Akshaya Tritiya : वैशाख माह शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया क्यों कहते हैं ? मन में जिज्ञासा उत्पन्न उत्तर मांगता प्रश्न ? सच है जब तक हम किसी शब्द के अर्थ और उसके पीछे छिपे कारण को नहीं समझेंगे तो उसे क्यों माने ! अ+क्षय अर्थात जिस में किये गये कार्य के पुण्य का कभी क्षय न हो । वो है भगवान विष्णु को समर्पित वैशाख माह में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि जिसे आखा तीज भी कहते हैं ।
अक्षय तृतीया पर सोना खरीदने का विशेष महत्व
आज के दिन सोना एवं अचल सम्पत्ति खरीदने का भी विशेष महत्व है। इस दिन भगवान विष्णु के छठवें अंश परशुराम जी का जन्म हुआ था। आज के दिन से ही शुभ वैवाहिक मंगल कार्य का प्रारम्भ होता है। यदि किसी को कोई शुभ मुहूर्त अपने कार्य को करने के लिये नहीं मिल रहा तो वह इस दिन उस कार्य का शुभारंभ कर सकता है ।
अक्षय तृतीया पर गुड्डा-गुड्डी का विवाह:-
बुंदेलखंड, छत्तीसगढ़ के साथ ही कुछ अन्य क्षेत्रों में आज के दिन गुड्डा-गुड्डी जो कि मिट्टी के बना कर उन्हें सुंदर वर और वधू के रूप में सजा कर
वटवृक्ष के चारों ओर उनके फेरे लगा कर विवाह की विधि भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी के रूप में सम्पन्न की जाती है। इसीलिये विवाह के समय वर में विष्णु और वधू के रूप लक्ष्मी को उनका प्रतिरूप मान कर उनका पूजन करते हुये सम्मान किया जाता है । कहते हैं कि आज के दिन हुये विवाह कभी टूटते नहीं आजीवन रहते हैं । इसीलिए भारतीय संस्कृति में आज के दिन का वैवाहिक मांगलिक कार्य के लिये सबसे अच्छा दिन माना जाता है। जिन घरों में कन्यायें नहीं होतीं वह मिट्टी के ही गुड्डा गुड्डी को सजा कर उनका विवाह करते हुये अपने घर में मांगलिक कार्य करते हैं। लड़कियों में बचपन से ही गुड्डा-गुड्डी के खेल के माध्यम से उनमें संस्कार आरोपित किये जाते हैं।
इस खेल में एक का गुड्डा होता है तो दूसरी की गुड़िया दोनों ही पक्ष अपनी अपनी भूमिका निर्वहन करते है। वर पक्ष वाला अपने गुड्डे की बारात लेकर आता है तो वधू पक्ष वाला बकायदा वर पक्ष का स्वागत कर बारातियों का सम्मान करते हुये सजे हुए मंडप के नीचे उनका विवाह करने के बाद अपनी गुड़िया की बिदाई कर देते हैं। बहुत भावुक होते हैं वह दृश्य जिनके माध्यम से लड़कियों को बाल्यावस्था में ही इस प्रकार के संस्कारों से संस्कारित किया जाता था । इसे अख्ती के आखत भी कहते हैं ।
आज के दिन घरों में चौक पूरकर उस पर मिट्टी के घट को स्थापित कर उसे शुद्ध जल से भरने के पश्चात उस पर एक दोने में सत्तू भर कर उस पर गुड़ ,आम और पंखा रख कर कुछ दक्षिणा के साथ ब्राह्मण को दान किया जाता है। अक्षय तृतीया के दिन किसी पवित्र नदी में स्नान कर उसके पश्चात दान करने का भी विशेष महत्व है। आज के दिन किये गये सत्कार्यों का पुण्य कभी क्षय नही होता ।
अक्षय तृतीया की पौराणिक कथा :-
प्राचीन काल में एक गांव में धर्मदास नाम का गरीब वैश्य रहता था। वह अपनी गरीबी के कारण परेशान था । एक दिन उसने कुछ ऋषि-मुनियों से अक्षय तृतीया की कथा के विषय में सुना। अब जब भी अक्षय तृतीया आती उस दिन नदी में जाकर स्नान करने के पश्चात जो भी उस समय उसको उपलब्ध होता वह दान कर देता । इस तरह उसके दान के अक्षय प्रभाव से उसके दिन बदले और वह अमीर बन गया। अब उसके पास किसी वस्तु की कमी नहीं थी ।अपने अक्षय तृतीया के प्रभाव से वह अगले जन्म में कुशावती का राजा बना और राज सुख वैभव भोग कर अंत मे मोक्ष को प्राप्त हुआ । इसीलिए आज का यह दिन अपने आप में विशिष्टता लिये हुये विशेष फल देता है । ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय। जै लक्ष्मी नारायण।
उषा सक्सेना-
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें।