Iran war : वर्तमान वैश्विक भूराजनीतिक परिदृश्य अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संशय, दुविधा और विरोधाभास के दौर से गुजर रहा है। ऐसी परिस्थितियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रों के बीच परस्पर एक दूसरे के साथ संबंधों और उनके राष्ट्रीय हितों को निर्धारित करती हैं। पिछले एक दशक से विश्व राजनीति में शक्ति संतुलन और शक्ति प्रदर्शन न सिर्फ देशों के आपसी खेमों में बंटकर किसी विचारधारा तक सीमित रही है, बल्कि, आर्थिक, तकनीकी, ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) की जरूरत और व्यापारिक प्रतिद्वंदिता ने राष्ट्रों के बीच संबंधों को नए सिरे से परिभाषित किए जाने एवं राष्ट्रहित को नया आयाम देने की कोशिश की है। इन बदलती जरूरतों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को एक नई दिशा देने का काम किया है। एक तरफ अमेरिका, यूरोपीय संघ (EU), रूस और वहीं दूसरी तरफ चीन जैसी महाशक्तियों ने इसे हासिल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय संबंधों मे नीत बदलते नए समीकरण और राष्ट्रीय हित के मामलों ने राष्ट्रों के बीच संबंधों को काफी जटिल बना दिया है।
अंशु नैथानी
इस सदी में अब संचार तकनीकी, इलेक्ट्रॉनिक वाॅरफेयर, एनर्जी सिक्योरिटीज और तकनीक के हर क्षेत्र में AI की बढ़ती हुई भूमिका ने पूरे विश्व में देशों के बीच बढ़ती चुनौतियों के प्रदर्शन ने एक नई विश्व व्यवस्था की ओर जाती हुई अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित किया है। महाशक्तियों के बीच बदलते वर्ल्ड ऑर्डर में नए बदलावों के साथ डायनामिक सामरिक संघर्ष और बदलते शक्ति संतुलन से अमेरिका जैसी विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति के सामने फिर से उनके वर्चस्व स्थापित करने की नीतियों को चुनौतियां भी मिल रही हैं। वर्चस्ववादी विश्व व्यवस्था में अपना दबदबा कायम करने के लिए अमेरिका फिर से नए तरीके से विश्व के अलग-अलग हिस्सों में कहीं युद्ध तो कहीं दबंगई या फिर व्यापारिक समझौता और टैरिफ की धमकियों वाली रणनीति को अपनी विदेश नीति के हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। इस तरह से दबाव की रणनीति का खेल शुरू कर दिया है।
यही वजह है कि ट्रम्प 2025 में दूसरी बार अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव जीतने के लिए MAGA का नारा लेकर आए (Make America Great Again), और इसके तहत उस प्लान के कार्यान्वयन के लिए दूसरी बार सत्ता में आने के लिए उनका वादा था, दुनिया में जहां युद्ध चल रहे हैं उन्हें रुकवा देंगे। अमेरिका को फिर से ग्रेट बना देंगे, अमेरिका को और भी अमीर बना देंगे! यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि अमेरिका की आर्थिक स्थिति पहले जैसी मजबूत नही रही, बढ़ता व्यापार घाटा, अनियंत्रित कर्ज और विकास के हर पैमाने पर चीन से मिल रही कड़ी टक्कर ने ट्रम्प को विश्व व्यवस्था में अमेरिकी साख को बनाए रखने के लिए कई अप्रत्याशित फैसले लेने के लिए बाध्य किया, जिससे वह अपने समर्थकों का विश्वास जीत सके।लेकिन कुछ अलग करने के चक्कर में ट्रम्प अपने ही जाल में फंसते जा रहे हैं! उनका तो यह भी कहना था कि अगर वे बाइडन की जगह अमेरिका के प्रेसिडेंट रहते तो यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध ही ना होता! युद्ध रुकवाने की क्रेडिट लेने की मानसिकता, टैरिफ लगाने की सनक उन्हें कई बार अतंरराष्ट्रीय समुदाय और उनके अपने ही देश के अंदर संशय और संदेह के घेरे में खड़ा करता है। उन्होंने कहा, भारत और पाकिस्तान का सीजफायर भी उन्होंने ही कराया, नॉर्थ कोरिया के किम जोंग को भी कुछ ना कुछ कहते रहे! इसराइल और गजा की मध्यस्थता में भी टांग अड़ाते रहे और अपने नीजि हितों की भी चाल चलते दिखे- गजा में टूरिज्म को लेकर!
लेकिन वे किसी एक फैसले पर स्थिर नही रहते! उनकी सोच बदल गई और वह बजाय युद्ध रुकवाने के युद्ध को बढ़ाने में लग गए हैं।
यह अकेले ट्रंप के लिए ऐसी कोई नई बात नहीं है, यह अमेरिका की पुरानी नीति है। दुनिया के अनेक क्षेत्रों में युद्ध भड़काकर वहां अपने हथियार बेचना उसकी पुरानी पॉलिसी है। ट्रंप दूसरी तरह की बातें कर रहे थे और कुछ अलग करना चाह रहे थे। लेकिन उनकी साम्राज्यवादी सोच को सामने आने में देर नही लगी जब उन्होंने कनाडा, ग्रीनलैंड पर दावे ठोकने शुरू किए। उनकी हिम्मत बढ़ती ही गई और फिर उन्होंने वेनेजुएला में उसके राष्ट्राध्यक्ष को अगवा करके वहां रिजीम चेंज कर दी! उनकी हिम्मत अब इतनी बढ़ चुकी है कि इजरायल के कहने पर वह ईरान के साथ भी वैसा ही तख्तापलट करने की बात करने लगे। लेकिन यहां बाजी पलटती नजर आ रही है।
अभी तक रूस-यूक्रेन युद्ध में ट्रंप की मध्यस्थता की कोशिश या वेनेजुएला के राष्ट्राध्यक्ष का अपहरण कांड करने के बाद एक लेवरेज जो अमेरिका ने लिया था वह धराशाही होता नजर आ रहा है।
युद्ध में ईरान, इजरायल और अमेरिका पर भारी पड़ता नजर आ रहा है! नेतन्याहू अब कहीं नजर नहीं आ रहे! दूसरी तरफ ट्रंप छटपटाहट में है और इस युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं। रूस से तेल खरीदने पर पाबंदी लगाने वाला अमेरिका अब रूस से ही तेल मुहैया करने की बातें कर रहा है। इतना ही नहीं, चीन से भी मदद मांगी जा रही है। यूक्रेन से ड्रोन की मदद मांगी जा रही है। यानी बाजी पूरी पलट गई और अब रशिया-ईरान-चीन का यह ट्रायो इसराइल और अमेरिका पर भारी पड़ता नजर आ रहा है। मिडिल ईस्ट में क्षेत्रीय अस्थिरता फैलाकर तेल लूटने वाला अमेरिका अब खुद तेल के खेल में फंस रहा है। ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में मिलिट्री अड्डों को तबाह कर एक नई तरह की चुनौती अमेरिका के लिए खड़ी कर दी है।
अगर इसकी पृष्ठभूमि में जाएं तो 1989 के बाद से ही अमेरिका ने अपनी नई साम्राज्यवादी नीतियों (New Imperialist Policies) के तहत मध्य एशिया के देशों को दोस्त और दुश्मनों के तौर पर अपने हित के हिसाब से वर्गीकृत करना शुरू कर दिया था। राजघरानों से शासित देशों को पड़ोसी मुल्कों का डर दिखाकर उनसे दोस्ती का दिखावटी इजहार और इकरार कर वहां अपना मिलिट्री बेस बनाया। वहीं ईरान, इराक, सीरिया, लेबनान, फिलिस्तीन, जॉर्डन पर झूठे आरोप लगाकर अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी का लेबल लगा दिया।
अमेरिका की इन बातों को एक नैरेटिव बनाकर पश्चिमी मीडिया ने हवा दी, जिससे पश्चिमी देश विशेष रूप से अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में तेल, प्राकृतिक गैस पर कब्जा और पेट्रो-पॉलिसी को डोमिनेट करने की नीति अपनाई है। इस खेल में खाड़ी के देश पेट्रो-पॉलिसी को अपने हित में साधने के लिए ही अमेरिका से गलबहियां करते रहे हैं। लेकिन अमेरिका OPEC देशों के बीच फूट डालने की भी कोशिश करता रहा है। विश्व पटल पर अमेरिका ने एक बार फिर से अपने को एक सुपर पावर के तौर पर स्थापित करने के लिए इजरायल के अधिकारों और इस्लामी-आतंकवाद का बहाना बनाकर पश्चिम एशिया को युद्ध भूमि का अखाड़ा बना दिया है।
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