Ego : अहं अस्मि अर्थात मैं हूॅं का अहम् भाव ही मानव मन का अहंकार है। जब मनुष्य अहंकार के प्रभाव में आता है तब वह सभी के लिये नही वरन् केवल अपने लिये ही सोचता है। “मैं ही कर्ता हूं” जब वह इस भाव को अपने मन में धारण कर लेता है तो कर्म प्रधान इस जगत के कारण वह अपने आपको ही सब कुछ समझने लगता है।
ऊषा सक्सेना
अहम् अस्मि से ब्रह्मास्मि की ओर जाता उसका मन अपने आत्म तत्त्व से ऊपर उठ कर ब्रह्म तत्व को ही ग्रहण कर कर्म करने वाला न समझ कर, कर्ता भाव में आकर अपने आपको ही परम समझ लेता है। जब कि वह कर्म योगी है। उसे अपने कर्मों के फल स्वरूप ही उनका फल भोगने इस पृथ्वी पर आना पड़ता है। उसके यह कर्म ही उसके कर्म फल को काटते हुये उसे भव बंधन से मुक्त करते हैं। कर्म ही नाना प्रकार के शरीर को धारण करता हुआ अनेक लीलायें करता है ।
अहंकार होता है व्यक्ति के विनाश का कारण
अहम् अस्ति का भाव यानि मेरा अस्तित्व है और मेरा अस्तित्व है इसीलिये मैं हूॅं और मै हूॅं अत : जो चाहे कर सकता हूं का अहंकार भाव ही व्यक्ति के विनाश का कारण होता है। मनुष्य “मैं हूं” के ममत्व के कारण वह इस भाव को जब अपनी चेतन बुद्धि में धारण कर लेता है तो चेतना में जागृत हुये इस भाव के कारण ही उसमें कर्ता का भाव आ जाता है और तब उत्पन्न होता है अहंकार का भाव “मैं हूॅं” । वह कर्ता भाव से प्रेरित हुआ सारे नियमों को तोड़ कर स्वेच्छाचारी होकर कार्य करता है। अंत में इस कार्य के कर्म फल को भी उसे ही भोगना पड़ता है चाहे वह अच्छा हो या बुरा। दोनों के प्रतिफल का भोगी वह स्वयं ही है। उसी के अनुसार उसको शुभाशुभ फल की प्राप्ति होती है । यदि वह अपने जीवन में कर्ता भाव अहम् (Ego ) के “अ “‘अस्तित्व वाले भाव से मुक्त हो जाये तो केवल हम ही रह जायेगा। जहां उसके साथ आत्म का साक्ष्य भाव जुड़ कर उसे अपने साथ व्यष्टि से समष्टि की ओर ले जायेगा। व्यष्टि का अर्थ है होता है छोटा या सूक्ष्म और समष्टि का अर्थ है बड़ा, विशाल यानी ब्रह्मांड जैसा विशाल। पुराणों में व्यष्टि और समष्टि को सृष्टि के दो पहलुओं के रूप में समझा गया है। व्यष्टि प्रकट या व्यक्तिगत पहलू को दर्शाता है।
समष्टि अव्यक्त या सामूहिक पहलू को दर्शाता है। गीता में व्यष्टि का अर्थ है व्यक्ति या किसी विशेष घटक की स्थिति और अवस्था। समष्टि का अर्थ है पूरे ब्रह्मांड या संसार की कुल स्थिति और व्यवस्था। जब व्यक्ति अहम से ऊपर उठकर “हम ” के भाव में आ जाता है यानी समस्त संसार को अपने में समाहित कर लेता है तो वह व्यष्टि से समष्टि की ओर आता है।
जब यह भाव आ जाएगा तब हम का विस्तार हमारा में होकर सभी में एकात्म स्थापित करता हुआ एकाकार हो ब्रह्म त्व में लीन हो जायेगा। यहां उसका ममत्व का कर्ता भाव नही होगा वरन कर्म भाव होगा। श्री कृष्ण ने इसीलिये गीता में अर्जुन से कहा है :-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
तेरे पास केवल कर्म करने का ही अधिकार है फल का नही। इसीलिये जो तेरा कर्म है इस समय तू वही कर। फल तो कर्म करने के बाद ही प्राप्त होगा। इसीलिये “मैं कर रहा हूं “इस कर्ता भाव को त्याग दे। अपने मन के अहंकार Ego को त्यागेगा तभी स्वतंत्र होकर कर्म कर पायेगा ।
सकल पदारथ हैं जग माही
कर्म हीन नर पावत नाही ।
अंत में यही सत्य है।
अपनी करनी पार उतरनी ।