Gupt Navratri : माता धूमावती, विपरीत गुणों का प्रतिनिधित्व करती है। ऋग्वेद में इन्हें सुतरा कहा गया है। इनकी उत्पत्ति के विषय में कहा जाता है कि जब शिव जी के बार-बार मना करने पर भी यह उनकी अवहेलना करते हुये अपने पिता दक्ष के यज्ञ को विध्वंस करने गईं तो वहां पर इन्होंने स्वेच्छा से अपने आप को अपनी ही क्रोधाग्नि से जलाया। इनके जलने से जो धुँआ उत्पन्न हुआ,उसी धुंये से इनकी उत्पत्ति हुई। इसीलिए इनका नाम भी धूमावती पड़ा ।अपने पति को छोड़कर आने के कारण इनके चेहरे पर उदासी छाई हुई थी। अत:भौतिक स्वरूप में इन्हें उदास धुंए के रूप मे जाना जाता है। जिसका जन्म ही धुंये से हुआ हो उसका धूमावती ही तो नाम होगा,अपने नाम की सार्थकता सिद्ध करता ।
शिव को ही बना लिया था आहार !
एक कथा के अनुसार एक बार देवताओं ने अपनी रक्षा के लिये यज्ञ करते हुये देवी से प्रार्थना की। देवी ने प्रकट हो कर उन्हें दर्शन देते हुये कहा:- “-इस समय मुझे बहुत जोर की भूख लग रही है अत: तुम सभी पहले मेरी भूख शांत करने के लिये आहार का प्रबंध करो तभी मैं तुम्हारा कार्य करूंगी। उस समय आहार के लिये कहीं कुछ भी न दिखने पर देवताओं ने शिवजी को ही उन्हें आहार के रूप में समर्पित करते हुये सौप दिया। देवी उस समय ध्यान मग्न थी अत:बिना देखे ही शिव जी को अपना आहार समझ भक्षण कर लिया। शिव जी के भक्षण से उनके कंठ में कालकूट विष होने से देवी का शरीर भी जल कर धुंआ धुंआ होने लगा और वह धूम रूप उदास विधवा के रूप को धारण करती प्रकट हुई।
अपने पति शिव जी को देवताओं के मध्य न देख कर उन्होंने देवताओं से पूंछा :- “मेरे पति महादेव कहां है “? तब सभी देवताओं ने सिर झुका कर कहा :-“हे! देवी आपने उनको ही तोआहार के रूप में भक्षण कर अपनी क्षुधा शांत की। उस समय पर और कोई दूसरा प्रबंध नही हो सका इसलिये हमने महादेव जी को ही आपको समर्पित किया कि यह तो महाकाल है इन्हें आप ही पचा सकती हैं ।”यह सुनकर देवी हाहाकार कर उठीं और देवताओं से कहने लगीं:-“तुम लोगों ने मेरे पति को ही मेरा आहार बना कर मुझे विधवा कर दिया। इसीलिए मेरी यह देह भी केवल धूम रूप हो गई। मैने अपने ही पति का बिना देखे भक्षण कर लिया अत: सुहागिन स्त्रियों के लिये मेरा दर्शन वर्जित होगा।
यह कहते हुये उन्होंने धुंँये के रूप में वमन करते शिव जी को उगल दिया। धुँये के ही रूप में प्रकट होने के कारण वह धूमेश्वर महादेव बने। देवी को देवताओं ने धूमावती के रूप में पूजन करते हुये उनसे अपने सभी संकटों के निवारण की प्रार्थना की और तब देवी ने धूमावती के रूप में कष्टों का निवारण किया। इसीलिये केवल विधवा औरतें एवं पुरुष ही देवी धूमावती की पूजा कर सकते हैं।
कहते हैं महाप्रलय के बाद भी जब श्मशान से महाकाल का अंतर्ध्यान होता है तब वहां पर अवशिष्ट राख और धुंआ ही बचता है। उसके बाद उसी पर नवसृजन के अंकुर फूटते हैं। मानव की इच्छाओं का कोई अंत नहीं और अपनी इन इच्छाओं की पूर्ति के समय वह भक्ष्य अभक्ष्य भी नही देखता जो उसके विनाश का कारण है। महत्वाकांक्षा रूपी इच्छाओं को खाकर संतुष्ट होना ही इसका एकमात्र संकेत है। धूमावती देवी का शक्तिपीठ दतिया में है। जहां पर विधिवत उनकी पूजा होती है। एक बूढ़ी जर्जर काया श्वेत परिधान पहने उदास धुंए के रूप में देवी की प्रतिमा जिसके आगे सदैव काला परदा पड़ा रहता है। उनकी पूजा करने से वह अपने भक्तों के एक माता के रूप में कष्टों व दारिद्रय रोग एवं दु:खों का हरण करती हुई उन्हें अभय का वरदान देती हैं। जै माता धूमावती सभी का कल्याण करें और महारोग से संपूर्ण विश्व को रोग मुक्त करें।
उषा सक्सेना-
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें।