Kabir Das Jayanti 2025 : संत कबीर के दोहे आज भी जीवन की विभिन्न परिस्थितियों पर, सामाजिक जीवन में कई बार कहे सुने जाते हैं । क्योंकि उनकी प्रासंगिकता कई शताब्दियां बीत जाने के बाद भी बनी हुई है। संत कबीर भक्ति युग के कवि थे। भक्ति युग को हिंदी साहित्य का भी स्वर्ण युग कहा जाता है। विचार और कला की दृष्टि से इस युग के कवि आज भी हिंदी के सर्वश्रेष्ठ कवियों में गिने जाते हैं। राजनीतिक दृष्टि से यह युद्ध और संघर्ष का भी युग था। इसे हम हिंदू मुस्लिम संस्कृतियों के संघर्ष और समन्वय का काल भी कह सकते हैं। चाहे वे सूफी कवि हुए या हिंदी के भक्ति धारा के कवि उन्होंने हिंदू – मुस्लिम धर्म के बीच समन्वय स्थापित किया और व्यर्थ के आडंबरों के कारण खड़ी हुई मनुष्यों के बीच भेदभाव की दीवारों को भी ध्वस्त किया। राजनीतिक संघर्ष के बीच इन संत कवियों की वाणी और सूफी कवियों के प्रेम संदेश समन्वय स्थापित करने में सफल रहे थे।
निर्गुण भक्ति के प्रमुख कवि थे संत कबीर
कबीर भक्ति युग के इसी काव्य धारा के कवि थे। भक्ति योग में विकसित इस काव्यधारा का मूल सिद्धों और नाथों की वाणियों में देखा जा सकता है। इस धारा के कवियों ने सभी मनुष्यों और प्राणियों को ईश्वर मय समझा और भेदभाव नहीं रखा। उन्होंने घूम-घूम कर जनसाधारण की भाषा में उपदेश दिया। इस काव्य धारा के आदि स्रोत गोरखनाथ माने जाते हैं। पर भक्ति योग में सबसे पहले नामदेव की पदावली के रूप में संत काव्य मिलता है, किंतु उसका प्रभाव काफी सीमित था। संत काव्यधारा के प्रवर्तक और व्यापक प्रभाव डालने वाले कबीर ऐसे संत थे जिन्होंने अपनी वाणी से सभी को प्रभावित कर लिया था। जन्म से हिंदू होते हुए भी कबीर का पालन पोषण मुस्लिम परिवार में हुआ था। ऐसा परिवार जो जुलाहे का काम करता था। इसलिए कबीर के काव्य में कातने बुनने से संबंधित प्रतीक, बिंब और उपमान बहुत ज्यादा मिलते हैं। कबीर का जन्म सन 1398 में काशी में माना जाता है। कबीर साधु संतों के सत्संग में बहुत रुचि रखते थे।
कबीर के गुरु थे स्वामी रामानंद
कबीर ने स्वामी रामानंद से प्रभावित होकर उन्हें अपना गुरु माना था। उनके बारे में प्रसिद्ध है कि एक बार जब सुबह के समय स्वामी रामानंद काशी में गंगा स्नान के लिए सीढ़ियां उतर रहे थे, तब यह उन्हें अपना गुरु बनाने के लिए सीढ़ियों पर ही लेट गए । इनके ऊपर पैर पड़ते ही स्वामी जी ने राम नाम का उच्चारण किया और उसी को दीक्षा मंत्र समझकर कबीर ने स्वीकार कर लिया और रामानंद को ही अपना गुरु मान लिया। कबीर कहते हैं :
काशी में हम प्रकट भये हैं रामानंद चेताये।
समरथ को परवाना लाये हंस उबारन आये।।
कबीर जन्मजात प्रतिभाशाली कवि थे और जल्द ही सिद्ध पुरुष के रूप में उनकी ख्याति भी फैल गई थी। वे जहां जाते अनेक लोग उनके शिष्य हो जाते थे। हिंदू और मुस्लिम दोनों ही धर्म के लोग उनके शिष्य थे। उन्होंने समता की दृष्टि रखकर प्रचलित आडंबरों और रूढ़ियों पर प्रहार किया जिसकी वजह से हिंदू और मुसलमान दोनों ही समुदायों के कुछ लोग उनके विरोधी भी हो गए थे।
जब सिकंदर लोदी ने कबीर को किया प्रणाम !
संत कबीर को लेकर एक बड़ा ही दिलचस्प किस्सा है। कहते हैं जिस समय सिकंदर लोधी काशी में आया तो मुल्लाओं और पंडितों ने उससे कबीर की शिकायत की। इस पर सिकंदर लोदी ने कबीर को अपने दरबार में बुला भेजा। सवेरे के बुलाए हुए कबीर शाम को पहुंचे। इसे देखकर बादशाह आग बबूला हो गया और पूछने लगा इतनी देर से क्यों आए हो ? कबीर ने कहा मुझे एक अद्भुत आश्चर्य दिखाई दिया जिसे आप भी देखते तो देखते ही रह जाते। उसने पूछा वह आश्चर्य क्या है ? कबीर ने उत्तर दिया मैंने देखा की सुई के छेद से हाथी, घोड़े, ऊंट, पर्वत सब निकलते चले जा रहे हैं। बादशाह स्वयं उस दृश्य को देखने के लिए चलने को तैयार हुआ। तब कबीर ने बताया कि वह दृश्य आप यहीं देख सकते हैं। आपकी आंख की पुतली सुई के छेद के बराबर है, लेकिन उससे आप हाथी, घोड़े, ऊंट, वन, पर्वत सभी को देख लेते हैं । सब उसमें समा जाते हैं, क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है ? कहते हैं कबीर की बातों से सिकंदर लोदी बहुत प्रभावित हुआ और उनको प्रणाम करके छोड़ दिया।
“मसि कागद छुयो नहीं कलम गही नहिं हाथ”
यूं तो जुलाहा परिवार में पालन पोषण होने के कारण कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे जैसा कि उन्होंने स्वयं लिखा है “मसि कागद छुयो नहीं कलम गही नहिं हाथ” । परंतु मौखिक रूप से ही उन्होंने इतना विशाल रचना संसार सृजित कर दिया था जिसकी कोई मिसाल नहीं। उन्होंने असंख्य वाणियों की रचना की, जिसमें उनकी काव्य प्रतिभा भी सबके सामने आई। इन रचनाओं को साखी, सबद और रमैनी – तीन भागों में विभाजित किया गया है। साखी में जीवन संबंधी उपदेश हैं और कुछ आध्यात्मिक बातें भी हैं। सबदो में योग साधना और भक्ति के भाव हैं और रमैनी में दार्शनिक विचार हैं।
धार्मिक आडंबरों का किया खुलकर विरोध
कबीर ने अपने जीवन काल में सभी धर्म संप्रदाय के लोगों को उच्च नैतिक आदर्श वाला जीवन जीने का उपदेश दिया। उनका मूल उद्देश्य हिंदू मुस्लिम एकता स्थापित करना और दोनों के बीच भेदभाव को दूर करना था । यही कारण है कि उन्होंने अपनी वाणियों में सूफी मत और वैष्णव धर्म की बातों को अपनाया। कबीर की वाणी में जो प्रेम और सौंदर्य का चित्रण है उसमें सूफी प्रेम तत्व का प्रभाव भी देखा जा सकता है। वास्तव में कबीर ने वैष्णव मत, योग साधना और सूफी प्रेम तत्व तीनों बातों को मिलाकर एक निर्मल एंव सार्थक जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त किया जिसे आगे चल कर कबीर मत के रूप में स्वीकार किया गया । कबीर ने अपने समय की सामाजिक कुरीतियों और विकारों को दूर कर जीवन के अच्छे तत्वों का समाज में बीजारोपण करने की चेष्टा की थी।