Shani Dev Jayanti 2025: ज्येष्ठमाह देवों में प्रथम सबसे बड़े सृजन के देवता ब्रह्मा जी को समर्पित होने से ही इस माह को जेठमास कहते हैं । जेठमास कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि अमावस्या का अपना विशेष महत्व । इस दिन वट वृक्ष के रूप में ब्रह्मा जी की पूजा की जाती है । न्याय के देवता कर्मफल दाता शनिदेव का जन्म भी आज के ही दिन सूर्य पुत्र के रूप में उनकी पत्नी संज्ञा की छाया से हुआ था । इसीलिए इनके पिता का नाम सूर्यदेव और माता का नाम छाया है ।
विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा का विवाह सूर्यदेव के साथ हुआ । जिससे उनके तीन संतानें प्रथम संतान यम और यमी थे । दूसरी बार मनु हुये । संज्ञा के लिये सूर्य देव का संताप देता उत्तप्त ताप जब सहन नहीं हुआ तो वह अपनी काया की छाया को छोड़कर उन्हें अपने बच्चों की देखभाल और सूर्यदेव की सेवा में रत कर स्वयं बिना बतलाये तप के बल पर अपने तेज को बढ़ा कर तेजस्वी रूप के लिये जिसके द्वारा वह सूर्य देव के ताप को सहर्ष सहन कर सके विचार कर हिमालय के घने जंगलों मे चली गई ।
इधर छाया ने सूर्यदेव को अपनी सेवा से प्रसन्न करते हुये उन्हें पति रूप में पाने के लिये महादेव का तप किया और छाया ने काया का रूप धारण कर सूर्यदेव के सान्निध्य में रहकर गर्भ धारण किया। शिव जी की तपस्या करने शिंगनापुर आकर शनिदेव को जन्म दिया । जेठ मास की भरी दुपहरी सूर्य के तेज के कारण झुलस कर शनिदेव का रंग काला हो गया ।
शनिदेव का काला रंग देखकर सूर्यदेव ने उन्हें अपना पुत्र मानने से इंकार कर दिया । तब छाया ने अपमानित होकर महादेव की तपस्या की। महादेव के द्वारा सत्य प्रकट करने पर सूर्यदेव को शनि को अपना पुत्र स्वीकार करना पड़ा परंतु शनिदेव अपनी माता के इस अपमान को कभी नहीं भूले इसी कारण उनका अपने पिता से द्वेष भाव रहा । शनिदेव ने अपने भीषण तप से ही महादेव को प्रसन्न कर उनसे कर्म फल दाता और न्याय के देवता का पद प्राप्त किया। इसके पूर्व उनके बड़े भाई यम मृत्यु के देवता का सौर मंडल में स्थान प्राप्त कर चुके थे । इस तरह शनिदेव ने अपनी शक्ति और भक्ति के द्वारा माता छाया को दासत्व भाव से मुक्त कर सूर्यदेव से उन्हें पत्नी का स्थान प्रदान करने पर विवश कर माता को सम्मान दिलवाया। अब वह संज्ञा की छाया दासी नहीं वरन् उन्हीं के समान सूर्यदेव की पत्नी थी । ऊँ शं शनैश्चराययै नम:।
उषा सक्सेना
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें।