Sita Navami : वैशाख मास शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि आश्लेषा नक्षत्र मंगलवार के दिन धरापुत्री सीता जी का धरती से प्राकट्य हुआ था। इस वर्ष सीता नवमी 5 मई को मनाई जाएगी। कहते हैं कि जब बारह वर्ष तक मिथिला में पानी नहीं बरसा और भीषण अकाल की स्थिति उत्पन्न हुई तो सभी ऋषि-मुनियों की ज्योतिषीय गणना और मंत्रणा के पश्चात मिथिला की धर्मसभा में यह निर्णय लिया गया कि जब मिथिलापति महाराज जनक राजसी वस्त्र त्याग कर अपनी महारानी सुनयना के साथ यज्ञ भूमि में सोने के हल से खेत को नंगे पैर जोतेंगे तो उनके श्रम को देख कर शायद इंद्रदेव का हृदय पसीजे और वह गौतम ऋषि के द्वारा दिये हुये शाप और अपने अपमान को भूल कर देवी अहिल्या के साथ किये हुये छल के बाद प्रायश्चित के रूप मे जल बरसा कर मिथिला की खुशियां लौटा कर सभी को हर्षित कर दें।
राजा जनक स्वयं राजर्षि थे, उन्हें सभी की बातों में औचित्य नजर आया ।सबसे बड़ी बात यह थी कि यह प्रस्ताव स्वयं गौतम मुनि ने अपने साथ किये गये छल को भूल कर लोक हित में रखा था। राजा जनक रानी सुनयना के साथ जोतने के लिये तैयार की गई भूमि का पूजन करने और सभी ऋषि-मुनियों के द्वारा किये जा रहे स्वस्ति वाचन के बाद जब बैलों को जोत कर हल चला रहे थे तभी बीच खेत में हल की नोक गड़कर रह गई। यह देखने के लिये कि आखिर क्या बात है, बैल आगे क्यों नहीं बढ़ रहे। ऐसा क्या हल की नोक में अटका है जो उसे आगे नहीं बढ़ने दे रहा। रानी सुनयना के महाराज जनक झुक कर देख रहे थे कि उन्हें मिट्टी का बड़ा पात्र दिखाई दिया जिसके अंदर लाल मखमली दुशाले में लिपटी एक नवजात कन्या का रोदन सुनाई दिया ।
राजा जनक को धरती के गोद से मिली थी सीता मैया
सभी ऋषि-मुनियों के साथ मिथिला निवासी उसे देख रहे थे कि यह क्या है ? महारानी सुनयना ने महाराज के हाथ से लपक कर उसे अपनी गोद में लेकर सीने से लगा लिया। तभी आसमान पर चारों ओर से घनघोर घटा घिर कर आई और वह बादल जो बारह बरस तक नहीं बरसे थे आज शुष्क धरा की प्यास बुझा रहे थे । गौतम ऋषि ने उस कन्या को देख कर नमस्कार करते हुये कहा “महाराज आदिशक्ति भवानी धरापुत्री बनकर आपके यहाँ मिथिला का भाग्य लेकर आई है । हल के कारण इसका प्रादुर्भाव हुआ अत: इसका नाम सीता होगा ।
उद्भव स्थिति संहारकारिणीं क्लेशहारिणीं ।
सर्वश्रेयस्करीं नतो$हम् सीतायां रामवल्लभाम्।।
राजा जनक ने एक बार फिर उस कन्या को महारानी की गोद से लेकर दोनों हाथों से झुलाते हुये ऊपर उठा कर कहा यह कोई भी हो हल की सी के कारण यह सीता हुई। पर अब यह राजा जनक की पुत्री है और मेरी पुत्री के रूप में इनका नाम जानकी होगा। धरती माँ ने नि: संतान महारानी सुनयना की सूनी गोद में धरापुत्री को देकर उनकी गोद भर दी। मिथिला का अकाल दूर होकर चारों ओर हरियाली ही हरियाली छा गई ।
जै जनक नंदिनी सीता मैया की ।
उषा सक्सेना