाता था, परंतु अब यह सभी बच्चों—पुत्र-पुत्री दोनों—के कल्याण हेतु किया जाता है।

किंवदंती के अनुसार, बहुत समय पहले एक साहूकार दंपति रहता था। उनकी सात संतानें थीं। दीपावली के दिनों में घर की सजावट हेतु साहूकार की पत्नी जंगल में मिट्टी लेने गई। जब वह मिट्टी खोद रही थी, तब उसके फावड़े से अनजाने में एक साही (साही के बच्चे) को चोट लग गई और उसकी मृत्यु हो गई। यह देखकर वह बहुत दुखी हुई। कुछ समय बाद उसके सातों पुत्रों की मृत्यु हो गई। वह शोक में डूबी रहने लगी और सोचने लगी कि यह सब उसके पाप का परिणाम है। एक दिन उसने अपनी व्यथा एक साधु को सुनाई। साधु ने कहा कि तुमने अनजाने में पाप किया है, इसलिए अहोई माता की पूजा और व्रत करो, वे तुम्हें क्षमा करेंगी और तुम्हारे पुत्रों की रक्षा करेंगी। उसने सच्चे मन से अहोई माता का व्रत किया। उसकी श्रद्धा और पश्चाताप से प्रसन्न होकर अहोई माता ने उसके सभी पुत्रों को जीवनदान दिया। तभी से यह व्रत मातृत्व, क्षमा और करुणा का प्रतीक बन गया।

अहोई अष्टमी के दिन प्रातःकाल स्नान के बाद माताएँ संकल्प लेती हैं कि वे दिनभर व्रत रखकर अपने बच्चों की मंगलकामना करेंगी। इस दिन निर्जला उपवास रखना श्रेष्ठ माना गया है, परंतु कुछ महिलाएँ फलाहार कर सकती हैं। शाम के समय पूजा की तैयारी की जाती है। दीवार पर या कागज पर अहोई माता का चित्र बनाया जाता है। चित्र में अहोई माता, साही माता और सात पुत्रों के प्रतीकात्मक चित्र होते हैं। साथ में सात तारे या बिंदु बनाए जाते हैं, जो सात संतान या सात पीढ़ियों का प्रतीक माने जाते हैं। पूजा की थाली में कलश, जल का लोटा, दूध, रोली, चावल, हलवा, पूड़ी, मिठाई और चांदी की अहोई रखी जाती है।

संध्या के समय जब तारा उदय होने लगता है, तब दीप जलाकर माता अहोई की पूजा की जाती है। कथा सुनी जाती है और अहोई माता से प्रार्थना की जाती है कि जैसे आपने साहूकारनी के पुत्रों को जीवनदान दिया था, वैसे ही मेरे बच्चों की रक्षा करें। पूजा के बाद माताएँ आकाश में तारे को देखती हैं, उसे जल अर्पित करती हैं और उसी क्षण व्रत खोलती हैं। कई जगह माताएँ यह व्रत चाँद निकलने पर भी खोलती हैं, किंतु पारंपरिक रूप से तारा दर्शन का महत्व सबसे अधिक माना गया है।

“अहोई” शब्द का अर्थ ही है—“अहो” यानी गलती और “ई” यानी क्षमा। अहोई माता वह देवी हैं जो अनजाने में हुए पापों को क्षमा करती हैं और अपने भक्तों के जीवन से संकट दूर करती हैं। उन्हें माता पार्वती का ही एक स्वरूप माना गया है। इस दिन पार्वती जी के साथ भगवान शिव की पूजा भी विशेष रूप से शुभ मानी जाती है। शिववास योग होने पर पूजा का प्रभाव और भी बढ़ जाता है।

अहोई अष्टमी का व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि यह समाज में स्त्री की भूमिका, उसकी संवेदनशीलता और त्याग को उजागर करता है। यह पर्व मातृत्व के उस रूप को सामने लाता है, जो न केवल सृजन करती है बल्कि संरक्षण भी करती है। इस व्रत में माँ यह संकल्प लेती है कि वह अपने बच्चों की रक्षा और उन्नति के लिए हर तप, हर त्याग करने को तैयार है। यही भावना भारतीय संस्कृति में नारी को पूजनीय बनाती है।

आज के आधुनिक युग में भी अहोई अष्टमी का महत्व कम नहीं हुआ है। शहरों और व्यस्त जीवनशैली के बावजूद महिलाएँ इस दिन उपवास रखती हैं, ऑनलाइन कथा सुनती हैं और डिजिटल रूप में भी पूजा करती हैं। भले ही माध्यम बदल गए हों, परंतु भावना वही है—माँ की निस्वार्थ ममता और अपने बच्चों के सुख की कामना। यह परंपरा यह भी सिखाती है कि संस्कृति समय के साथ बदलती है, पर उसकी जड़ें आस्था और संबंधों में ही रहती हैं।

अहोई अष्टमी का एक पर्यावरणीय संदेश भी है। कथा में वर्णित साही एक वन्य जीव है, जो भूमि और जंगल की उर्वरता में सहायक होता है। इस कथा के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि प्रकृति और जीवों के प्रति दया और करुणा रखना मानव का धर्म है। अनजाने में भी किसी जीव को कष्ट देना पाप माना गया है। इस दृष्टि से अहोई अष्टमी केवल संतान की पूजा नहीं, बल्कि जीवों के प्रति करुणा और प्रकृति के प्रति सम्मान का भी पर्व है।

यह व्रत परिवार के भीतर एकता, स्नेह और सामाजिक जुड़ाव का भी माध्यम है। माताएँ एक साथ बैठकर कथा सुनती हैं, पूजा करती हैं, और अपनी अनुभूतियाँ साझा करती हैं। इससे न केवल पारिवारिक बंधन मजबूत होते हैं बल्कि पीढ़ियों तक संस्कारों का प्रवाह बना रहता है। छोटे बच्चे भी इस दिन अपनी माँ को पूजा करते देखते हैं और उनके मन में आस्था के बीज पड़ते हैं।

अहोई अष्टमी जीवन के उस भाव को भी अभिव्यक्त करती है जिसमें गलती करने के बाद पश्चाताप और सुधार का मार्ग खुला रहता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि यदि किसी ने अनजाने में कोई भूल कर दी हो, तो सच्चे मन से पश्चाताप और ईश्वर की प्रार्थना करने से क्षमा प्राप्त की जा सकती है। यह क्षमा की भावना समाज को मानवीय और संवेदनशील बनाती है।

भारतीय परंपराओं में हर त्योहार के पीछे एक गहरा सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश छिपा होता है। अहोई अष्टमी भी यही सिखाती है कि सच्चा धर्म केवल पूजा-पाठ में नहीं, बल्कि प्रेम, क्षमा और करुणा में निहित है। जब माँ अपनी संतानों के लिए तारा देखकर व्रत खोलती है, तब वह केवल अपने बच्चों की नहीं, बल्कि पूरे परिवार की मंगलकामना करती है। यह व्रत जीवन में संयम, श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है।

अंततः अहोई अष्टमी भारतीय नारी की उस शक्ति को नमन है जो सृजन करती है, पोषण करती है और रक्षा भी करती है। यह पर्व मातृत्व की पवित्रता का उत्सव है। जिस समाज में माँ का आदर किया जाता है, वहाँ सदैव शुभता और समृद्धि बनी रहती है। अहोई अष्टमी की यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि माँ केवल जननी नहीं, बल्कि एक देवी स्वरूप है जिसकी ममता से ही संसार चलता है।

डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें।

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