Friday, January 16, 2026
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Rooh afza Baba Ramdev Row : शरबत की दुकान पर धर्म, ये कहां आ गए हम !!

Rooh afza Baba Ramdev Row :

by KhabarDesk
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Rooh afza Baba Ramdev Row :  वैसे तो अब नीचे से लेकर ऊपर तक हर जगह ओछे लोगों का ही बोलबाला है मगर बात यदि लाला रामदेव की हो तो वह दौड़ में सबसे आगे नजर आने को बेचैन हैं। भ्रामक प्रचार के मामले में बामुश्किल आठ महीने पहले ही जेल जाते जाते बचे हैं मगर ये हैं कि अब भी बाज ही नहीं आ रहे । सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाते हुए सख्त चेतावनी दी थी मगर वे फिर भी अब अपना शरबत बेचने के लिए बाजार के सबसे बड़े उत्पादों को टॉयलेट क्लीनर और शरबत जिहाद की संज्ञा दे रहे हैं ।

रवि अरोड़ा

खुलेआम कह रहे हैं कि उनका शरबत पियोगे तो मस्जिद और मदरसे बनेंगे और हमारा शरबत पियोगे तो गुरुकुल बनेंगे । वे यहीं नहीं रुके और रविवार को अखबारों में बड़ा बड़ा विज्ञापन देकर एलान भी कर दिया कि अपना धर्म बचाना है हमारा शरबत पीओ। साफ दिख रहा है कि उन्हें अब सुप्रीम कोर्ट का भी डर नहीं है। माना कि केंद्र और अनेक राज्य सरकारें उनकी जेब में हैं और आसानी से कोई उनका बाल भी बांका नहीं कर सकता । मगर उनका ओछापन कहीं तो थमे।

कोई रूहअफजा पीये अथवा गुलाब शरबत अपने को इससे कोई लेना देना नहीं है। अपना सवाल तो यह है कि अपना प्रोडक्ट बेचने के लिए बाबा राम देव जो कर रहे हैं, क्या भारत का संविधान उसकी इजाजत उन्हें देता है ? क्या उनकी हरकतें किसी कानून का उल्लंघन तो नहीं ? बेशक मैं कोई वकील नहीं हूं और बाबा रामदेव के कृत्यों की कानूनन सही सही व्याख्या नहीं कर सकता मगर एक सामान्य नागरिक की नजर से तो मुझे भी साफ दिख रहा है कि भारतीय संविधान और कानून के अनुसार, कोई कंपनी अपने माल को बेचने के लिए धर्म का दुरुपयोग नहीं कर सकती, क्योंकि यह धर्म के आधार पर भेदभाव, सामाजिक विद्वेष को बढ़ावा देने अथवा धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के रूप में माना जा सकता है और यह सरासर कई संवैधानिक प्रावधानों और कानूनी धाराओं का उल्लंघन माना जाएगा ।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 यानी समानता का अधिकार, सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण की गारंटी देता है। धर्म के आधार पर माल बेचने की रणनीति कुछ समुदायों के साथ भेदभाव कर सकती है, जो इस अनुच्छेद का सरासर उल्लंघन है ।अनुच्छेद 15 जो कि धर्म, जाति आदि के आधार पर भेदभाव को निषेध करता है । यदि कोई कंपनी धर्म का उपयोग करके अपने उत्पादों को बेचती है, तो यह अनुच्छेद 15 का भी उल्लंघन होगा ।अनुच्छेद 25 जो धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है और इसका दुरुपयोग सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ नहीं हो सकता। धर्म का व्यावसायिक उपयोग धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा सकता है, जो इस अनुच्छेद के दायरे में उल्लंघन माना जा सकता है।

अनुच्छेद 51 ए (ई) नागरिकों से धार्मिक सद्भाव और समन्वय को बढ़ावा देने की अपेक्षा करता है। जबकि धर्म का व्यावसायिक उपयोग सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाने का कार्य करेगा । उधर, भारतीय दंड संहिता (आईपीसी ) की धारा 153 ए धर्म, जाति, जन्म स्थान आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता, घृणा या वैमनस्य को बढ़ावा देने के खिलाफ है। यदि कोई कंपनी धर्म का उपयोग करके अपने माल को बेचती है और इससे सामाजिक तनाव बढ़ता है, तो यह धारा लागू हो सकती है।जिसकी सजा कम से कम तीन साल है। धारा 153 बी राष्ट्रीय एकता के खिलाफ कार्यों को दंडित करती है, जैसे धर्म के आधार पर विभेदकारी दावे करना और इसके तहत भी तीन साल की सजा का प्रावधान है ।

आईपीसी की ही धारा 295 ए स्पष्ट रूप से तहत धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से किए गए कृत्यों को दंडित करती है। यदि किसी कंपनी का विज्ञापन या प्रचार धार्मिक भावनाओं को आहत करता है, तो यह लागू हो सकती है। इसमें भी तीन साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है । धारा 505 ऐसी सामग्री के प्रकाशन या प्रसार को दंडित करती है जो सार्वजनिक शांति भंग कर सकती है या धार्मिक समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा दे सकती है। इसमें भी 3 वर्ष तक की कैद, जुर्माना या दोनों की व्यवस्था है ।

यदि कोई कंपनी धर्म का उपयोग करके भ्रामक विज्ञापन या अनुचित व्यापार प्रथाओं को बढ़ावा देती है, तो यह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत धारा 2(28) भ्रामक विज्ञापन को परिभाषित करती है, और यह अपराध के श्रेणी में आता है और दो साल की सजा का नियम है। इसके अतिरिक्त विज्ञापन मानक परिषद के अनुसार भी कोई कंपनी अपने विज्ञापन में धर्म, जाति या समुदाय के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा नहीं दे सकती । बाबा का विज्ञापन सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (आई टी एक्ट ) के तहत भी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाता है व केबल टेलीविजन नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995 के तहत भी निषेधित है व उसके तहत सजा हो सकती है ।

मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि यदि कोई काबिल वकील बाबा के इस ओछेपन को कानूनन परिभाषित करेगा तो लाला जी कई अन्य धाराओं के तहत भी दोषी ठहराए जा सकते हैं। मगर साथ ही यह दावा करने को भी मजबूर हूं कि आज के हालात को देखते हुए तो बाबा का बाल भी बांका नहीं होने वाला।

Disclaimer  : लेख में व्यक्त सभी विचार लेखक के अपने निजी विचार हैं।

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