Gupt Navratri : दस महाविद्या का अर्थ है वह महा ज्ञान जो गुप्त नवरात्रि में तंत्र शास्त्र के द्वारा तंत्र -मंत्र को सिद्ध करने के लिये तांत्रिक लोग करते हैं ।यह सर्व साधारण के लिये कठिन होने की वजह से गुप्त नवरात्रि की माघ और आषाढ़ में ही साधना की जाती है। प्रथम दिवस महाकाली की विद्य का है । महाकाली का ही दूसरा नाम महाकालिका है । यह मृत्यु और कालकी देवी हैं। यदि शिव महाकाल हैं तो पार्वती महाकाली, आदिशक्ति काली का विकराल और भयप्रद रूप। असुरों के संहार के लिये ही देवी दुर्गा ने इस रूप को धारण किया था जिसे देखते ही असुर डर जायें ।
काली की पूजा विशेषत: बंगाल, उड़ीसा और असम में की जाती है। दस महाविद्याओं में प्रथम विद्या जिसके द्वारा हमें काल का ज्ञान होता है। काली की उत्पत्ति काल अर्थात समय से हुई जो सबको अपना ग्रास बनाता है । माता का यह रूप विनाशकारी होने के कारण दानवीय प्रकृति के लोगों के लिये है। दानव दैत्यों का संहार करते समय उनके मन में कोई दयाभाव नहीं होता। यह बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक भी है। इसलिये वह पूज्यनीय होकर अपने भक्तों की सदा रक्षा करती हैं। इन दस महा विद्याओं में से सात महा विद्याओं के मंदिर म.प्र.के दतिया जिले के आस पास ही विद्यमान हैं।
काली उत्तर दिशा की अधिष्ठात्री हैं ।
पार्वती के पूर्वजन्म सती के ही यह दस रूप हैं। जब शिव जी ने उन्हें दक्ष के यज्ञ में जाने से मना किया तो वह अपने पति शिव के अपमान से इतनी क्रोधित थीं कि उन्होंने कहा मैं जाऊंगी और यज्ञ का विध्वंस करूंगी । जितनी बार शिवजी मना कर जिस दिशा में जाने से रोकते देवी अपने भयंकर रूप में वहीं प्रकट हो जाती। इस तरह दसों दिशाओं में जब उनहोंने अपने काली के भयंकर रूप को दिखाया तो शिव जी भी भयभीत हो गये और उन्हें जाने से रोक नहीं सके। सती के यही दस रूप बाद में दस महाविद्याओं के रूप में जाने गये।
पौराणिक कथा :-
देवासुर संग्राम में एक बार देवराज इन्द्र ने दानवराज नमुचि से युद्ध करते हुये उसे मार डाला। देवताओं के इस कृत्य से नाराज़ होकर शुम्भ और निशुम्भ ने उन्हें अपने पराक्रम से हरा कर स्वर्ग पर अपना आधिपत्य कर लिया। असुरों के देवताओं पर हो रहे अत्याचार से दुखी हो कर सभी देवता आदिशक्ति दुर्गा जी के पास गये और उनसे अपनी रक्षा के लिये प्रार्थना की तभी दुर्गा जी ने सभी देवताओं के तेजोमयरूप से शक्ति और अस्त्र -शस्त्र प्राप्त कर महिषासुर का वध किया। शुम्भ निशुम्भ ने पार्वती के रूप पर मोहित होकर उनसे विवाह का प्रस्ताव भेजा। देवी ने कहा जो मुझे युद्ध में परास्त करेगा मैं उसी के साथ ही विवाह करुंगी । इस पर वह दोनों युद्ध करने देवी के सम्मुख आये और देवी ने उनका वध करते हुऐ देवताओं को उनका स्वर्ग लोक वापिस दिलाया। सनातन हिन्दू धर्म में काली ही पार्वती हैं । शाक्त सम्प्रदाय के अतिरिक्त बौद्ध धर्म एवं अन्य समुदायों में भी काली की पूजा की जाती है। उग्र कुल की देवी होने से इनक स्वभाव भी उग्र है।
इन दस महाविद्याओं को जागृत करने के लिए रात्रि में ही एकांत में इनकी पूजा करने का विधान है। इन दस महाविद्याओं का संबंध भगवान विष्णु के दस अवतारों से भी है। श्रीकृष्ण को काली का अवतार माना जाता है ।
मंत्र:-सर्वस्वरूपे सर्वेशे
सर्वशक्ति समन्विते ।
भयेभ्य:त्राहि नो देवी
दुर्गे देवी नमोस्तुते।।
जै महाकाली ।
उषा सक्सेना
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें।