Tuesday, April 14, 2026
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Ambedkar Jayanti बाबा साहब अंबेडकर के विचार, संघर्ष और भारत में दलितों की स्थिति

by KhabarDesk
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Ambedkar Jayanti

Ambedkar Jayanti : बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को महाराष्ट्र में महार जाति के परिवार में हुआ था। दलित होने के कारण उन्हें बचपन से ही सामाजिक विषमता और प्रताड़ना को झेलना पड़ा था। स्कूल में पढ़ाई के दौरान उन्हें बाकी छात्रों के साथ बैठने की अनुमति नहीं थी। ऊंची जाति का न होने के कारण स्कूल में संस्कृत पढ़ने की भी इजाजत नहीं थी । सामाजिक भेदभाव और विषमता झेलने के बाद भी शिक्षा और ज्ञान को लेकर उनका जुनून ही था कि उन्होंने जीवन भर शिक्षा प्राप्त करने को अपना उद्देश्य बनाया और बड़ी से बड़ी डिग्रियां हासिल करते गए।

उन्होंने बंबई यूनिवर्सिटी से स्नातक की परीक्षा पास की और आगे की पढ़ाई करने के लिए अमेरिका चले गए, वहां कोलंबिया यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। वहां से मास्टर्स की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने पीएचडी की डिग्री भी हासिल की। अमेरिका में अपनी पढ़ाई के दौरान वे उदारवाद और रेडिकल विचारधारा से काफी प्रभावित हुए। फ्रांस की क्रांति और उससे उपजे विचारों से भी वे काफी प्रभावित थे। उन्होंने अमेरिका में नस्लीय भेदभाव के खिलाफ संघर्ष को करीब से देखा और उसे देखने के बाद उन्हे भारत में जातीय विषमता से लड़ने की प्रेरणा मिली। दूसरी तरफ अपनी पढ़ाई के दौरान अर्थशास्त्र में भी उनकी गहरी रुचि हो गई थी और उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था पर उपनिवेशवाद के प्रभाव को लेकर काफी गहन अध्ययन किया।

भारत की अर्थव्यवस्था, राजनीति और सामाजिक जीवन पर उपनिवेशवाद के प्रभाव को लेकर उन्होंने अपने शोध के जरिए पड़ताल की । एम ए में उनके Dissertation का विषय था, एडमिनिस्ट्रेशन एंड फाइनेंस ऑफ़ द ईस्ट इंडिया कंपनी (Administration and Finance of the East India Company) और उनकी पीएचडी थीसिस इवोल्यूशन ऑफ़ द प्रोविंशियल फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया ( The Evolution of the provincial Finance in British India) पर आधारित थी। कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान उनके द्वारा किया गया शोध कार्य भारत में औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था और राजनीति का गहन अध्ययन था। साथ ही उन्होंने उपनिवेश विरोधी आर्थिक विचार भी इस शोध के जरिए सामने रखे। अपनी D.Sc. dissertation में उन्होंने The Problem of the Rupee- its Origin and Its Solution में यह गहन अध्ययन प्रस्तुत किया था। कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अपनी पीएचडी पूरी करने के बाद वे भारत लौट आए जहां उन्होंने बड़ौदा महाराज के शासन में अपनी सेवाएं दीं।

विदेश में बड़ी डिग्रियां हासिल करने के बाद भी भारत में झेला जाति का दंश

बड़ौदा महाराज ने ही डॉ भीमराव अंबेडकर की योग्यता को देखते हुए पढ़ने के लिए अमेरिका भेजा था और उनकी पढ़ाई का खर्च वहन किया था। विदेश में इतनी उच्च स्तर की शिक्षा और प्रशासनिक अनुभव प्राप्त करने के बाद भी उन्हें काम के दौरान दलित होने के कारण भेदभाव का सामना करना पड़ा। जाति भेदभाव से आहत होकर उन्होंने बड़ौदा में अपनी प्रशासनिक नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और इसके बाद मुंबई के Sydenham College Of Commerce and Economics में पढ़ाने लगे। भारतीय समाज में भेदभाव को देखते हुए उन्होंने भारतीय समाज में जाति व्यवस्था के इस अंतर- विरोध और भेदभाव के खिलाफ संघर्ष करने का मन बना लिया था। 1919 में भीमराव अंबेडकर ने दलित वर्ग के लिए अलग रिप्रेजेंटेशन की मांग की थी।

दलित वर्ग को जगाने के लिए 1920 में उन्होंने मराठी में एक पाक्षिक पत्रिका “मूकनायक” भी निकाली। इसी प्रयास के तहत उन्होंने पहली ऑल इंडिया कॉन्फ्रेंस ऑफ डिप्रेस्ड क्लासेस का भी आयोजन किया। 1922 में उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से D.Sc. की पढ़ाई पूरी की और 1923 में भारत लौटकर वकालत करने लगे। वकालत करने के साथ उन्होंने राजनीतिक संगठन बनाने और लोगों को जोड़ने के प्रयास किये। इस तरह के प्रयासों में दलितों का संगठन बनाने और उन्हें जोड़ने की पहल भी शामिल थी। इसके लिए उन्होंने सबसे पहले 1924 में “बहिष्कृत हितकरनी सभा” की शुरुआत की। 1927 में वह मुंबई लेजिसलेटिव काउंसिल के लिए नामित किए गए। दलितों के संघर्ष को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने भेदभाव के खिलाफ कई आंदोलन किये और कई संगठनों की स्थापना भी की।

उन्हीं के नेतृत्व में 1928 में “डिप्रेस्ड क्लासेस एजुकेशन सोसायटी” मुंबई, की भी स्थापना की गई और उन्होंने “समता” नाम का एक जनरल भी निकालना शुरू किया। 1930 में उन्होंने नासिक के कलराम मंदिर में दलितों को प्रवेश देने के लिए सत्याग्रह भी किया और इसी साल उन्होंने अपनी अध्यक्षता में पहले ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेस कांग्रेस का नागपुर में आयोजन किया ।

अपनी स्थिति सुधारने के लिए दलितों को अपनी मदद खुद करनी होगी : डॉ बी आर अंबेडकर

डॉ अंबेडकर हमेशा यही कहते थे कि अपनी स्थिति सुधारने के लिए दलितों को खुद अपनी सहायता करनी होगी। अपने जीवन का उद्धार करने के लिए उन्हें खुद ही संघर्ष करना होगा। वह भारत के लिए एक मॉडर्न इंडिया का विजन रखते थे, जिसके लिए वे लोकतंत्र और समान रिप्रेजेंटेशन को  आधारभूत तत्व मानते थे। दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र को लेकर उनका महात्मा गांधी से भी विरोध रहा था जो राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस के दौरान 1931 में सामने आया था। महात्मा गांधी ने डॉ भीमराव अंबेडकर के दलितों के लिए सेपरेट इलेक्टोरेट के प्रस्ताव का विरोध किया था और अनशन पर बैठ गए थे। बाद में डॉक्टर अंबेडकर ने पूना पैक्ट साइन करते हुए जॉइंट इलेक्टोरेट को स्वीकार किया लेकिन उसमें दलितों के लिए रिजर्वेशन के प्रावधान को रखा गया।

डॉ आंबेडकर यह समझ गए थे कि दलितों के उत्थान के लिए उन्हें राजनीतिक सहभागिता देना भी जरूरी है। डॉ भीमराव अंबेडकर ने 1936 में इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी नाम का राजनीतिक दल भी बनाया और 1937 में मुंबई प्रोविंस का चुनाव लड़ा और 15 सीटें भी जीती। 1942 में उन्होंने एक दूसरी पार्टी बनाई जिसको “शेड्यूल कास्ट फेडरेशन” नाम दिया गया।

भारत के संविधान निर्माताओं में अग्रणी थे बाबा भीमराव अंबेडकर

कानून में उनकी विशेषज्ञता और विचारों के कारण उन्हें भारत के संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी का चैयरमैन नियुक्त किया गया और 19 अगस्त 1947 में नेहरू की कैबिनेट में वे देश के पहले लॉ मिनिस्टर भी बने । उन्होंने हमेशा ही समता मूलक समाज का पक्ष रखा और उसका समर्थन किया। वह भारत में समता मूलक समाज की स्थापना करना चाहते थे। 1951 में उन्होंने नेहरू कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया। उनका मानना था कि इतने प्रयासों के बाद भी भारत में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र नहीं है जिसकी वजह से संवैधानिक लोकतंत्र भी पूरे प्रभाव में काम नहीं कर पाएगा। अपने जीवन के अंतिम सालों में भारत में जातीय विषमता से उद्वेलित होकर उन्होंने हिंदू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया बनाने का प्रस्ताव रखा। 6 दिसंबर 1956 को उनका देहांत हो गया।

भारत को जातीय व्यवस्था के चुगंल से मुक्त करने का उनका सपना, सपना ही रह गया। लेकिन समता मूलक समाज की स्थापना और लोकतंत्र को सही अर्थों में समझने के लिए वे जीवन भर प्रयासरत रहे और सार्वजनिक जीवन में कई पदों पर रहते हुए अपनी लेखनी, किताबों और सामाजिक आंदोलनो के जरिए उन्होंने पूरे देश और समाज में जो चेतना जागृत की उसकी जीवंत धारा आज भी देखी जा सकती है। उनका मानना था कि भारतीय जाति-व्यवस्था में संसाधनों के पक्षपात पूर्ण बंटवारे, आर्थिक संसाधनों और पदों में भी पक्षपात पूर्ण रवैये के कारण समाज में दलितों का स्थान बेहद निम्न कर दिया गया है और उन्हें समाज में समान अवसर नहीं दिए गए।

उनका मानना था कि किसी भी समाज को विकास करने के लिए स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सबसे जरूरी है। कांस्टीट्यूएंट असेंबली में विचार विमर्श व बहस के दौरान उन्होंने सिविल और राजनीतिक अधिकारों के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक अधिकारों की भी बात की। बिना सामाजिक और आर्थिक अधिकार के राजनीतिक अधिकार के कोई मायने नहीं है। उनका मानना था कि दलितों के साथ हुए भेदभाव को खत्म करने और उन्हें समाज में समानता का अधिकार देने के लिए आरक्षण दिया जाना जरूरी है। ताकि एक बेहतर और समता मूलक समाज का निर्माण किया जा सके। अंबेडकर मानते थे कि जाति को समाप्त किए बिना सामुदायिक एकता, स्वतंत्रता और समानता लाना मुमकिन नहीं है।

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