Saturday, April 11, 2026
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Kaal Bhairav Ashtami: शिव के क्रोध से हुआ, काल के भय पर विजय करने वाले काल भैरव का जन्म

by KhabarDesk
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Kaal Bhairav Ashtami

Kaal Bhairav Ashtami: भगवान शिव के रुद्र रूप से ही काल भैरव की की उत्पत्ति हुई है । काल के भय पर भी विजय करने वाले काल भैरव का जन्म शिव के क्रोध से हुआ । अगहन माह मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की अष्टमी को इनका जन्म होने से इसे काल भैरव अष्टमी कहा जाता है । काल भैरव ही महाकालेश्वर हैं । काल को भी इनके सामने अपनी हार माननी पड़ती है । नाथ सम्प्रदाय में इन्हीं की साधना की जाती है।

पौराणिक कथा:-

पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्मा जी सृष्टि में सभी का सृजन करने के बाद समाधिस्थ होकर बैठ तप करने लगे। अपनी तपस्या के बाद ईश्वर से प्रार्थना की उस समय उनके एक मुख ने ऋग्वेद, दूसरे मुख ने यजुर्वेद तीसरे मुख ने प्रकट होकर सामवेद का गायन किया और अंत मे चतुर्थ मुख के प्रकट होने के बाद उससे अथर्ववेद की उत्पत्ति हुई। अपने चार मुख देख कर ब्रह्मा जी के मन में अहंकार उत्पन्न हुआ और वह अपने सम्मुख खड़े शिव जी के वेष और उनके गणों को देख कर उनका उपहास करते हुये अहंकार से भर कर निंदा करने लगे। उनके सिर के ऊपर पांचवा मुख उत्पन्न हो शिव जी का व्यंग से भर कर उपहास कर रहा था।

यह देख शिव जी क्रोध से भर उठे इस उपहास और अहंकार से भरे वेद को संसार के लिये अनुचित समझ शिव जी के रौद्र रूप से ब्रह्मा का संहार करने के लिये भयंकर रौद्र, काले रूप में‌ ही कालभैरव की उत्पत्ति हुई और उसने आगे बढ़कर अपने तीखे पैने हाथ के नाखूनों को ही अपना अस्त्र बना कर ब्रह्मा जी के उस कपाल को नोंच लिया। जिससे ब्रह्मा जी की मृत्यु हो गई। अब वह कपाल ब्रह्मा जी का होने से काल भैरव को ब्रह्म हत्या का पाप लगा और वह कपाल उनकी हथेली से ही चिपक कर रह गया। अपनी इस ब्रह्म हत्या के पाप को धोने के लिए काल भैरव ने सारे तीर्थों में स्नान किया किंतु फिर भी वह उस कपाल से मुक्त नहीं हो पाये तब शिव जी के ही आदेश पर वह काशी गये वहां पर गंगा जी में स्नान करने पर वह कपाल काल भैरव के हाथ से छूटा और उन्हें ब्रह्म हत्या से मुक्ति मिली। वह स्थान काशी विश्वनाथ मंदिर के पास का गंगा तट है।

काल भैरव हैं काशी के द्वारपाल

इसके बाद शिव जी ने उन्हें काशी का द्वार पाल नियुक्त कर दिया। उज्जैन में भी काल भैरव का जागृत रूप है। उनका वाहन काला कुत्ता है। काल भैरव की काल के भय पर विजय ही उनका सूक्ष्म रूप है। इस कथा के पीछे छिपे रहस्य को समझने की आवश्यकता है। कोई भी व्यक्ति यदि किसी की निंदा या उपहास करता है तब सामने वाला वह व्यक्ति भी क्रोध में आकर उसका अहित कर सकता है फिर उसका परिणाम चाहे कुछ भी हो। इसीलिये क्रोध को पाप का मूल कहा जाता है। गंगा का पावन शीतल जल ही उस क्रोध रूपी पाप का शमन कर सकता है। इसीलिये कहा जाता है कि यदि आपको क्रोध आ रहा है तो एक गिलास ठंडा पानी पी लो उस क्षण क्रोध का शमन हो जायेगा। तब आप ठंडे दिमाग से बैठकर उस समस्या का समाधान भी खोजेंगे।

ऊँ कालभैरवाय नम:। वह हमें काल के भय से मुक्ति दें ।
मंत्र:-* ऊँ तीखदन्त महाकाय कल्पांत दोहनम् ।
भैरवाय नमस्तुभ्यं अनुज्ञा दातुमार्हसि।।
ऊँ कालभैरवायनम:,श्री भैरवाय नम: भैरवाय नम:।
उषा सक्सेना

डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें।

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