Vishwamitra Jayanti 2024: कार्तिक माह शुक्ल पक्ष की तृतीया ब्रह्मर्षि विश्वामित्र को समर्पित है । व्यक्ति अपने तप के बल पर क्या नही कर सकता । गायत्री मंत्र के दृष्टा राजर्षि विश्वामित्र ने अपने ज्ञान और तपस्या के बल पर क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया । जिसके कारण स्वयं उनके सबसे बड़े विरोधी वशिष्ठ मुनि ने ही उन्हें ब्रहर्षि कहा । वह ऋग्वेद के तीसरे मंडल के दृष्टा है । सातवें मन्वंतर के सप्तर्षि होने का सौभाग्य उनके तप और साधना की सबसे बड़ी सफलता है। वेद में गायत्री मंत्र को सभी मंत्रों का मूल कहा जाता है । वैदिक और पौराणिक ग्रंथों में विश्वामित्र के विषय में उनके जन्म से लेकर अंत तक विस्तार से लिखा है ।
विश्वामित्र राज ऋषि से महर्षि और फिर ब्रह्म ऋषि बने
जब प्रथम बार भृगु पुत्र ऋचीक ने अपने पिता भृगु मुनि के साथ सप्त सिंधु प्रदेश के भरतवंशी राजा गाधि के राज्य में सरस्वती के तट पर प्रवेश किया तो महाराज गाधि की पुत्री राजकुमारी सत्यवती को ही अपने पुत्र ऋचीक के लिये मांग लिया । महाराज गाधि ने एक हजार श्वेत वर्णी श्याम कर्णी अद्भुत पराक्रमी अश्वों की मांग रखी । जिसके एवज में सत्यववती का विवाह उनके पुत्र ऋचीक के साथ हुआ । भृगु मुनि ने अपनी पुत्रवधू से अच्छी संतान के लिये तप करते हुये वरुणदेव से प्रार्थना की तो सत्यवती ने अपने पिता के और कोई संतान न होने के कारण उनके लिये भी एक पुत्र की प्रार्थना की । भृगु मुनि ने सत्यवती की प्रार्थना पर उनकी मां के लिये भी प्रार्थना कर यज्ञ किया जिसमें दो चरु पात्र निकले एक मिट्टी का पात्र था दूसरा धातु का पात्र था।
वह दोनों ही पात्र उन्होंने सत्यवती को देते हुये कहा यह मिट्टी के पात्र की खीर तुम्हारे लिये है और दूसरे पात्र की तुम्हारी मां के लिये। यह कह कर वह कहीं बाहर चले गये । सत्यवती ने मां को जब खीर देते समय यह बात कही तो उनकी माता ने सत्यव्रती से अपने पात्र को बदलते हुये कहा तुम्हारे पिता के इतने बड़े साम्राज्य को संभालने के लिये हमें प्रतापी पुत्र चाहिये । जब भृगु मुनि लौट कर आये तो उन्होंने सत्यवती से पूंछा तुमने और तुम्हारी मां ने खीर खा ली । तुमने उन्हें कौन सा पात्र दिया था । सत्यवती ने सब कुछ बतला दिया । कि किस प्रकार से मां ने मेरा पात्र लेकर उसकी खीर खाई और मैने उनकी ।यह सुनकर भृगु मुनि बहुत क्रोधित होकर कहने लगे मैंने उनके लिये अलग से तप करके पराक्रमी पुत्र की कामना की थी जिसमें क्षत्रिय गुण कूट-कूट कर भरे हों जो कभी किसी से हारे नहीं । तुम्हारे पात्र में मिट्टी से सतोगुण ब्राह्मण का था जो तपस्वी और मंत्रदष्टा होगा । अब तुम्हें ही इसका परिणाम भोगना होगा । सत्यवती उनके चरणों पर गिर कर क्षमा मांगने लगी मैं अपने लिए ऋषि संतान ही चाहती हूं । तब भृगु मुनि ने कहा मैं अपना शाप वापिस तो नहीं ले सकता कितु अब तुम्हारा पुत्र नही वरन पौत्र क्षत्रिय गुण वाला होगा । इस तरह सत्यवती के भाई विश्वामित्र क्षत्रिय राजा होकर भी अपना राजपाट त्याग कर तप करते हुये राजर्षि से महर्षि और अंत मे ब्रह्मर्षि बने।
उधर ऋचीक मुनि के पुत्र जमदग्नि हुये और उनके पौत्र परशुराम ब्राह्मण होकर भी क्षत्रिय के गुण वाले पराक्रमी योद्धा हुये । जिनका नाम पहले राम था किंतु अपने पिता की आज्ञा मान कर अपनी माता की हत्या परशु से करने के कारण उनके पिता ने उनके नाम के आगे परशु जोड़कर उन्हें परशुराम कहा। यदि सत्यवती की माता ने खीर के पात्र नही बदले होते तो विश्वामित्र के स्थान पर परशुराम ही राजा गाधि के पुत्र होते । इस तरह हम देखते हैं कि व्यक्ति जन्म से नही बल्कि वह अपने स्वयं के कर्म से ही बड़ा होता है।
उषा सक्सेना
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारी सामान्य संदर्भ के लिए है और इसका उद्देश्य किसी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठक कृपया अपनी विवेकपूर्ण समझ और परामर्श से कार्य करें।