Holi : भारतीय सनातन संस्कृति के अनुसार होली का त्यौहार रंगोत्सव के रूप में फागुन मास की पूर्णिमा की रात्रि होलिका दहन के पश्चात पांच दिन रंगपंचमी तक मनाया जाता है। यह तो प्रकृति का वह उत्सव है जिसमें प्रकृति शीत ऋतु के पश्चात पतझड़ आने पर अपने जीर्ण -शीर्ण पुराने पत्ते रूपी वस्त्रों का परित्याग कर नव कोंपल पल्लवों से अपना श्रृंगार करती किसी नवयौवना सी बसंत में अपने प्रिय से मिलने के लिये आतुर होती है ।
प्रेम और एकता का प्रतीक है रंगोत्सव होली
वन-में पलाश ने दहक कर आग लगा दी उसे देख सेमल भी लाल हो फूल उठा। गुलमोहर अमलतास सभी सज-धज कर तैयार थे प्रकृति देवी का श्रृंगार करने को। पुष्प धन्वा मन्मथ मथ रहे सभी के मन को, मनसिज प्रेम की देवी रति के साथ प्रकृति के पुरुष का परिणय है। आमों में बौर आ गये और बौर को आया देख कोकिला ने कुहुक मारी तो गूँज उठा वन उपवन।
होली की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार आज के दिन होलिका अपने भाई हिरण्यकश्यप के कहने पर ब्रह्मा जी के द्वारा वरदान में प्राप्त दुशाला ओढ़ कर भक्त प्रहलाद को मृत्युदंड देने के लिए आग में बैठी थी। उसे ब्रह्मा जी के वरदान स्वरूप दुशाला प्राप्त हुआ था जिसे ओढ़ कर वह प्रतिदिन अग्नि स्नान करती थी। दुशाला ओढ़ने के कारण उस पर अग्नि का कोई प्रभाव नहीं होता था। जब वह भक्त प्रह्लाद को मृत्युदंड देने के लिये उसे लेकर अग्नि में बैठी तो अचानक ऐसी हवा चली की होलिका के दुशाला ने प्रहलाद को ढक कर उसकी रक्षा की जब कि होलिका जल कर भस्म हो गई। बुराई के जलकर भस्म हो जाने से ही लोगों ने होलिकोत्सव के रूप में मनाना प्रारंभ किया। ग्रीष्म और शीत ऋतु का संधिकाल होने से इस समय खेतों में फसलें भी पक कर तैयार हो जाती हैं। किसान की मेहनत का प्रतिफल सर्वप्रथम आग में गेहूं और चने की बाली भूनकर अग्निदेव के माध्यम से ईश्वर को समर्पित किया जाता है। सारे भेदभाव भुलाकर कर ये रंगोत्सव आपसी भाई चारा और मेलमिलाप स्थापित करता है।रंग में रंगे सभी एक समान न कोई छोटा और न कोई बड़ा।
होली भाईचारे और मेल मिलाप का पर्व
समाज के मेल-मिलाप समानता का समभाव दर्शाता त्यौहार है रंगोत्सव। भारतीय संस्कृति के चार पावन त्यौहारों में से एक जिसकी सभी को प्रतीक्षा रहती है। कब होली आये और हम रंग खेलें। अमीर-गरीब छोटे बड़े का भेदभाव मिटाने वाला त्यौहार जो मन में आशा और उमंग जगाये, नवजीवन देता है। होली, हर्षोल्लास के साथ यौवन का उन्माद भरे मदनोत्सव है। आज के दिन सभी एक दूसरे के माथे पर गुलाल का टीका लगाकर, लाल गुलाल गाल पर मल कर अपना प्रेम दर्शाते हैं। घरों में आने वालों का स्वागत गुजिया पपड़िया प्रेमपूर्वक सबको खिलाकर करते हैं। आज भले ही समय के साथ इसका रूप बदल गया हो लेकिन मानव का मन और ऋतुराज बसंत का मौसम नहीं बदला। मानव बदला है प्रकृति नही। उसके रंगों में रंग कर ही तो हमारा जीवन भी रंगीन होता है।
उषा सक्सेना